आगम (तंत्र) में योग की परिभाषा :
'आगम' उस साहित्य को कहते हैं जो शिव, शक्ति या विष्णु के द्वारा प्रकट हुआ माना जाता है। शैव, शाक्त और वैष्णव आगमों में योग को शिव-शक्ति के ऐक्य (मिलन) और कुंडलिनी जागरण के रूप में परिभाषित किया गया है।
• • शैव आगम : जीव का शिव से एकता या शिव शक्ति का मिलन (कुण्डलिनी) स्थापित होना ही योग है।
• • वैष्णव आगम : आगम परंपरा के अनुसार, जीव (आत्मा) और शिव (परमात्मा) मूलतः एक ही हैं, परंतु अविद्या के कारण जीव स्वयं को अलग मानता है। जीवात्मा का परमात्मा के साथ पूर्ण समरसता या मिलन स्थापित होना ही योग है।
• • शारदातिलक (शाक्त आगम): "ऐक्यं जीवात्मनोराहुर्योगं योगविशारदाः।" अर्थ - योग के विद्वान जीवात्मा और परमात्मा की एकता या अभिन्नता को ही योग कहते हैं। यह प्रसिद्ध पंक्ति योगतत्त्व उपनिषद् (मंत्र ६४) और श्रीमद्भागवत पुराण / विविध योग ग्रंथों में योग की परिभाषा के रूप में आती है।
• • योगबीज (शैव-शाक्त तंत्र): "प्राणापानमनोबुद्ध्यात्मसंयोगो योग उच्यते।" अर्थ: - प्राण और अपान वायु, मन और बुद्धि तथा जीवात्मा और परमात्मा का आपस में पूर्णतः संयुक्त (एक) हो जाना ही योग कहलाता है।
कुल निष्कर्ष:
आगम और वेद दोनों का मूल सार यही है कि योग वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा चंचल मन और इंद्रियों का नियमन करके जीवात्मा अपने वास्तविक शिव-स्वरूप (परम-तत्त्व) में लीन हो जाती है।

मुख्य अंतर और सार :
परम्परा योग का मूल लक्ष्य मुख्य दृष्टिकोण
• वेद (उपनिषद्) इंद्रिय-निग्रह और मन को ब्रह्म में लीन करना ज्ञान, ध्यान और आत्म-साक्षात्कार
• आगम (तंत्र) शिव-शक्ति का सामंजस्य और कुंडलिनी का ऊर्ध्वगमन प्राण-साधना, मंत्र, मुद्रा और ऊर्जा का संतुलन

शिव सूत्र कश्मीर शैव दर्शन (त्रिक दर्शन) का मूल आधार ग्रंथ है, जिसकी रचना महर्षि वसुगुप्त ने 9वीं शताब्दी में की थी। पतंजलि के योग सूत्र (अष्टांग योग) से भिन्न, शिव सूत्र में योग केवल शारीरिक या मानसिक नियंत्रण तक सीमित नहीं है, बल्कि चेतना का अपने मूल स्वरूप (शिवत्व) में विलीन हो जाना ही योग है।
शिव सूत्र के अनुसार योग की प्रमुख परिभाषाएँ और सिद्धांत :
  1. • चैतन्यमात्मा (सूत्र १.१): आत्मा ही परम चेतना (शिव) है। योग का मूल लक्ष्य यह बोध प्राप्त करना है कि व्यक्ति का निज स्वरूप ही सर्वव्यापी शिव है। आत्मा ही चैतन्य है इसलिए आत्मा को प्राप्त करना ही योग है !
  2. • उद्यमो भैरवः (सूत्र १.५): अंतर्मुखी चेतना का तीव्र और निरन्तर प्रयास ही 'भैरव' (परम शिव अवस्था) की प्राप्ति कराता है। यहाँ उद्यम या आंतरिक जागरण ही सच्चा योग है।
  3. • ज्ञानं बन्धः (सूत्र १.२): सीमित या अज्ञानतापूर्ण ज्ञान ही बंधन है। इससे मुक्त होकर पूर्ण संविद (शुद्ध चेतना) में ठहरना ही योग है।ज्ञान से मुक्त होकर चेतना में ठहराव ही योग है !
  4. • जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्त-भेदे तुर्याभोग-संभवः (सूत्र १.७): तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) में तुरीय अवस्था (अतीत चेतना) का निरंतर अनुभव ही योग की सिद्धि है।
शिव सूत्र में योग के तीन मुख्य मार्ग (उपाय) -
शिव सूत्र में आत्मा के शिवत्व (परम चेतना) को पाने के लिए योग साधना को तीन स्तरों पर विभाजित किया गया है:
1. शाम्भव उपाय (इच्छा योग - उच्च साधना)
  • मूल सिद्धांत : इसमें बिना किसी जप, ध्यान या प्राणायाम के केवल तीव्र इच्छा शक्ति और ज्ञान मात्र से शिवत्व की प्राप्ति होती है।
  • प्रमुख सूत्र : "चैतन्यमात्मा" (आत्मा ही चैतन्य है) और "ज्ञानं बंधः" (सीमित ज्ञान ही बंधन है)।
  • योग का स्वरूप : साधक को यह अहसास होता है कि उसका अपना अहं ही पूर्ण शिव चेतना है।
2. शाक्त उपाय (ज्ञान योग - सूक्ष्म साधना)
  • मूल सिद्धांत : इसमें शुद्ध संकल्प, विचार और अंतर्मुखी ध्यान (भवना) द्वारा चित्त की अशुद्धियों को दूर किया जाता है।
  • प्रमुख सूत्र : "चित्तं मंत्रः" (साधक का शुद्ध चित्त ही स्वयं मंत्र बन जाता है)।
  • योग का स्वरूप : जब मन के सारे विकल्प समाप्त हो जाते हैं, तब सर्वत्र एक ही शक्ति का अनुभव होता है।
3. आणव उपाय (क्रिया योग - स्थूल साधना)
  • मूल सिद्धांत : यह साधारण साधकों के लिए प्राणायाम, मंत्र जप, मुद्रा और ध्यान के माध्यम से की जाने वाली साधना है।
  • प्रमुख सूत्र : "जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः" (जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में तुरीय अवस्था का आनंद पाना)।
  • योग का स्वरूप : अपनी सांसों (प्राण) और शारीरिक इंद्रियों को नियंत्रित कर परम चेतना में स्थिर होना।
शिव सूत्र के अनुसार योग का मुख्य उद्देश्य :
विषय शिव सूत्र का दृष्टिकोण
चेतना की स्थिति केवल ध्यान लगाना योग नहीं है, बल्कि हर पल स्वयं को शिव स्वरूप अनुभव करना योग है।
जगत की दृष्टि "दृश्यं शरीरम्" — साधक के लिए संपूर्ण संसार और अपना शरीर शिव का ही नृत्य/रूप प्रतीत होता है।
मुक्ति का अर्थ "जीवन्मुक्तः" — जीवित रहते हुए सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर आनंद में रहना।
द्रष्टव्य : पतंजलि योग सूत्र जहाँ चित्त की वृत्तियों के निरोध पर बल देता है, वहीं शिव सूत्र चित्त के शिवत्व में विलय और प्रकाश (उन्मेष) पर जोर देता है।

ऋग्वेद में योग का उल्लेख :
ऋग्वेद विश्व का सबसे प्राचीन ग्रंथ है, जहाँ योग शब्द का प्रयोग 'जोड़ने', 'नियंत्रण' और 'साधना' के अर्थ में हुआ है।
• • इंद्रियों का नियंत्रण: ऋग्वेद (5.81.1) में प्रसिद्ध मंत्र आता है — "युंजते मन उत युंजते धियो..." अर्थात विद्वान और साधक अपने मन और बुद्धि को परम तत्व से जोड़ते (नियंत्रित करते) हैं।

• • तप और ध्यान: ऋग्वेद में मुनियों और ऋषियों के ध्यानस्थ होने, श्वास नियंत्रण (प्राणायाम के शुरुआती संकेत) और अग्नि/सूर्य के प्रति मानसिक एकाग्रता का वर्णन है।
• 'युज्' धातु: योग शब्द संस्कृत की 'युज्' (जोड़ना) धातु से बना है, जिसका उपयोग ऋग्वेद में आत्मा और परमात्मा के मिलन के लिए प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

अथर्ववेद में योग का वर्णन केवल शारीरिक आसनों तक सीमित न होकर प्राणविद्या, मानसिक नियंत्रण, अध्यात्म और औषधीय योग (चिकित्सा) के व्यापक रूप में मिलता है।
अथर्ववेद में योग का रूप व्यावहारिक, प्राण-विद्या और आध्यात्मिक साधना से जुड़ा है:
1. प्राणविद्या और श्वास नियंत्रण (प्राणायाम का मूल) :
अथर्ववेद के 11वें काण्ड का 4था सूक्त पूरी तरह से 'प्राण' को समर्पित है, जिसे 'प्राण सूक्त' कहा जाता है। इसमें प्राण को संपूर्ण ब्रह्मांड और जीवन की मूल शक्ति माना गया है:
• • प्राण और अपान : इसमें श्वास (प्राण) और उच्छ्वास (अपान) के संतुलन पर बल दिया गया है, जो बाद में पतंजलि योगशास्त्र में प्राणायाम का आधार बना।
• • इंद्रियों पर नियंत्रण : प्राण सूक्त के अनुसार, जब साधक अपने प्राण को वश में करता है, तो उसकी सभी इंद्रियाँ और मन स्वतः नियंत्रित हो जाते हैं।
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अथर्ववेद में योग के व्यावहारिक अंगों—विशेषकर प्राणायाम और अन्तर्मुखी ध्यान—का विशद वर्णन है:
अन्तर्मुखी चेतना (ध्यान व धारणा):
अथर्ववेद (10.8.43) में मानव शरीर को नौ द्वारों वाली नगरी (नवद्वारा पुरम्) कहा गया है, जो योगशास्त्र के 'सूक्ष्म शरीर' और 'चक्रों' की अवधारणा का आधार है:
अष्टाचक्रा नवद्वारों देवानां पूरयोध्या।
(आठ चक्रों और नौ द्वारों वाली यह देह देवों की नगरी है।)
यहाँ शरीर के भीतर साधना करके आत्मज्ञान प्राप्त करने की युक्ति को ही योग माना गया है।

2. 'योग-क्षेम' की अवधारणा :
अथर्ववेद (19.9.2) में योग का स्पष्ट उल्लेख मिलता है:
"अष्टाविंशानि शिवानि शग्मानि सह योगं भजन्तु मे । योगं प्र पद्ये क्षेमं च क्षेमं प्र पद्ये योगं च नमोSहोरात्राभ्यामस्तु"
अर्थ :- "अट्ठाईस (नक्षत्र) मेरे लिए कल्याणकारी और सुखद हों, तथा वे मुझे योग (अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति) से जोड़ें। मैं योग (प्राप्ति) की शरण लेता हूँ और क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा) की शरण लेता हूँ; मैं क्षेम की शरण लेता हूँ और योग की शरण लेता हूँ। दिन और रात (अहोरात्र) को मेरा नमस्कार हो।"
मंत्र का भावार्थ:
  • अष्टाविंशानि शिवानि : यहाँ आकाश के २८ नक्षत्रों (२७ मुख्य नक्षत्र + अभिजित नक्षत्र) के कल्याणकारी होने की प्रार्थना की गई है।
  • योग और क्षेम : योग का अर्थ है जो वस्तु या लाभ हमारे पास नहीं है, उसे प्राप्त करना; और क्षेम का अर्थ है जो प्राप्त हो चुका है, उसकी रक्षा व सुरक्षा करना।
  • अहोरात्राभ्याम् : समय के प्रतीक स्वरूप दिन और रात दोनों को नमन किया गया है ताकि जीवन में निरंतर संतुलन और शांति बनी रहे।
यहाँ योग का अर्थ केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों के जुड़ाव (एकीकरण) से है।
3. 'व्रात्य काण्ड' और योग साधना
  • इसमें साधकों द्वारा किए जाने वाले विशेष प्रकार के शारीरिक नियमों, तपस्या और ध्यान की अवस्थाओं का उल्लेख है। li>
  • इसे वैदिक काल में योग की क्रियात्मक साधना (Tantric and Ascetic Practice) का प्रारंभिक रूप माना जाता है।
4. आयुर्वेद और औषधीय 'योग'
अथर्ववेद को आयुर्वेद का मुख्य स्रोत माना जाता है। इसमें 'योग' शब्द का प्रयोग औषधीय मिश्रण (Formulations) और चिकित्सा पद्धतियों के लिए भी हुआ है:
  • मानसिक और शारीरिक रोगों के निवारण के लिए जड़ी-बूटियों और मंत्रों के संयोजन (योग) का प्रयोग।
  • त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के संतुलन द्वारा शरीर को स्वस्थ रखकर ध्यान के योग्य बनाना।
5. मन का नियंत्रण और ध्यान
अथर्ववेद में मन को चंचल माना गया है और उसे स्थिर करने के लिए मंत्र-साधना तथा ध्यान का निर्देश दिया गया है। मन, बुद्धि और आत्मा के सामंजस्य को ही इसमें योग की स्थिति माना गया है।
सार: अथर्ववेद में योग का स्वरूप प्राण साधना, ध्यान, मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक-शारीरिक आरोग्य का एक समग्र रूप (Holistic Integration) प्रस्तुत करता है।

यजुर्वेद में 'योग' शब्द की परिभाषा पतंजलि के योगसूत्र (जैसे—'चित्तवृत्ति निरोध') या भगवद्गीता (जैसे—'समत्वं योग उच्यते') की तरह किसी एक दार्शनिक सूत्र-वाक्य के रूप में नहीं दी गई है। यजुर्वेद मुख्य रूप से यज्ञ, कर्मकांड और उपासना का वेद है, इसलिए यहाँ योग का अर्थ मन, बुद्धि, प्राण और आत्मा को परमात्मा में नियोजित करना, संयमित करना और जोड़ना है।
यजुर्वेद में योग के तीन मुख्य आयाम देखने को मिलते हैं:
1. मन और बुद्धि को ईश्वर में लगाना (युंजते मनः)
यजुर्वेद का प्रसिद्ध योग-सूक्त (अध्याय 11, मंत्र 1 से 5) साधना और योग की नींव रखता है। यहाँ कहा गया है:
युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः।(यजुर्वेद 11.1)
  • अर्थ:ज्ञानी और ध्यानरत साधक अपने मन (संकल्प-विकल्प) और अपनी बुद्धि (विवेक) को उस अनंत, सर्वज्ञ परमात्मा के ध्यान में संयोजित (योग) करते हैं।
  • योग की परिभाषा: मन और बुद्धि को संसार के विषयों से हटाकर ईश्वर में स्थिर कर देना ही वैदिक योग है।
2. इंद्रियों और चेतना का नियमन (युंजे वाचं)
यजुर्वेद के अनुसार, योग केवल शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि अपनी वाणी, प्राण और इंद्रियों को धर्म और सत्य के मार्ग पर नियोजित करना है।
युञ्जानाः प्रथमं मनः सविता देवाय तत्त्वया... (यजुर्वेद 11.2)
साधक सबसे पहले अपने मन को परमात्मा में जोड़ता है, फिर अपनी ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों को आध्यात्मिक प्रकाश की ओर मोड़ता है।
3. 'शिव संकल्प' — मन की पवित्रता (अध्याय 34)
यजुर्वेद का 34वाँ अध्याय शिवसंकल्प सूक्त के नाम से जाना जाता है, जो मानसिक योग का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।
तन्म मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥(यजुर्वेद 34.1)
  • अर्थ: "मेरा मन कल्याणकारी और शुभ संकल्पों से युक्त हो।"
  • योग का परिप्रेक्ष्य: यजुर्वेद मानता है कि चंचल मन को नियंत्रित करके उसे कल्याणकारी विचारों से भरना ही वास्तविक योग की स्थिति है।
यजुर्वेद में 'योग' का सार :
यदि यजुर्वेद के परिप्रेक्ष्य से योग की परिभाषा को समेटा जाए, तो:
  • 1. युज् धातु का प्रयोग : यजुर्वेद में योग का मूल अर्थ 'संयोग' (ईश्वर से जुड़ना) और 'संयमन' (मन-इंद्रियों को वश में करना) दोनों रूपों में प्रयुक्त हुआ है।
  • 2. आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया: प्राण और मन को एकाग्र करके परम तत्व (परमात्मा) को जानना ही यजुर्वेद का मुख्य लक्ष्य है।
निष्कर्ष: यजुर्वेद के अनुसार — "अपने मन, बुद्धि, प्राण और इंद्रियों को सांसारिक विकारों से हटाकर परमपिता परमात्मा के ध्यान और श्रेष्ठ कर्मों में संयोजित (जोड़ना) कर देना ही योग है।"

सामवेद मूलतः "गान" (संगीत) और उपासना का वेद है। इसमें पतंजलि योगसूत्र या हठयोग की तरह सीधे आसन या प्राणायाम की विधियां नहीं मिलतीं, बल्कि इसमें नाद योग (Sound Yoga), स्वर योग, ध्यान और भक्ति योग का बीजरूप वर्णन मिलता है।
सामवेद के अनुसार योग के प्रमुख पक्ष:
1. नाद योग और स्वर साधना (Yoga of Sound)
• • मंत्र एवं संगीत का योग: सामवेद के मंत्रों (ऋचाओं) को लय, ताल और स्वर के साथ गाया जाता है। ऋषियों के अनुसार, जब स्वर और शब्द एकाग्रता से जुड़ते हैं, तो वह मन को समाधि की स्थिति में ले जाने वाला नाद योग बनता है। ।
• • सात स्वर: सामवेद से ही भारतीय संगीत के सात स्वरों (साम-गान) का जन्म हुआ, जिनका प्रयोग चित्त की वृत्तियों को शांत (मन को एकाग्र) करने के लिए किया जाता था।

2. सामवेद से जुड़े उपनिषदों में योग (छान्दोग्य और केन)
सामवेद के अंतर्गत आने वाले उपनिषदों में योग दर्शन का गहरा वर्णन है:
• • ओम् (ॐ) की उपासना (उद्गीथ योग): छान्दोग्य उपनिषद में 'ॐ' (उद्गीथ) को परम तत्व मानकर उस पर ध्यान लगाने का निर्देश है। यह प्राणायाम और मानसिक जप के द्वारा आत्म-साक्षात्कार का मार्ग बताता है। ।
• • प्राण और मन का योग: इसमें प्राण (श्वास) को शरीर का मुख्य बल और मन का आधार बताया गया है, जो आगे चलकर प्राणायाम और ध्यान योग का आधार बना।

3. सामवेद में वर्णित योग के रूप
योग का प्रकार सामवेद में रूप / वर्णन
• नाद / संगीत योग स्वरों की साधना द्वारा मन को परमात्मा में लीन करना।
• मंत्र / जप योग ऋचाओं का शुद्ध उच्चारण और साम-गान के द्वारा अंतःकरण की शुद्धि।
• ध्यान योग संगीत और ओंकार के उच्चारण से मन की एकाग्रता और समाधि की प्राप्ति।
• भक्ति योग ईश्वर (अग्नि, इन्द्र, सोम) के प्रति लयबद्ध गीतों के माध्यम से समर्पण और स्तुति।

श्रीमद्भगवद्गीता का संदर्भ
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में सामवेद के आध्यात्मिक और योगिक महत्व को स्वीकार करते हुए कहा है:
"वेदानां सामवेदोऽस्मि..." (वेदों में मैं सामवेद हूँ।)
सामवेद का योग मुख्य रूप से "कंठ और मन के तालमेल से परमात्मा से जुड़ने" (नाद और ध्यान योग) की विद्या है।

उपनिषदों में योग केवल कर्मकांड या मंत्रोच्चार न रहकर आत्म-साक्षात्कार की एक व्यावहारिक तकनीक के रूप में विकसित हुआ।
मुख्य उपनिषदों (जिन्हें प्रमुख उपनिषद या दस उपनिषद भी कहा जाता है) के नाम निम्नलिखित हैं:
    1. ईशावास्योपनिषद, 2. केनोपनिषद, 3. कठोपनिषद, 4. प्रश्नोपनिषद, 5. मुण्डकोपनिषद, 6. माण्डूक्योपनिषद, 7. तैत्तिरीयोपनिषद, 8. ऐतरेयोपनिषद, 9. छांदोग्योपनिषद, 10. बृहदारण्यकोपनिषद
    मुक्तिकोपनिषद के अनुसार कुल 108 उपनिषद माने गए हैं, जिनमें उपर्युक्त 10 के अलावा तीन और उपनिषद
    11. श्वेताश्वतरोपनिषद , 12. कौषीतकि उपनिषद, और 13. मैत्रायणी उपनिषद भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
1 • ईशावास्योपनिषद के अनुसार योग का मुख्य सार निम्नलिखित सिद्धांतों में समाहित है: :
    1. अनासक्ति और निष्काम कर्म (कर्मयोग) - उपनिषद के दूसरे मंत्र में कर्मयोग का मूल दर्शन मिलता है:
      कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ (मंत्र 2)।

      अर्थ: मनुष्य को इस संसार में निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों/कर्मों को करते हुए 100 वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। इस प्रकार अनासक्त होकर कर्म करने से मनुष्य कर्म-बंधन में नहीं फंसता।

      यौगिक दृष्टिकोण : यही भावना श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कर्मयोग का आधार बनती है। कर्म त्यागना योग नहीं है, बल्कि कर्मफल के प्रति आसक्ति का त्याग करके कर्तव्य का पालन करना ही योग है।
    2. त्यागपूर्वक भोग और ईशावास्य भाव (ज्ञानयोग)
    प्रथम मंत्र में ही उपनिषद जीवन और जगत को देखने का योग-दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है:
      ईशा वास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥ (मंत्र 1)
    • अर्थ : इस परिवर्तनशील जगत् में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। इसलिए इसका उपभोग त्याग भाव (अनासक्ति) के साथ करो और किसी के धन या वस्तु की लालसा मत करो।
    • यौगिक दृष्टिकोण : विषयों का संयमित और त्यागमय उपभोग ही चित्त की शुद्धि और समत्व की स्थिति (योग) की ओर ले जाता है।
    3. विद्या और अविद्या का संतुलन (समन्वय योग)
    ईशावास्योपनिषद केवल संसार के कर्मों में डूबे रहने या केवल कर्म त्यागकर संन्यास लेने—दोनों एकांगी मार्गों को अधूरा मानती है:
      विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥ (मंत्र 11)
    • अर्थ : जो मनुष्य अविद्या (लौकिक ज्ञान / कर्म / व्यावहारिक कर्तव्य) और विद्या (अध्यात्म ज्ञान / आत्मज्ञान) दोनों को एक साथ जानता है, वह अविद्या से मृत्यु (सांसारिक दुःखों) को पार करके विद्या से अमरता (मोक्ष) प्राप्त करता है।
    • यौगिक दृष्टिकोण : कर्म (बाहरी जगत) और ज्ञान/ध्यान (आंतरिक जगत) के बीच संतुलन स्थापित करना ही वास्तविक योग है।
    4. सर्वभूतेषु चात्मानम् (अद्वैत/एकात्म योग)
    उपनिषद के छठे और सातवें मंत्र में योग की उच्चतम अवस्था (सर्वज्ञता/आत्मभाव) का वर्णन है:
      यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥ (मंत्र 6)
    • अर्थ :जो साधक समस्त प्राणियों को अपनी ही आत्मा में देखता है और अपनी आत्मा को सभी प्राणियों में देखता है, वह किसी से घृणा या द्वेष नहीं करता।
    • यौगिक दृष्टिकोण : स्वयं का संपूर्ण ब्रह्मांड के साथ एकत्व स्थापित होना ही योग (Union) का परम लक्ष्य है।
2 • केनोपनिषद केनोपनिषद् के अनुसार योग का मुख्य सार निम्नलिखित बिन्दुओं में समझा जा सकता है:
    1. इन्द्रियों और मन के मूल प्रेरक को जानना (स्रोत-साक्षात्कार)
    केनोपनिषद् की शुरुआत ही इस प्रश्न से होती है कि मन किसके द्वारा प्रेरित होकर विषयों में गिरता है और इन्द्रियाँ किसके द्वारा संचालित होती हैं?
      "श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणश्चक्षुषश्चक्षुः।" (केनोपनिषद् १.२)
    • अर्थ : वह ब्रह्म कानों का कान, मन का मन, वाणी की वाणी, प्राण का प्राण और आँखों की आँख है।
    • योग के संदर्भ में : बाहर भटकती हुई इन्द्रियों और मन को विषयों से हटाकर उनके मूल स्रोत (परमात्मा/ब्रह्म) में एकाग्र कर देना ही केनोपनिषद् का योग-साधन है।
    2. इन्द्रिय-अभिमान और अहंकार का त्याग
      केनोपनिषद् के प्रसिद्ध 'देवासुर संग्राम और यक्ष-उपाख्यान' (जहाँ अग्नि, वायु और इन्द्र का अहंकार दूर होता है) के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि व्यक्ति की अपनी शक्ति (शरीर, प्राण, मन) कुछ नहीं है; जो कुछ शक्ति है वह उस परम चेतना की ही है। अहंकार का विसर्जन करके उस परम सत्ता में लीन होना ही केनोपनिषद् की योगिक अवस्था है।
    3. ब्रह्मप्राप्ति के मुख्य साधन (योगिक आधार)
    केनोपनिषद् के चतुर्थ खण्ड (मंत्र ८) में ब्रह्मविद्या/योगसाधना के तीन प्रमुख आधार स्तम्भ (साधन) बताए गए हैं:
      "तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम्॥" (केनोपनिषद् ४.८)
    • तप : शरीर और मन को संयमित व पवित्र करना।
    • दम : इन्द्रियों का दमन या निग्रह करना (मन और इन्द्रियों को वश में रखना)।
    • कर्म : निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना।
    • सत्य : सत्य निष्ठा ही इस परम ज्ञान का मुख्य निवास स्थान (आयन) है।
    • निष्कर्ष : यद्यपि केनोपनिषद् में योग शब्द की सीधी परिभाषा नहीं है, लेकिन इन्द्रियों एवं मन को उनके अंतिम प्रकाशक (ब्रह्म) में विलीन करना, तप-दम के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार करना ही केनोपनिषद् का योग-मार्ग है।
3 • कठोपनिषद (योग की पहली स्पष्ट परिभाषा) :
    ("ताम् योगमिति मन्यन्ते स्थिराम इन्द्रिय धारणाम्" - कठोपनिषद 2.6.11)। अर्थात् इंद्रियों के इस स्थिर धारणा/नियंत्रण की अवस्था को ही ज्ञानी जन 'योग' कहते हैं। इसमें नचिकेता और यम के संवाद में ध्यान प्रणाली का वर्णन है।
4 • प्रश्नोपनिषद के अनुसार योग के प्रमुख पहलू: :
    1. प्राण-साधना (प्राण ही योग का आधार है)
    दूसरे और तीसरे प्रश्न में प्राण के महत्त्व को समझाया गया है। मुख्य प्राण ही शरीर की सभी इन्द्रियों, मन और पंचप्राणों (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान) को संचालित करता है।
    • जब साधक का प्राण पर नियंत्रण होता है, तो वह मन और शरीर की समस्त शक्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है।
    • प्राण का संतुलन ही योगिक साधना का पहला चरण माना गया है।
    2. इन्द्रियों और मन का उपशम (प्रत्याहार और सुषुप्ति)
    चौथे प्रश्न (सौर्यायणि गार्ग्य का प्रश्न) में यह स्पष्ट किया गया है कि योग का अर्थ इन्द्रियों का उनके उद्गम स्थान में लीन हो जाना है:
    जैसे सूर्यास्त के समय सूर्य की सभी किरणें सूर्य मण्डल में एकत्र हो जाती हैं, उसी प्रकार स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था में समस्त इन्द्रियाँ मन में लीन होकर एकीभूत (एकीभाव) हो जाती हैं। जब इन्द्रियाँ मन में और मन आत्म-स्वरूप में स्थिर होता है, तब दृष्टा अपनी वास्तविक स्थिति का अनुभव करता है। उपनिषद में इसे ही परम शांति एवं आत्म-स्थिति (योग की पूर्णावस्था) कहा गया है।
    3. ओंकार (ओम्) का ध्यान (ध्यान-योग)
    पाँचवें प्रश्न में महर्षि पिप्पलाद ने ओम् की तीन मात्राओं (अ, उ, म) के ध्यान के फल की व्याख्या की है:
    • एकामात्र (अ) : इससे साधक पुनः मनुष्य लोक प्राप्त करता है।
    • द्विमात्रा (उ) : इससे साधक पुनः मनुष्य लोक प्राप्त करता है।
    • त्रिमात्रा (अ, उ, म - पूर्ण ओम्) : जब साधक 'ओम्' के तीनों अक्षरों द्वारा 'परम पुरुष' का ध्यान करता है, तब वह पापों से मुक्त होकर परम ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
    प्रश्नोपनिषद में ओंकार के ध्यान को ही ब्रह्म-प्राप्ति का सर्वोच्च योग-मार्ग माना गया है।
    प्रश्नोपनिषद के अनुसार जीवात्मा (प्राण) का अपने मूल स्रोत परम पुरुष (ब्रह्म) के साथ एकीभाव ही योग की तात्विक परिभाषा है।
5 • मुण्डकोपनिषद में योग के व्यावहारिक और साधनात्मक स्वरूप को निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं से समझा जा सकता है:
    1. धनुष-बाण का विख्यात प्रतीक (ध्यान योग का स्वरूप)
    मुण्डकोपनिषद (2.2.3-4) में ध्यान और मन की एकाग्रता को योग का मुख्य साधन बताते हुए एक बहुत ही प्रसिद्ध उदाहरण दिया गया है:
    धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं सन्धयीत।
    आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि॥
    प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
    अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥
    • धनुष : प्रणव यानी 'ओंकार' (ॐ)
    • बाण : साधक का 'जीवात्मा' उपासना से तीक्ष्ण किया गया।
    • लक्ष्य : परम सत्य यानी 'ब्रह्म'
    • अर्थ: ओंकार-रूपी धनुष पर आत्मा-रूपी बाण को चढ़ाकर, मन को पूर्णतः ब्रह्म में लीन करके, अप्रमत्त (बिना किसी प्रमाद या भटकाव के) होकर लक्ष्य को भेदना चाहिए, जिससे आत्मा और ब्रह्म एक हो जाएं (जैसे बाण लक्ष्य में समा जाता है)। इसी एकाग्रता और तन्मयता की प्रक्रिया को यहाँ योग कहा गया है।
    2. संयम और सत्य द्वारा आत्म-साक्षात्कार
    मुण्डकोपनिषद (3.1.5) के अनुसार, योग का अर्थ केवल शारीरिक अभ्यास न होकर मन और इंद्रियों की शुद्धि है:
    सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्।
    परम आत्मा को केवल सत्य, तप, सम्यक ज्ञान और ब्रह्मचर्य (इंद्रिय-संयम) के निरंतर अभ्यास द्वारा ही अंतःकरण में साक्षात्कार किया जा सकता है।
    3. 'वेदांत-विज्ञान-सुनिश्चितार्थाः' (संन्यास और योग द्वारा चित्त शुद्धि)
    मुण्डकोपनिषद (3.2.6) में योग के निष्काम स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है:
    वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः।
    जिन्होंने वेदांत के ज्ञान से परमार्थ तत्त्व को भली-भांति निश्चय कर लिया है, और जिनका चित्त 'संन्यास योग' (कर्मफल के त्याग और ज्ञान-साधना) के द्वारा अत्यंत शुद्ध हो चुका है, वे साधक ब्रह्म-लोक में परम अमरता (मुक्ति) को प्राप्त करते हैं।
    निष्कर्ष :
    मुण्डकोपनिषद में योग का अर्थ है: "ओंकार के ध्यान द्वारा अपने जीवात्मा को बिना किसी भटकाव के परमात्म-लक्ष्य में लीन कर देना तथा सत्य, तप और संयम से अंतःकरण को शुद्ध करके आत्म-साक्षात्कार करना।"
6 • माण्डूक्योपनिषद में और इस पर आधारित गौड़पादाचार्य की माण्डूक्य कारिका में योग का अत्यंत गूढ़ और उच्च आध्यात्मिक स्वरूप समझाया गया है।
माण्डूक्योपनिषद के अनुसार योग की अवधारणा दो मुख्य स्तम्भों पर टिकी है:
    1. ओंकार (AUM) साधना और तुरीय अवस्था : माण्डूक्योपनिषद चेतना की चार अवस्थाओं और ॐ की तीन मात्राओं (अ, उ, म) के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार को ही योग का लक्ष्य मानती है:
    • 'अ' (A): जाग्रत अवस्था (वैश्वानर)
    • 'उ' (U): स्वप्न अवस्था (तैजस)
    • 'म' (M): सुषुप्ति/गहरी नींद अवस्था (प्राज्ञ)
    • अमात्र (अशब्द silence): तुरीय अवस्था — यह चेतना का चौथा पाद है, जो तीनों अवस्थाओं का साक्षी है।
    योग की परिभाषा (उपनिषदीय दृष्टि से): चेतना के बाहरी और आंतरिक विकारों को पार करके ओंकार के अमात्र स्वरूप (मौन) में लीन होना तथा स्वयं को शुद्ध, अद्वैत 'तुरीय' रूप में जानना ही योग है।
7 • तैत्तिरीयोपनिषद में योग को आत्मा-परमात्मा के ऐक्य, पंचकोशों के विवेक (Self-Realization) और संयमित अनुशासित जीवन के रूप में व्यावहारिक एवं दार्शनिक रूप से समझाया गया है।
    तैत्तिरीयोपनिषद में योग के स्वरूप और उसकी अवधारणा को मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
      1. योग का मूल स्वरूप: जीवात्मा और परमात्मा का एकीकरण :
      तैत्तिरीयोपनिषद (आनंदवल्ली) में योग का सार जीवात्मा और परमात्मा की अभिन्नता को जानना माना गया है:
      "स यश्चायं पुरुषे। यश्चासावादित्ये। स एकः।"
      अर्थ: जो चैतन्य तत्व इस मनुष्य में है और जो उस आदित्य (सूर्य/ब्रह्मांड) में है, वह वास्तव में एक ही है। उसी एकत्व का अनुभव करना योग है।
      2. पंचकोश विवेक (Pancha Kosha Theory) :
      तैत्तिरीयोपनिषद का सबसे महत्वपूर्ण योगदान पंचकोश सिद्धांत है। योग साधना के माध्यम से साधक स्थूल शरीर से सूक्ष्म चेतना की ओर यात्रा करता है:
        अन्नमय कोश: स्थूल भौतिक शरीर प्राणमय
        कोश: प्राण वायु और जीवन शक्ति
        मनोमय कोश: मन, विचार और भावनाएं
        विज्ञानमय कोश: बुद्धि, विवेक और अंतर्दृष्टि
        आनंदमय कोश: शुद्ध आनंद और परम चेतना
        इन पांचों कोशों का भेदन कर अंतिम आनंदमय कोश से परे 'ब्रह्म' की स्थिति को प्राप्त करना ही योग का परम साध्य है।
      3. 'योग आत्मा' (विज्ञानमय कोश में योग का उल्लेख) :
      तैत्तिरीयोपनिषद के विज्ञानमय कोश का वर्णन करते हुए 'योग' शब्द का स्पष्ट प्रयोग हुआ है:
      "तस्य श्रद्धैव शिरः। ऋतं दक्षिणः पक्षः। सत्यमुत्तरः पक्षः। योग आत्मा। महः पुच्छं प्रतिष्ठा।"
      अर्थ: विज्ञानमय पुरुष की श्रद्धा सिर है, ऋत (प्राकृतिक नियम) दायां पक्ष है, सत्य बायां पक्ष है, और 'योग' उसका मध्य भाग (आत्मा/धड़) है, तथा 'महः' (महत्तत्व) उसकी प्रतिष्ठा/आधार है।
      यहाँ योग का अर्थ चित्त की एकाग्रता, संतुलन और समत्व से है जो बुद्धि को सत्य में स्थिर करता है।
      4. तप और स्वाध्याय (योग के व्यावहारिक अंग) :
        शीक्षावल्ली एवं भृगुवल्ली में तप, स्वाध्याय, सत्य, दम (इंद्रिय निग्रह) और शम (मन का संयम) पर अत्यधिक बल दिया गया है। महर्षि भृगु ने अपने पिता वरुण के उपदेश से बार-बार तप करके ही पंचकोशों का ज्ञान प्राप्त किया था। उपनिषद के अनुसार तप ही योग का मुख्य साधन है।
      संक्षेप में: तैत्तिरीयोपनिषद के अनुसार - "अज्ञान और स्थूल शरीरादि कोशों से परे उठकर श्रद्धा, सत्य और संयम (योग आत्मा) के द्वारा स्वयं को ब्रह्म रूप (आनंद) में लीन कर देना ही योग है।"
8 • ऐतरेयोपनिषद में योग का मूल विचार "प्रज्ञानं ब्रह्म" (प्रज्ञान ही ब्रह्म है) तथा आत्मा की एकता के सिद्धांत में समाहित है।
ऐतरेयोपनिषद के परिपेक्ष्य में योग के मूल भाव को निम्नलिखित रूपों में समझा जाता है:
    1. प्रज्ञान ही योग का चरम लक्ष्य (प्रज्ञानं ब्रह्म) :
    ऐतरेयोपनिषद (3.1.3) का सबसे प्रमुख महावाक्य है — "प्रज्ञानं ब्रह्म" (शुद्ध चेतना ही ब्रह्म है)।
      यहाँ योग की अवस्था का अर्थ जीव की चेतना (प्रज्ञा) का परम चेतना (ब्रह्म) में विलीन हो जाना है। मन, बुद्धि, इंद्रियों और समस्त ज्ञान-क्रियाओं का आधार यह 'प्रज्ञान' (चेतना) ही है। इस सत्य को जानना ही योग है।
    2. इंद्रियों व प्राण का आत्मा में एकीकरण :
    ऐतरेयोपनिषद में सृष्टि-उत्पत्ति के वर्णन के दौरान बताया गया है कि परमेश्वर ने ही शरीर और उसमें इंद्रियों एवं प्राण का प्रवेश कराया।
      जब साधक अपनी समस्त बाह्य वृत्तियों, इंद्रियों और प्राण को विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करके आत्मा में स्थित (एकाग्र) कर लेता है, वही वास्तविक योग-स्थिति है।
    3. 'सृष्टि-प्रक्रिया' का विचार और आत्म-साक्षात्कार :
    उपनिषद के अनुसार, जीवात्मा अपने अज्ञान के कारण स्वयं को शरीर, मन और अहंकार से बाँध लेता है।
      अज्ञान के इन बंधनों को काटकर स्वयं के वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को पहचानना और परम चेतना से अभेद स्थापित करना ही ऐतरेयोपनिषद का योग दर्शन है।
    संक्षिप्त निष्कर्ष :
    विषय विवरण
    मुख्य विचार प्रज्ञानं ब्रह्म (शुद्ध चेतन तत्त्व ही ब्रह्म है)
    योग का स्वरूप ज्ञानयोग एवं आत्म-साक्षात्कार
    साधना का लक्ष्य चित्त/इंद्रियों को अंतर्मुखी करके आत्मा और ब्रह्म के अभेद को जानना
9 • छांदोग्योपनिषद में किसी शारीरिक या व्यावहारिक योग प्रणाली के रूप में नहीं, बल्कि उपासना, ध्यान, प्राण-साधना और ॐकार (उद्गीथ) के चिंतन के संदर्भ में किया गया है।
    छांदोग्योपनिषद के अनुसार योग के मुख्य सिद्धांत:
      1. उद्गीथ (ॐकार) उपासना एवं ध्यान:
        इस उपनिषद में 'ॐ' (अक्षर ब्रह्म) को ही मुख्य आलंबन माना गया है। मन और वाणी को एकाग्र करके ॐकार पर ध्यान लगाना ही ज्ञान योग और ध्यान योग का आधार है।
      2. प्राण साधना (मुख्य प्राण):
        इंद्रियों और मन की गति को नियंत्रित करने के लिए 'मुख्य प्राण' की उपासना का निर्देश दिया गया है। प्राण को ही समस्त क्रियाओं और जीवन का सार माना गया है, जो बाद में योग में प्राणायाम का आधार बना।
      3. 'तत्वमसि' (जीवात्मा और परमात्मा का ऐक्य):
        छान्दोग्य उपनिषद का मुख्य दर्शन "तत्त्वमसि" (वह तुम ही हो) है। जीवात्मा (आत्म-स्वरूप) का परमात्मा (ब्रह्म) के साथ एकत्व का ज्ञान प्राप्त करना ही यहाँ योग (मिलन) की परम स्थिति है।
      4. नाड़ी ज्ञान एवं देहोत्क्रमण:
        छांदोग्योपनिषद (8.6.6) में हृदय की 101 नाड़ियों का वर्णन मिलता है। इनमें से एक नाड़ी (सुषुम्णा) मस्तक की ओर जाती है। ध्यान द्वारा इस नाड़ी से प्राण को ऊर्ध्वगामी बनाना ही मोक्ष का मार्ग बताया गया है, जो योगशास्त्र की कुण्डलिनी और नाड़ी-विद्या का मूल स्रोत है।
      संक्षेप में: छांदोग्योपनिषद में योग का अर्थ चित्त की एकाग्रता, प्राण की उपासना और ॐकार के माध्यम से आत्मा का ब्रह्म में लीन होना है।
10 • बृहदारण्यकोपनिषद में योग के दार्शनिक आधार और साधना पद्धतियों की स्पष्ट व्याख्या मिलती है।
    बृहदारण्यकोपनिषद के अनुसार योग का मुख्य स्वरूप और परिभाषाएँ इस प्रकार हैं:
    1. जीवात्मा और परमात्मा का एकीकरण (संयोग) :
      उपनिषद के अनुसार योग का मूल अर्थ है जीवात्मा (आत्मा) और सर्वव्यापी सत्ता (ब्रह्म) का एक हो जाना।
    • अहं ब्रह्मास्मि (1.4.10): "मैं ही ब्रह्म हूँ।" इस अद्वैत स्थिति को अनुभव करना ही योग की अंतिम परिणति या समाधि है।
    2. आत्म-ज्ञान का तीन-स्तरीय योग मार्ग :
      महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी को आत्म-साक्षात्कार (योग साधना) के तीन मूलभूत चरण बताते हैं (2.4.5):
      महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी को आत्म-साक्षात्कार (योग साधना) के तीन मूलभूत चरण बताते हैं (2.4.5):
    • श्रवण (Hearing) :ज्ञान को उपनिषदों या गुरु से सुनना/समझना।
    • मनन (Reflection) :ज्ञान को उपनिषदों या गुरु से सुनना/समझना।
    • निदिध्यासन (Deep Meditation) :ज्ञान को उपनिषदों या गुरु से सुनना/समझना।
    3. प्राण-साधना (प्राण योग) :
      बृहदारण्यक उपनिषद में प्राण (Somatic & Vital Energy) को शरीर की मुख्य शक्ति माना गया है।
    • इंद्रियों के विषयों से हटकर मन और इंद्रियों को मुख्य प्राण में लीन कर देना ही योग की प्रारंभिक साधना है।
    • इसमें प्रसिद्ध अस्तोग्रहण मंत्र सम्मलित है, जो योग साधना की दिशा दिखाता है (1.3.28):
    • असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय॥
      मुझे असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।
    4.योग के तीन मुख्य नैतिक आधार :
      बृहदारण्यकोपनिषद के पाँचवें अध्याय (5.2.3) में योग के लिए तीन अति-आवश्यक गुणों (सद्गुणों) का विधान है:
    • दम (Dama) : आत्म-नियंत्रण या इंद्रिय-निग्रह।
    • दान (Dana) :आत्म-नियंत्रण या इंद्रिय-निग्रह।
    • दान (Dana) : आत्म-नियंत्रण या इंद्रिय-निग्रह।
    • बृहदारण्यकोपनिषद में योग का अर्थ शारीरिक क्रियाएँ न होकर ज्ञानयोग, ध्यानयोग और प्राण-साधना के माध्यम से अज्ञानता के अंधकार को दूर कर परम सत्य (आत्मा-ब्रह्म) को प्राप्त करना है।
      बृहदारण्यकोपनिषद के अध्याय 2 (ब्राह्मण 4) और अध्याय 4 (ब्राह्मण 5) में महर्षि याज्ञवल्क्य और उनकी विदुषी पत्नी मैत्रेयी का संवाद अंकित है। यह संपूर्ण वैदिक साहित्य में आत्म-ज्ञान, वैराग्य और अद्वैत वेदांत का सबसे प्रसिद्ध और गंभीर दार्शनिक संवाद माना जाता है।

    11 • श्वेताश्वतरोपनिषद (योग का व्यवस्थित तरीका) : के प्रथम अध्याय में योग की महत्ता बताते हुए कहा गया है:
      ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्। (श्वेताश्वतरोपनिषद 1.3)
      अर्थात - ज्ञानी ऋषियों ने ध्यान-योग की साधना में लीन होकर अपने ही अंतःकरण में छिपी हुई ईश्वर की 'देवात्मशक्ति' (परब्रह्म की मूल शक्ति/माया) का प्रत्यक्ष अनुभव और साक्षात्कार किया।
      योग की परिभाषा : "अन्तर्मुखी होकर अपने भीतर परमात्मा की शक्ति का अनुभव करना" है।

    12 • कौषीतकि उपनिषद में प्राण योग और प्राण की उपासना के माध्यम से योग के तात्त्विक स्वरूप को स्पष्ट किया गया है।
      प्राण योग और प्राण की उपासना के माध्यम से योग के तात्त्विक स्वरूप को स्पष्ट किया गया है।
    • प्राण और प्रज्ञा की एकता: कौषीतकि उपनिषद (विशेष रूप से अध्याय 3) में 'प्राण' ही 'प्रज्ञा' (चेतना) है और 'प्रज्ञा' ही 'प्राण' है। जब इंद्रियों, मन और शरीर की समस्त क्रियाएं प्राण (परम चेतना) में एकीकृत होकर लीन हो जाती हैं, वही योग की स्थिति है।
    • इंद्रियों का एकीकरण (एकभाव):इसमें बताया गया है कि जैसे रथ के पहिए के अरे (spokes) नाभि में समर्पित होते हैं, उसी प्रकार समस्त इंद्रियां और उनके विषय प्राण में समर्पित होते हैं। जब साधक अपनी वाणी, दृष्टि, श्रवण और मन को एकीकृत करके प्राण में स्थापित करता है, तो इसे आत्मज्ञान और मुक्ति का साधन माना जाता है।
    • संयम और आंतरिक अग्निहोत्र: कौषीतकि उपनिषद में बाह्य कर्मकांडों के स्थान पर 'आंतरिक प्राण-अग्निहोत्र' का उल्लेख है। इसमें बोलते समय श्वास का संयम और श्वास लेते समय वाणी का संयम—इन दोनों के निरंतर एकीकरण को ही योगिक क्रिया या आंतरिक यज्ञ माना गया है।
    संक्षेप में, कौषीतकि उपनिषद के अनुसार जीवात्मा, मन और इंद्रियों का प्राण रूपी ब्रह्म में एकाकार (लीन) हो जाना ही योग है।
    13 • मैत्रायणी उपनिषद (षडांग योग):
      इसमें महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग से भी पहले छह अंगों वाले योग (षडांग योग) का उल्लेख मिलता है — प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, तर्क और समाधि।।
      "प्राणस्य मनसश्चैन्द्रियाणां च ऐक्यं, सर्वभावपरित्यागः योग इति उच्यते।" (मैत्रायणी उपनिषद, ६.२१)
      अर्थात - "प्राण, मन और इंद्रियों की एकता (एकाग्रता या समता) एवं सभी (सांसारिक) भावों व आसक्तियों का त्याग ही योग कहलाता है।"
    14 • योगतत्त्वोपनिषद् और योगशिखोपनिषद् के अनुसार :
      जीवात्मा और परमात्मा के भेद-भाव को समाप्त कर उनका परस्पर अभेद रूप से मिलन (एक हो जाना) ही योग है।
    15 • ध्यानबिन्दूपनिषद् तथा योगचूड़ामण्युपनिषद् के अनुसार :
      "प्राणापानसमायोगो स्वरजोरेतसोस्तथा। सूर्यचन्द्रमसोर्योगो जीवात्मपरमात्मनोः॥" अर्थात् प्राण और अपान वायु का मिलन, रज और रेत (शुक्र) का एकीकरण, सूर्य (इड़ा) और चन्द्र (पिंगला) नाड़ियों का सामंजस्य तथा जीवात्मा और परमात्मा का अभेद संबंध ही वास्तविक योग है।

ऋग्वेद जहाँ योग का वैचारिक बीज रोपता है, वहीं उपनिषद उसे व्यावहारिक दर्शन और ध्यान-पद्धति के रूप में स्थापित करते हैं, जिसके आधार पर आगे चलकर महर्षि पतंजलि ने 'योगसूत्र' की रचना की।

सांख्य दर्शन और योग दर्शन, भारतीय दर्शन के ऐसे दो अभिन्न अंग हैं जिन्हें 'समान तंत्र' (जुड़वां दर्शन) कहा जाता है। सांख्य जहाँ सैद्धांतिक (Theoretical) आधार प्रदान करता है, वहीं योग उसका व्यावहारिक (Practical) रूप है। सांख्य दर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल हैं, जिन्होंने प्रकृति और पुरुष के विवेक ज्ञान को मोक्ष का मार्ग माना है।
सांख्य दर्शन में योग का स्वरूप :
सांख्य दर्शन केवल विचारों तक सीमित नहीं है; इसमें मोक्ष प्राप्त करने के लिए चित्त को स्थिर करने और ध्यान लगाने की प्रक्रिया को 'योग' के रूप में स्वीकार किया गया है। - 1
• • ज्ञानयोग का बल: सांख्य दर्शन मुख्य रूप से ज्ञानयोग का समर्थक है। इसमें 'विवेक ख्याति' (प्रकृति और पुरुष के अंतर को समझना) ही योग का अंतिम लक्ष्य है।
• • चित्त-वृत्ति निरोध: सांख्य मानता है कि जब मन, बुद्धि और अहंकार (अन्तःकरण) शांत हो जाते हैं, तब पुरुष (आत्मा) अपने वास्तविक शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाता है।
• • ध्यान और समाधि: सांख्य सूत्रों में समाधि और ध्यान का उल्लेख मिलता है। इसमें अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से चित्त की चंचलता को दूर करने की बात कही गई है।

सांख्य और योग दर्शन में मुख्य संबंध व अंतर
विषय सांख्य दर्शन (कपिल) योग दर्शन (पतंजलि)
• दृष्टिकोण सैद्धांतिक (ज्ञान-प्रधान) व्यावहारिक (साधना-प्रधान)
• ईश्वर का स्थान निरीश्वरवादी (ईश्वर की प्रत्यक्ष आवश्यकता नहीं मानी) सेश्वरवादी (ईश्वर साधना में सहायक माना गया)
• तत्वों की संख्या
25 तत्व (प्रकृति, पुरुष, महत आदि)
26 तत्व (सांख्य के 25 तत्व + 1 ईश्वर)
• मुख्य साधन तत्व ज्ञान / विवेक ज्ञान अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम आदि)
भगवद्गीता में भी कहा गया है—
"सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पंडिताः" अर्थात अज्ञानी लोग सांख्य और योग को अलग-अलग मानते हैं, विद्वान नहीं। सांख्य जिस परम पद की कल्पना करता है, योग साधना के द्वारा साधक उसी पद तक पहुँचता है।

महर्षि पाणिनि ने अपने प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ अष्टाध्यायी में "योग" शब्द की व्युत्पत्ति और उसके अर्थों को धातु-पाठ (धातुओं के समूह) के माध्यम से स्पष्ट किया है। पाणिनि के अनुसार "योग" शब्द तीन अलग-अलग धातुओं से निष्पन्न होता है, जो इसके विभिन्न अर्थों को दर्शाते हैं:
1. युजिर् योगे (रुधादिगणीय धातु)
• • अर्थ : जोड़ना, मिलाना या युक्त करना ।
• • सम्बन्ध : यह योग का सबसे प्रसिद्ध अर्थ है, जिसका तात्पर्य जीवात्मा का परमात्मा से मिलन, अथवा मन और शरीर का एकीकरण है।
2. युज् समाधौ (दिवादिगणीय धातु)
• • अर्थ : समाधि या ध्यान में स्थित होना ।
• • सम्बन्ध : महर्षि पतंजलि का योगदर्शन इसी अर्थ पर आधारित है, जहाँ योग का मुख्य उद्देश्य चित्त की वृत्तियों का निरोध करके समाधि प्राप्त करना है।
3. युज् संयमने (चुरादिगणीय धातु)
• • अर्थ : नियंत्रण या संयम में रखना ।
• • सम्बन्ध : इसका तात्पर्य मन, इंद्रियों और शरीर पर नियंत्रण स्थापित करने से है।
पाणिनि व्याकरण के अनुसार - योग केवल एक शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि मन का नियमन, एकाग्रता (समाधि) और आत्मा का परमात्मा से जुड़ाव है।

महर्षि पतंजलि द्वारा रचित 'योग सूत्र' भारतीय दर्शन में योग का आधारभूत ग्रंथ है। महर्षि पतंजलि ने योग को केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मन और चेतना को नियंत्रित करने का एक संपूर्ण आध्यात्मिक विज्ञान माना है। - 1
1. योग की परिभाषा :
योग सूत्र के प्रारंभ में ही पतंजलि ने योग का उद्देश्य स्पष्ट किया है: "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" (योग सूत्र 1.2) अर्थ: चित्त (मन, बुद्धि, अहंकार) की वृत्तियों (चंचलता/तरंगों) को रोकना ही योग है।
द्रष्टव्य : पतंजलि योग सूत्र जहाँ चित्त की वृत्तियों के निरोध पर बल देता है, वहीं शिव सूत्र चित्त के शिवत्व में विलय और प्रकाश (उन्मेष) पर जोर देता है।
महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग से भी पहले (मैत्रायणी उपनिषद, ६.२१) में छह अंगों वाले योग (षडांग योग - प्राणायाम, प्रत्याहार, तर्क, धारणा, ध्यान और समाधि।) का उल्लेख मिलता है — सूत्र "प्राणस्य मनसश्चैन्द्रियाणां च ऐक्यं, सर्वभावपरित्यागः योग इति उच्यते।" अर्थ - "प्राण, मन और इन्द्रियों का ऐक्य (एक होना या एकाग्र होना) तथा अन्य सभी सांसारिक भावों (विचारों व आसक्तियों) का परित्याग करना ही 'योग' कहलाता है।" । - 1

2. अष्टांग योग (योग के 8 अंग)
पतंजलि ने मन को शांत करने और परम सत्य (समाधि) की प्राप्ति के लिए 8 चरणों का एक क्रमिक मार्ग बताया है, जिसे अष्टांग योग कहा जाता है:
१. यम (सामाजिक नैतिकता) : समाज में रहने के 5 नियम — अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना)।
2. नियम (व्यक्तिगत अनुशासन) : स्वयं के लिए 5 नियम — शौच (पवित्रता), संतोष, तप, स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन) और ईश्वर-प्रणिधान (समर्पण)।
3. आसन (शरीर की स्थिति) : "स्थिरसुखमासनम्" — वह स्थिति जो स्थिर और सुखद हो, ताकि ध्यान में बाधा न आए ।
4. प्राणायाम (श्वास नियंत्रण) : श्वास-प्रश्वास की गति को नियंत्रित करना और प्राण शक्ति का विस्तार करना ।
5. प्रत्याहार (इंद्रिय नियंत्रण) : अपनी इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर अंदर की ओर मोड़ना ।
6. धारणा (एकाग्रता) : चित्त या मन को किसी एक ध्येय वस्तु या बिंदु पर केंद्रित करना ।
7. ध्यान (निरंतर चिंतन) : जिस विषय पर ध्यान लगाया है, उसमें बिना रुकावट के निरंतर एकाग्र बने रहना ।
8. समाधि (परम अवस्था) : जब ध्याता (ध्यान करने वाला) और ध्यान की प्रक्रिया समाप्त होकर केवल ध्येय वस्तु ही शेष रह जाती है — यह आत्म-साक्षात्कार की अवस्था है ।

3. योग सूत्र के 4 अध्याय (पाद) :
पतंजलि योग सूत्र को 4 भागों में विभाजित किया गया है :
अध्याय (पाद) विषय वस्तु
१. समाधि पाद : योग का स्वरूप, चित्त की वृत्तियाँ और समाधि के प्रकार।
२. साधन पाद : क्रियायोग, क्लेश (दुःख के कारण) और अष्टांग योग के पहले 5 अंग।
३. विभूति पाद : अष्टांग योग के अंतिम 3 अंग (धारणा, ध्यान, समाधि) और उनसे प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ।
४. कैवल्य पाद : मोक्ष, चेतना का स्वरूप और परम स्वतंत्रता (कैवल्य)।

4. क्लेश (दुःख के 5 कारण) :
पतंजलि के अनुसार मनुष्य के दुःखों का मुख्य कारण 5 क्लेश हैं: -
१. अविद्या (अज्ञानता) २. अस्मिता (अहंकार) ३. राग (अत्यधिक आसक्ति) ४. द्वेष (घृणा या ईर्ष्या) ५. अभिनिवेश (मृत्यु का भय)

योग का मुख्य लक्ष्य इन क्लेशों को समाप्त करके व्यक्ति को पूर्ण शांति और मोक्ष की ओर ले जाना है।

जैन दर्शन और भगवान महावीर के उपदेशों के अनुसार 'योग' का अर्थ केवल शारीरिक व्यायाम या प्राणायाम नहीं है। जैन आगम परंपरा (जैसे तत्वार्थ सूत्र और भगवती सूत्र) के अनुसार:
"कायवाङ्मनः कर्म योगः" अर्थात मन, वचन (वाणी) और काय (शरीर) की प्रवृत्तियों व क्रियाओं को 'योग' कहा जाता है।
जैन दर्शन में योग का स्वरूप
• 1. आत्मा के प्रदेशों में परिस्पंदन (Vibration) : जब मन, वाणी या शरीर कोई कार्य करता है, तब आत्मा के प्रदेशों में एक हलचल या कंपन पैदा होती है। इसी आत्म-प्रदेशों के परिस्पंदन को योग कहा गया है।
• 2. कर्म-आस्रव का कारण : जैन मान्यताओं के अनुसार, योग ही वह माध्यम है जिससे कर्म रूपी पुद्गल (कर्म परमाणु) आत्मा की ओर आकर्षित होते हैं (इसे आस्रव कहते हैं)।
योग के तीन मुख्य प्रकार • 1. मनोयोग (Mind) : विचार करना, चिंतन या संकल्प-विकल्प करना। • 2. वचनयोग (Speech) : बोलना या शब्दों का उच्चारण करना। • 3. कायोग (Body) : शरीर द्वारा की जाने वाली कोई भी शारीरिक क्रिया या गतिविधि।
महावीर स्वामी का मूल मार्ग: 'अयोग' अवस्था
सामान्य योग परंपरा (जैसे पतंजलि योग) में चित्त की वृत्तियों के निरोध को योग माना गया है, जबकि जैन परंपरा में योग के कारण कर्मबंध होता है। इसलिए भगवान महावीर का अंतिम लक्ष्य 'अयोग' (Ayoga) अवस्था को प्राप्त करना है—अर्थात मन, वाणी और शरीर की समस्त चंचल प्रवृत्तियों का पूर्ण निरोध करके आत्मा के निज स्वरूप में स्थिर हो जाना। - 2

परवर्ती जैन आचार्यों (जैसे आचार्य हरिभद्र सूरि और आचार्य हेमचंद्र) ने मोक्ष की ओर ले जाने वाले सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र (रत्नत्रय) के पालन को भी 'जैन योग' के रूप में परिभाषित किया है।

जैन दर्शन में 'योग' केवल शारीरिक आसनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मा की शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का मुख्य साधन माना जाता है। आचार्य उमास्वामी द्वारा रचित 'तत्त्वार्थ सूत्र' में योग की परिभाषा दी गई है: "कायवाङ्मनः कर्म योगः"—अर्थात शरीर (काय), वचन और मन की गतिविधियों/चंचलता को योग कहा जाता है।
योग का मूल स्वरूप और वर्गीकरण :
जैन परंपरा में आत्मा के साथ कर्मों के जुड़ने (आस्रव) का कारण मन, वचन और काय की चंचलता ही है। जब इस योग (प्रवृत्ति) को शुभ दिशा में मोड़ा जाता है और अंततः स्थिर कर लिया जाता है, तब मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
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• • द्रव्य योग: मन, वचन और शरीर की बाह्य क्रियाएं व हलचल।
• • भाव योग : आत्मा की आंतरिक चेतना, भावना और आत्म-लीनता।

आचार्य हरिभद्रसूरि का 8-अंगीय जैन योग
8वीं शताब्दी के महान जैन आचार्य हरिभद्रसूरि ने अपनी कृति 'योगदृष्टिसमुच्चय' में पतंजलि के अष्टांग योग की तर्ज पर आठ दृष्टियों (अंगों) का वर्णन किया है:
अंग (दृष्टि) अर्थ व स्वरूप
1. मित्रा योग मार्ग की ओर झुकाव और कल्याणकारी दृष्टि।
2. तारा सत्य को जानने की तीव्र इच्छा और जिज्ञासा।
3. बला संकल्प और संयम में दृढ़ता आना।
4. दीप्रा शंकाओं का निवारण और ज्ञान का प्रकाश होना।
5. स्थिरा ध्यान और साधना में स्थिरता प्राप्त होना।
6. कांता आत्मा के वास्तविक स्वरूप से प्रेम और आनंद।
7. प्रभा परम समाधि की अवस्था और केवलज्ञान के समीप पहुँचना।
8. परा पूर्ण मुक्ति, कर्म-मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति।

जैन योग के मुख्य चरण :
• 1. आसन और कायोत्सर्ग : कायोत्सर्ग (शरीर का पूरी तरह से त्याग/शिथिलीकरण) जैन ध्यान की सबसे महत्वपूर्ण योग मुद्रा है। इसमें साधक खड्गासन (सीधे खड़े होकर) या पद्मासन में बैठकर आत्मा को शरीर से पृथक अनुभव करता है।
• 2. प्राणायाम : श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण और एकाग्रता।
• 3. ध्यान : जैन योग में चार प्रकार के ध्यान बताए गए हैं—आर्त ध्यान और रौद्र ध्यान (अशुभ), तथा धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान (शुभ व मोक्षदायी)।

नागार्जुन (जिन्हें भारत का महान रसायनशास्त्री और सिद्ध माना जाता है) की परंपरा में योग का अर्थ शरीर और मन को धातु-रसायनों तथा आत्म-ज्ञान की साधना द्वारा परम स्थिति (सिद्धि या मुक्ति) तक पहुँचाना है।
आचार्य हरिभद्र के अनुसार - मोक्खेण जोयणाओ सव्वो वि धम्म ववहारो जोगो अर्थात् मोक्ष से जोड़ने वाले सभी व्यवहार योग हैं।
बौद्ध धर्म में 'योग' का तात्पर्य केवल शारीरिक आसनों से न होकर मुख्य रूप से चित्त के नियंत्रण, ध्यान (Meditation), और आध्यात्मिक साधना (Spiritual Practice) से है। बुद्ध के समय से ही योग की परंपरा बौद्ध दर्शन का अभिन्न अंग रही है।
बौद्ध धर्म में योग का स्वरूप :
• • विपश्यना (Vipassana) और शमथ (Samatha) : बौद्ध योग के दो मुख्य आधार हैं। 'शमथ' से चित्त को शांत और एकाग्र किया जाता है, जबकि 'विपश्यना' से वस्तुओं के वास्तविक स्वभाव (अनित्य और अनात्म) का बोध होता है।
• • अष्टांगिक मार्ग (Eightfold Path) : इसमें वर्णित सम्यक व्यायाम (सही प्रयास), सम्यक स्मृति (सजगता), और सम्यक समाधि (गहन ध्यान) पूरी तरह से मानसिक योग के अंग हैं।

• • योगाचार (Yogacara) दर्शन : बौद्ध धर्म की महायान शाखा में 'योगाचार' नाम का एक प्रमुख संप्रदाय विकसित हुआ (असंग और वसुबंधु द्वारा स्थापित)। इसका शाब्दिक अर्थ ही "योग का अभ्यास करने वाला" है। इसमें माना गया कि संसार चित्त (माइंड) की ही एक अभिव्यक्ति है और योग के माध्यम से ही सत्य को जाना जा सकता है।
• • तिब्बती बौद्ध धर्म और वज्रयान योग : वज्रयान में शारीरिक और सूक्ष्म-शरीर से जुड़े योग का वर्णन मिलता है, जिसे 'नाड़ी', 'प्राण', और 'बिंदु' की साधना कहा जाता है। इसमें छह योग (Six Yogas of Naropa) प्रसिद्ध हैं, जिनमें तुम्मो (आंतरिक ऊर्जा बढ़ाना) और स्वप्न योग शामिल हैं।

बौद्ध योग का अंतिम लक्ष्य शारीरिक स्वास्थ्य न होकर निर्वाण (Monkhood/Enlightenment) - यानी दुखों से मुक्ति और मन की शांति प्राप्त करना है।

आदि शंकराचार्य (Advaita Vedanta) के अनुसार योग
केवल शारीरिक आसन या सांख्य/पातंजल योग की तरह प्रकृति और पुरुष का वियोग मात्र नहीं है। शंकराचार्य ने योग को अद्वैत बोध (आत्मज्ञान) प्राप्त करने का साधन माना है।उनके विभिन्न ग्रंथों (जैसे अपरोक्षानुभूति, भगवद्गीता भाष्य, और विवेकचूड़ामणि) के आधार पर योग की मुख्य परिभाषाएं निम्नलिखित हैं:
1. मन का प्रशमन और ब्रह्म में एकाग्रता
शंकराचार्य के अनुसार, "चित्त का पूरी तरह से शान्त होकर ब्रह्म में लीन या एकाग्र हो जाना ही योग है।"
• अपरोक्षानुभूति में वे स्पष्ट करते हैं कि संसारी विषयों से मन और इंद्रियों को हटाकर केवल आत्म-चिंतन में स्थिर करना सच्चा योग है।
2. जीवात्मा और परमात्मा का अद्वैत (ऐक्य)
शंकराचार्य का योग सांख्य की तरह द्वैत पर आधारित नहीं है। उनके अनुसार: "जीवात्मा और परमात्मा के मूल एकत्व (अद्वैत) का साक्षात्कार करना ही योग है।" - 1
अज्ञान के कारण जीव स्वयं को ईश्वर से अलग मानता है। जब ज्ञान के द्वारा यह भेद मिट जाता है और स्वरूप का बोध होता है, वही स्थिति योग है।
3. योग के घटकों की अद्वैतपरक व्याख्या (अपरोक्षानुभूति के अनुसार)
शंकराचार्य ने पतंजलि के अष्टांग योग के अंगों को ज्ञानमार्गी (अद्वैत) परिप्रेक्ष्य में पुनः परिभाषित किया है:
  • यम : "सर्वं ब्रह्मेति ज्ञानात्..." – सब कुछ ब्रह्म ही है, इस ज्ञान के द्वारा इंद्रियों का नियमन करना 'यम' है।
  • नियम (Niyama): सजातीय (ब्रह्म) वृत्ति का प्रवाह और विजातीय (अनात्मा) विचारों का तिरस्कार 'नियम' है।
  • आसन (Asana): जिस स्थिति में निरंतर ब्रह्म का चिंतन सुखपूर्वक हो सके, वही सच्चा 'आसन' है।
  • प्रत्याहार (Pratyahara): चित्त को आत्म-स्वरूप में लीन करके विषयों से मोड़ लेना 'प्रत्याहार' है।
  • ध्यान और समाधि (Dhyana & Samadhi): "मैं ब्रह्म हूँ" (अहं ब्रह्मास्मि) इस वृत्ति में बिना किसी विकल्प के स्थिर हो जाना ही परम समाधि है।
निष्कर्ष :
आदि शंकराचार्य के मत में योग का अंतिम लक्ष्य ज्ञान योग (Jnana Yoga) की सिद्धि है। कर्म योग, हठयोग और अष्टांग योग चित्त की शुद्धि के प्राथमिक साधन हैं, जबकि सच्चा योग आत्मा और ब्रह्म की अभिन्नता का प्रत्यक्ष अनुभव (अपरोक्ष अनुभूति) है।

शिव संहिता में वर्णित योग के 4 मुख्य प्रकार :
• • मंत्र योग : मन को स्थिर करने के लिए अक्षरों और मंत्रों के निरंतर जप का विधान।
• • लय योग : चित्त का आत्म-स्वरूप में लय या लीन हो जाना।
• • हठ योग : प्राणायाम, मुद्रा और बंधों के माध्यम से प्राण और अपान वायु का संतुलन।
• • राज योग : समाधि की स्थिति, जहाँ साधक का मन पूरी तरह आत्मा में लीन हो जाता है।

राज योग को "योगों का राजा" माना जाता है। यह चित्त (मन) को नियंत्रित कर आत्म-साक्षात्कार और परम चेतना (समाधि) की प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। महर्षि पतंजलि द्वारा रचित 'योग सूत्र' में वर्णित अष्टांग योग (आठ अंगों) का पालन ही मुख्य रूप से राज योग कहलाता है।
राज योग की परिभाषा :
महर्षि पतंजलि के अनुसार: "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" अर्थात चित्त की वृत्तियों (मन के चंचल विचारों और तरंगों) का पूरी तरह निरोध (नियंत्रण) कर देना ही योग है।
शाब्दिक अर्थ: 'राज' का अर्थ है राजा। जिस प्रकार एक राजा अपने राज्य पर पूर्ण शासन करता है, उसी प्रकार राज योग मन और इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त करने की कला सिखाता है। राज योग के आठ अंग (अष्टांग योग)

महायोगी गुरु गोरखनाथ के अनुसार योग (विशेषकर हठयोग) केवल शारीरिक कसरत न होकर, शरीर और मन के माध्यम से परम चेतना और समाधि प्राप्त करने की एक साधना-प्रक्रिया है। गोरखनाथ जी के अनुसार योग की मुख्य परिभाषा और उसके सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:
1. 'ह' और 'ठ' का योग (प्राण संतुलन) :
गोरक्ष संहिताओं के अनुसार 'ह' का अर्थ है सूर्य नाड़ी (पिंगला) और 'ठ' का अर्थ है चंद्र नाड़ी (इड़ा)।
• • परिभाषा : प्राण (सूर्य) और अपान (चंद्र) का परस्पर मिलन, तथा इड़ा और पिंगला नाड़ी को संतुलित करके प्राणवायु को मध्य नाड़ी (सुषुम्ना) में प्रविष्ट कराना ही योग है। - 2

अक्षरात्मक अर्थ :
ह = सूर्य स्वर (पिंगला), ठ = चंद्र स्वर (इड़ा) , -- योग = दोनों शक्तियों का समरस या संतुलित होना।
2. जीवात्मा और परमात्मा का एकीकरण :
गोरखनाथ जी के अनुसार, स्थूल शरीर के भीतर छिपी हुई कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर उसे सहस्रार चक्र में स्थित परम शिव से मिलाना ही योग की पूर्णता है। योग वह माध्यम है जो जीव को उसके वास्तविक शिव स्वरूप (परम सत्य) से जोड़ता है।
3. 'षडंग योग' की अवधारणा :
महर्षि पतंजलि के आठ अंगों (अष्टांग योग) के विपरीत, गुरु गोरखनाथ ने षडंग योग (6 अंगों वाले योग) का विधान दिया है :
अंग अर्थ/उद्देश्य
१. आसन शरीर में स्थिरता और दृढ़ता लाना
२. प्राणायाम प्राणवायु का नियमन और नाड़ी शुद्धि
३. प्रत्याहार इंद्रियों को बाह्य विषयों से समेटना
४. धारणा चित्त को किसी एक स्थान/बिंदु पर केंद्रित करना
५. ध्यान आत्म-स्वरूप में निरंतर लौ लगाना
६. समाधि द्वैत (भेद) भाव समाप्त होकर परम तत्त्व में लीन होना

गोरखनाथी योग की मुख्य विशेषताएँ :
  • पिण्ड-ब्रह्माण्ड एकीकरण : "जो पिण्डे सो ब्रह्माण्डे" — अर्थात जो कुछ इस ब्रह्मांड में है, वह सब इस मानव शरीर (पिंड) के भीतर विद्यमान है। शरीर को साधन बनाकर ब्रह्मांडीय चेतना का अनुभव करना ही योग है।
  • उन्मनी अवस्था (शून्य समाधि) : मन और पवन (सांस) को वश में करके मन को 'उन्मन' (विचारशून्य एवं आनन्दमयी अवस्था) में स्थिर करना योग का अंतिम लक्ष्य है।
  • - 1
  • बिंदु साधना (संयम): शरीर, मन और वीर्य/बिंदु की रक्षा एवं उसका ऊर्ध्वारोहण (ऊपर की ओर प्रवाह) करके अमरत्व प्राप्त करना।
संक्षेप में, गुरु गोरखनाथ के अनुसार योग वह साधन है जिसके द्वारा साधक अपने शरीर और मन को शुद्ध कर, कुंडलिनी जागरण के माध्यम से काल (मृत्यु और अज्ञान) पर विजय प्राप्त करता है और परम समाधि को सिद्ध करता है।


संत कबीर के अनुसार योग केवल शारीरिक क्रियाएँ (आसन या प्राणायाम) या कठोर तपस्या नहीं है। कबीर का योग आंतरिक चेतना, मन की सहजता और ईश्वर (राम) से आत्मा का मिलन है।
कबीर के योग दर्शन को निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
१. सहज योग (सहज समाधि) :
कबीर हठयोग की भांति शरीर को कष्ट देने वाली साधना के स्थान पर "सहज योग" को प्राथमिकता देते हैं। उनके अनुसार, गृहस्थ जीवन और दैनिक कर्मों को करते हुए मन को ईश्वर में लीन रखना ही सच्चा योग है। "साधो, सहज समाधि भली।"
२. मन का निग्रह और शुद्धि :
कबीर के अनुसार बाहर के आडंबर, माला फेरना या भस्म लगाना योग नहीं है। वास्तविक योग मन की चंचलता को समाप्त कर उसे निर्मल बनाना है। "माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥"
३. भक्ति और प्रेमयुक्त योग :
पतंजलि के योगसूत्र में जहाँ चित्त की वृत्तियों के निरोध पर बल दिया गया है, वहीं कबीर का योग भक्ति और प्रेम से ओत-प्रोत है। उनके लिए योग का अर्थ आत्मा का अपने प्रियतम (परमात्मा) से प्रेमपूर्वक मिलन है। "पोथी पढ़ी-पढ़ी जग मुआ पंडित भया ना कोय ! ढाई आखर प्रेम का पढ़ै सो पंडित होय !!"
४. हठयोग और सुरति-शब्द योग :
कबीर ने नाथ पंथियों और सिद्धों के हठयोग (इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, अनहद नाद और कुंडलिनी जागरण) के पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग तो किया, लेकिन उन्होंने इसे आंतरिक ज्ञान ('सुरति' यानी ध्यान और 'शब्द' यानी ब्रह्म-नाद) की दिशा दी।

कबीर के अनुसार योग का सार यही है कि जब मनुष्य का मन संसार के विकारों से हटकर अपने भीतर स्थित परमात्मा में स्थिर हो जाता है, वही सच्चा योग है।

महर्षि दयानंद सरस्वती ने योग की व्याख्या विशुद्ध वैदिक परंपरा, महर्षि पतंजलि के 'पातंजल योगशास्त्र' और ईश्वर-जीव-प्रकृति के त्रैतवाद (Traitavada) के सिद्धांतों के आधार पर की है।
उन्होंने अपने महान ग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' और 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' में योग को ईश्वर-प्राप्ति, दुःखों की निवृत्ति और चित्त की शुद्धि का साधन माना है।

महर्षि दयानंद के अनुसार योग की मुख्य परिभाषाएं एवं दृष्टिकोण:
  • ईश्वर और जीवात्मा का संयोग (संबन्ध) : महर्षि दयानंद के अनुसार, जीवात्मा का अधर्म, अज्ञान और सांसारिक दुःखों से अलग होकर परमेश्वर के साथ ध्यान या समाधि के द्वारा संयुक्त (लीन) होना ही योग है।
  • चित्तवृत्तियों का निरोध : स्वामी जी ने महर्षि पतंजलि के सूत्र "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" को पूरी तरह स्वीकार किया है। उनके अनुसार, मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त की अविद्यायुक्त चंचल वृत्तियों को रोककर अंतःकरण को शुद्ध करना योग है।
  • दुःखों से मुक्ति का साधन : सत्यार्थ प्रकाश में उन्होंने स्पष्ट किया है कि योग वह प्रक्रिया है जिससे मनुष्य तीनों प्रकार के दुःखों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक) से छूटकर मोक्ष (आनंद) को प्राप्त करता है।
  • अष्टांग योग का पालन : दयानंद सरस्वती के अनुसार योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि — इन आठ अंगों का निष्ठापूर्वक पालन करना ही सच्चा योग है।
  • प्राणायाम और ईश्वर उपासना : स्वामी दयानंद ने प्राणायाम को मन और आत्मा की शुद्धि का अत्यंत शक्तिशाली माध्यम बताया है। उनके अनुसार प्राणायाम द्वारा मन स्थिर होता है और स्थिर मन से ही ईश्वर की उपासना संभव है।
सार रूप में: :
महर्षि दयानन्द के मत में— "धर्म और निष्काम कर्म करते हुए, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से मन की वृत्तियों को रोककर, जीवात्मा का परमात्मा में समाहित हो जाना ही योग है।"

विवेकानंद जी ने पतंजलि के योगसूत्रों को आधुनिक और व्यावहारिक संदर्भ में प्रस्तुत किया है। उनके दृष्टिकोण के मुख्य बिंदु:
  • दिव्यता की अभिव्यक्ति : उनके अनुसार प्रत्येक आत्मा में दिव्य गुण और ब्रह्मभाव निहित है। बाह्य और आंतरिक प्रकृति (शरीर और मन) को वशीभूत करके आत्मा की इस अंतर्निहित दिव्यता को प्रकट करना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है, और योग इस लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन है।
  • मन का संयम और एकाग्रता : योग केवल शारीरिक व्यायाम या आसन नहीं है, बल्कि मन को नियंत्रित करने, चित्त की वृत्तियों को शांत करने और ध्यान को एकाग्र करने की मानसिक प्रक्रिया है।
  • योग के चार मार्ग : मनुष्य की अलग-अलग प्रकृति और रुचि के अनुसार विवेकानंद जी ने योग को मुख्य रूप से चार भागों में विभाजित किया:
    1. राजयोग : मन के संयम, ध्यान और मानसिक नियंत्रण का मार्ग।
    2. कर्मयोग : बिना फल की आसक्ति के निस्वार्थ भाव से कर्म करने का मार्ग।
    3. भक्तियोग : प्रेम, समर्पण और ईश्वर-भक्ति का मार्ग।
    4. ज्ञानयोग : विवेक, विचार और बौद्धिक विश्लेषण द्वारा सत्य को जानने का मार्ग।
    5. स्वामीजी का मानना था कि इनमें से कोई भी एक मार्ग चुनकर (या इनका समावेश करके) मनुष्य जीवन के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
  • व्यावहारिक और अंधविश्वास-मुक्त दृष्टिकोण : स्वामीजी का मानना था कि योग एक पूर्णतः वैज्ञानिक मार्ग है। उन्होंने योग में किसी भी प्रकार के गुप्त तंत्र-मंत्र या रहस्यवाद को खारिज करते हुए कहा था कि योग मनुष्य को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत एवं निर्भीक बनाने का साधन है।
स्वामी विवेकानंद के शब्दों में योग का अंतिम निचोड़ यही है कि "अपनी बिखरी हुई शक्ति को समेटकर सर्वोच्च ध्येय (परमात्मा) में एकाकार कर देना और मुक्ति प्राप्त करना ही योग है।"

श्रीअरविंद दर्शन को पूर्ण योग (Integral Yoga या सर्वांग योग) कहा जाता है, जिसका मूल उद्देश्य मानव चेतना का अतिमानव चेतना (Supramental Consciousness) में रूपांतरण करना और दिव्य जीवन को इसी पृथ्वी पर उतारना है। - 1
श्रीअरविंद के योग की मुख्य विशेषताएँ और परिभाषा के प्रमुख अंग:
  • चेतना का रूपांतरण : यह केवल मन को शांत करने या आत्म-साक्षात्कार तक सीमित नहीं है, बल्कि शरीर, प्राण और मन तीनों का दिव्य रूपांतरण (Transformation) है।
  • संसार का स्वीकार : पारंपरिक योग की तरह यह जगत को मिथ्या मानकर भागने की बात नहीं करता, बल्कि सांसारिक जीवन को ही साधना का क्षेत्र मानता है।
  • द्विमुखी प्रक्रिया (Two-way Process) :
    1. o आरोहण (Ascent): मानव चेतना का ऊपर की ओर उठना।
    2. o अवरोहण (Descent) : अतिमानसिक (Supramental) शक्ति और प्रकाश का नीचे चेतना और शरीर में उतरना।
  • त्रिधा साधना (Triple Path) : ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्म योग का एक साथ सामंजस्यपूर्ण समन्वय।

रमण महर्षि के अनुसार, योग का अर्थ केवल शारीरिक आसन या सांस पर नियंत्रण (प्राणायाम) नहीं है, बल्कि चित्त (मन) को उसकी मूल स्थिति यानी आत्मा में लीन कर देना ही सच्चा योग है।
रमण महर्षि ने योग को निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं के माध्यम से समझाया है:
  • मन का निरोध (आत्मा में विलय) : महर्षि पतंजलि के 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' (चित्त की वृत्तियों को रोकना ही योग है) को आगे बढ़ाते हुए रमण महर्षि कहते थे कि मन को जबरन दबाना केवल अस्थायी शांति देता है। मन का अपनी उत्पत्ति (आत्मा) में हमेशा के लिए विलीन हो जाना ही वास्तविक योग है।
  • आत्म-विचार (Self-Enquiry) : उन्होंने 'मैं कौन हूँ?' (कोऽहम्) के विचार को सर्वोच्च और सबसे सीधा योग मार्ग (ज्ञान योग) माना। जब आप यह खोजते हैं कि 'मैं' शब्द का मूल स्रोत क्या है, तो मन शांत होकर आत्मा में विलीन हो जाता है।
  • कर्म योग की सहजता : किसी भी कार्य को बिना 'मैं कर्ता हूँ' के अहंकार भाव के करना कर्म योग है। जब अहंकार समाप्त हो जाता है, तो व्यक्ति का हर कर्म योग बन जाता है।
  • साधना का उद्देश्य : प्राणायाम या ध्यान मन को कुछ देर के लिए शांत तो कर सकते हैं (जैसे पानी में बर्फ जमना), लेकिन बर्फ पिघलते ही मन फिर जाग जाता है। योग का अंतिम लक्ष्य मन का ऐसा नाश (मनोनाश) है, जिससे वह पुनः सांसारिक भटकाव में न आए।
संक्षेप में, रमण महर्षि के अनुसार : "अहंकार का अपने स्रोत (आत्मा) में लौट जाना और वहीं स्थिर हो जाना ही योग है।"


जे. कृष्णमूर्ति (J. Krishnamurti) के अनुसार, योग का अर्थ केवल शारीरिक व्यायाम, आसन, प्राणायाम या मन को नियंत्रित करने का कोई निश्चित ढांचा नहीं है। वे पारंपरिक या संस्थागत योग के व्यावसायिक और केवल शारीरिक पहलुओं की आलोचना करते थे। - 1
कृष्णमूर्ति के विचारों में योग की परिभाषा के मुख्य बिंदु:
  • 'योग' का मूल अर्थ : योग शब्द संस्कृत के 'युज' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'जुड़ना' या 'एक होना'। कृष्णमूर्ति के अनुसार, वास्तविक योग का अर्थ है—मन, शरीर और चेतना का पूरी तरह से एक लय (harmony) में होना।
  • सचेतता और आत्म-निरीक्षण (Awareness) :उनके अनुसार योग बिना किसी निर्णय (judgment) के स्वयं को देखना है। अपने विचारों, भावनाओं और शारीरिक प्रतिक्रियाओं को पल-पल बिना किसी नियंत्रण या ज़बरदस्ती के देखना ही सच्चा योग है।
  • नियंत्रण और संघर्ष से मुक्ति : पारंपरिक योग में मन को वश में करने या एकाग्र करने पर जोर दिया जाता है, लेकिन कृष्णमूर्ति मानते थे कि मन को नियंत्रित करने की कोशिश से मन में संघर्ष (conflict) पैदा होता है। सच्चा योग तब घटित होता है जब मन बिना किसी प्रयास के शांत और जागरूक होता है।
  • समग्र जीवन शैली : योग कोई 1-2 घंटे की जाने वाली क्रिया नहीं है, बल्कि यह आपकी पूरी दिनचर्या, सोच और संबंधों में स्पष्टता और ध्यान (attention) बनाए रखने का नाम है।
संक्षेप में, कृष्णमूर्ति के लिए योग का अर्थ "बिना किसी प्रयास या अनुशासन के, स्वयं का पूर्ण अवलोकन और जीवन के साथ पूर्ण सामंजस्य" है।

ओशो के अनुसार योग कोई धर्म, दर्शन या मान्यता नहीं है, बल्कि वह जीवन का एक विशुद्ध और परम विज्ञान है। पतंजलि के योगसूत्रों पर दिए अपने प्रवचनों में ओशो ने योग को मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण आयामों में परिभाषित किया है:
1. "अब" में प्रवेश करने का अनुशासन (The Discipline of Now)
ओशो बताते हैं कि पतंजलि के योगसूत्र का पहला सूत्र है—"अथ योगानुशासनम्" (अब योग का अनुशासन)।
  • मन की प्रकृति : सामान्य मनुष्य हमेशा अतीत (यादों) या भविष्य (सपनों व योजनाओं) में जीता है।
  • योग का प्रवेश : ओशो के अनुसार, जब व्यक्ति भविष्य और अतीत की अपनी सभी भ्रांतियों और इच्छाओं से ऊब जाता है और "इस क्षण" (वर्तमान) में रुक जाता है, वहीं से योग शुरू होता है। योग का अर्थ है — वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित होना।
2. विचार-शून्यता और मन की समाप्ति (Mindlessness)
महर्षि पतंजलि के सूत्र "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" की व्याख्या करते हुए ओशो कहते हैं कि योग का अर्थ मन की चंचलता को दबाना नहीं, बल्कि मन का विसर्जन (Mindlessness) है।
  • मन विचारों और इच्छाओं का एक जाल है।
  • जब विचार शांत हो जाते हैं और मन की तरंगें समाप्त हो जाती हैं, तब व्यक्ति अपने साक्षी भाव (Witness Consciousness) में स्थापित हो जाता है। ओशो के शब्दों में: "विचारों से मुक्ति ही योग है।"
3. स्वयं से जुड़ने का विज्ञान (Union with One's Own Nature)
साधारणतया योग (युज) का शाब्दिक अर्थ 'जोड़ना' या 'मिलन' माना जाता है। ओशो कहते हैं:
  • योग आत्मा का किसी बाहरी ईश्वर से मिलन नहीं है, बल्कि आपके अपने वास्तविक स्वभाव (Authentic Self) से जुड़ना है।
  • यह अपने भीतर छिपे 'साक्षी' या चेतना का साक्षात्कार है।
ओशो द्वारा बताई गई योग की मुख्य विशेषताएँ :
  • कोई श्रद्धा या विश्वास नहीं : ओशो कहते हैं कि धर्म विश्वासों (Beliefs) पर टिका होता है, जबकि 'योग' प्रयोग (Experimentation) और अन्वेषण (Inquiry) पर आधारित है। इसके लिए किसी ईश्वर या शास्त्र को मानने की जरूरत नहीं है; सिर्फ स्वयं पर प्रयोग करने के साहस की जरूरत है।
  • जीवन ऊर्जा की समझ : ओशो के अनुसार, योग यह स्वीकार करता है कि पूरा अस्तित्व एक ऊर्जा (Energy) है। जब यह ऊर्जा भीतर की ओर बहने लगती है, तब योग घटित होता है।
  • सहजता (Naturalness) : ओशो के अनुसार योग कोई जबरदस्ती या शरीर को कष्ट देने की क्रिया नहीं है, बल्कि यह अत्यंत स्वाभाविक और सहज (Effortless) होने की कला है।
संक्षेप में: ओशो के अनुसार, "योग मन के पार जाने और स्वयं की विशुद्ध चेतना में जागने की एक वैज्ञानिक कला है।"

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित 'वाल्मीकि रामायण' में योग की परिभाषा पतंजलि के योगसूत्रों (जैसे शारीरिक आसन या प्राणायाम) की तरह केवल एक परिभाषात्मक सूत्र में सीमित न होकर व्यवहारिक धर्म, मानसिक संतुलन, कर्तव्यपालन और अध्यात्म के रूप में प्रकट होती है।
वाल्मीकि रामायण तथा महर्षि वाल्मीकि द्वारा ही रचित माने जाने वाले दार्शनिक ग्रंथ 'योग वाशिष्ठ' (महा रामायण) के अनुसार योग का मुख्य अर्थ निम्नलिखित संदर्भों में समझा जाता है:
1. मन के प्रशमन और शांति का उपाय (योग वाशिष्ठ के अनुसार) :

महर्षि वाल्मीकि ने 'योग वाशिष्ठ' में योग की स्पष्ट आध्यात्मिक परिभाषा दी है:
• "मनसो प्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते।" अर्थात् "मन को शांत करने के साधन को योग कहते हैं।
 
मन को पूर्णतः शांत और शांत-चित्त करने का उपाय ही 'योग' कहलाता है।
यहाँ योग का अर्थ केवल शारीरिक क्रियाएँ नहीं, बल्कि चित्त और मन को सांसारिक भटकाव से मुक्त करके आत्म-ज्ञान और शांत अवस्था में स्थित करना है।

2. अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में समत्व (समता) :
वाल्मीकि रामायण में श्री राम के चरित्र को ही 'सजीव योग' माना गया है।
  • राज्याभिषेक का क्षण हो या 14 वर्ष का कठोर वनवास, श्री राम के चेहरे और मन का संतुलन एक समान रहा।
  • सुख-दुख, मान-अपमान और लाभ-हानि में स्थिर रहने की इसी मानसिक अवस्था को रामायण में योग का व्यावहारिक रूप माना गया है।
3. धर्म और कर्तव्य का निष्काम पालन (कर्मयोग) :
रामायण में योग का तात्पर्य 'धर्म' और 'कर्तव्य निष्ठा' से जुड़ा है।
  • अपने कर्तव्यों को बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ या फल की इच्छा के पूरा करना ही योग का मूल रूप है।
  • राम, लक्ष्मण और हनुमान का जीवन, जीवन-साधना (कर्मयोग) का सबसे बड़ा उदाहरण प्रस्तुत करता है।
4. एकाग्रता और संकल्प शक्ति (ध्यान योग) :

सुंदरकांड में हनुमान जी द्वारा समुद्र लांघने की घटना को योग की पराकाष्ठा (ध्यान, वायु-साधना और संकल्प शक्ति) के रूप में दर्शाया गया है। जब मन एकाग्र होकर एक लक्ष्य (श्री राम का कार्य) पर टिक जाता है, तो असंभव कार्य भी संभव हो जाता है।

सार रूप में:
वाल्मीकि रामायण की दृष्टि में "इंद्रियों पर नियंत्रण, मन का संतुलन, और विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म के मार्ग पर अडिग रहना ही सच्चा योग है।"

श्रीरामचरितमानस में योग को केवल शारीरिक आसनों या प्राणायाम तक सीमित न रखकर परमात्मा से आत्मा के मिलन, भक्ति और अंतःकरण की शुद्धि का माध्यम माना गया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में योग के दार्शनिक और व्यावहारिक—दोनों रूपों की व्याख्या की है।
भक्ति मिश्रित योग (भक्ति योग) :

तुलसीदास जी के अनुसार, बिना भक्ति के केवल क्रियात्मक योग अधूरा है। उत्तरकांड में कागभुशुण्डि-गरुड़ संवाद और श्री राम-लक्ष्मण संवाद के माध्यम से बताया गया है कि असली योग प्रभु श्री राम के चरणों में मन को स्थिर करना है:
• भगति हीन गुण सब सुख हीना। जिमि सर बिनु बारि समाना॥
• ज्ञान विराग योग विज्ञाना। एकहि ते सब सुनु हरियाना॥

अष्टांग योग का उल्लेख :

उत्तरकांड में भक्ति की कठिनता और योग के अंगों का वर्णन करते हुए गोस्वामी जी लिखते हैं:
यम नियम आसन अभ्यासा। जप जोग बिराग सब तासा॥
यहाँ योग की साधना (यम, नियम, आसन, ध्यान, प्राणायाम) को प्रभु की प्राप्ति का एक साधन माना गया है, लेकिन इसे कठिन मार्ग (जैसे खड्ग की धार पर चलना) बताया गया है।

अहंकार का त्याग और मन का निग्रह :

मानस में योग की सार्थकता मन को वश में करने और 'मैं और मोर' (अहंकार और ममता) को मिटाने में मानी गई है:
• मोहि कपट छल छिद्र न भावा। निर्मल मन जन सो मोहि पावा॥

रामचरितमानस में योग का मुख्य सार :
  • योग का अर्थ : मन को विषयों से हटाकर ईश्वर के स्वरूप में लीन करना।
  • योग का फल : आत्मज्ञान, परम शांति और प्रभु-प्रेम (भक्ति) की प्राप्ति।
  • उत्तम मार्ग : केवल कठिन योगसाधना के बजाय प्रेम और निष्काम सेवा से युक्त 'भक्ति योग'।

भगवद्गीता को स्वयं "योगशास्त्र" कहा गया है। गीता का प्रत्येक अध्याय योग का एक अलग आयाम प्रस्तुत करता है। श्री कृष्ण ने अर्जुन के मन के विषाद, भ्रम और द्वंद्व को दूर करने के लिए जीवन जीने की कला के रूप में योग का उपदेश दिया।
     गीता में योग केवल शारीरिक आसनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मन को शांत करने, आत्मा को परमात्मा से जोड़ने और कर्म को कुशलतापूर्वक करने की साधना है।
गीता में योग के ४ प्रमुख मार्ग :
योग मार्ग मुख्य सिद्धांत किस स्वभाव के व्यक्ति के लिए उपयुक्त ?
कर्म-योग
(Action)
निष्काम कर्म (बिना फल की चिंता किए केवल अपना कर्तव्य निभाना) कर्मठ और सक्रिय व्यक्ति
भक्ति-योग
(Devotion)
भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण, प्रेम और श्रद्धा भावुक और श्रद्धालु व्यक्ति
ज्ञान-योग
(Knowledge)
सत्य और असत्य, आत्मा और शरीर के अंतर को विवेक से समझना चिंतनशील और बुद्धिजीवी व्यक्ति
राज-योग/ध्यान-योग (Meditation) मन और इंद्रियों पर नियंत्रण पाकर ध्यान केंद्रित करना अनुशासन और एकाग्रता चाहने वाले व्यक्ति
गीता के अनुसार योग की प्रमुख परिभाषाएं :
श्री कृष्ण ने गीता में योग को बहुत ही व्यावहारिक और स्पष्ट शब्दों में परिभाषित किया है:
1• समत्वं योग उच्यते (अध्याय २, श्लोक ४८)

"समता (संतुलन) ही योग है।" सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय और सफलता-विफलता में मन को शांत और स्थिर रखना ही वास्तविक योग है।

2• तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् (अध्याय ६, श्लोक २३)

"दुखों के संयोग तथा वियोग से रहित हो जाना ही योग है।" जब मनुष्य सांसारिक कष्टों से विचलित होना छोड़ देता है, तब वह योग की स्थिति में होता है।

श्रीमद्भगवद्गीता का अध्याय 5 'संन्यास योग' (कर्मसंन्यास योग) के नाम से जाना जाता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मसंन्यास (कर्मों का त्याग) और कर्मयोग (निष्काम भाव से कर्म करना) के बीच के अंतर तथा दोनों के संबंध को स्पष्ट किया है।
संन्यास योग का मूल सिद्धांत :
1• कर्मसंन्यास बनाम कर्मयोग :
  • अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि कर्मों का त्याग (संन्यास) और कर्मयोग—इन दोनों में से कौन सा मार्ग अधिक श्रेयस्कर है?
  • श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि यद्यपि दोनों ही मार्ग परम कल्याण (मुक्ति) की ओर ले जाते हैं, फिर भी कर्मयोग, कर्मसंन्यास से श्रेष्ठ और सुगम है।
2• सच्चा संन्यासी कौन है ?
  • सच्चा संन्यासी वह नहीं है जो केवल घर-बार या कर्मों का त्याग कर दे, बल्कि वह है जो न किसी से द्वेष करता है और न ही किसी वस्तु की इच्छा (आकांक्षा) रखता है।
  • जो व्यक्ति राग-द्वेष से परे हो गया है, वह गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी नित्य संन्यासी ही है।
3• योगः कर्मसु कौशलम् (अध्याय २, श्लोक ५०)

"कर्मों में कुशलता ही योग है।" बिना आसक्ति और फलासक्ति के समभाव से अपना कर्तव्य पूरा करना ही योग की कला है।

बुद्धियुक्तो जहातीह, उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्मात योगाय युज्यस्व, योग: कर्मसु कौशलम् ॥ 50॥
शब्द अर्थ :- बुद्धि-युक्त:-बुद्धि से युक्त; जहाति-मुक्त हो सकता है; इह-इस जीवन मे; उभे - दोनों; सुकृत-दुष्कृते -शुभ तथा अशुभ कर्म; तस्मात् -इसलिए; योगाय -योग के लिए; युज्यस्व -प्रयास करना; योगः -योग; कर्मसु-कौशलम् -कुशलता से कार्य करने की कला।
अर्थ :- समत्व बुद्धि से युक्त मनुष्य यहाँ (इस लोक में) जीवित रहते हुए ही पुण्य और पाप—दोनों का त्याग कर देता है। इसलिए तुम योग (समत्व योग) से जुड़ जाओ, क्योंकि कर्मों में कुशलता (चतुराई) ही योग है।
समत्व-बुद्धि से युक्त मनुष्य इस लोक में पुण्य और पाप (शुभ और अशुभ कर्मों) दोनों को यहीं त्याग देता है। इसलिए तुम योग (समत्व-भाव) में लग जाओ, क्योंकि कर्मों में कुशलता (कुशलतापूर्वक कर्म करना) ही योग है।
अनुवाद :- जब कोई मनुष्य बिना आसक्ति के कर्मयोग का अभ्यास करता है तब वह इस जीवन में ही शुभ और अशुभ कर्मफलों से छुटकारा पा लेता है। इसलिए योग के लिए प्रयास करना चाहिए जो कुशलतापूर्वक कर्म करने की कला है।
भावार्थ (विस्तृत अर्थ):
  • बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते : जो व्यक्ति समत्व-बुद्धि (बिना फल की चिंता किए निष्काम भाव से कार्य करने की बुद्धि) को प्राप्त कर लेता है, वह जीवन में रहते हुए ही अच्छे और बुरे कर्मों के बंधनों (पाप और पुण्य) से मुक्त हो जाता है।
  • तस्माद्योगाय युज्यस्व : इसलिए हे अर्जुन! तुम समत्व रूपी योग में लग जाओ।
  • योगः कर्मसु कौशलम् : कर्मों को फल की आसक्ति छोड़कर, पूर्ण कुशलता और निष्काम भाव से करना ही सच्चा 'योग' है।

ध्यान योग का व्यावहारिक मार्गदर्शन(अध्याय ६)
गीता के छठे अध्याय में श्री कृष्ण ने ध्यान लगाने की प्रक्रिया और मन के स्वभाव पर विस्तार से बात की है:
  • आहार और जीवनशैली में संतुलन : योग न तो बहुत अधिक खाने वाले का सिद्ध होता है और न ही बिल्कुल न खाने वाले का; न बहुत सोने वाले का और न ही लगातार जागने वाले का।
  • मन को मित्र बनाना : आत्मनिग्रह (स्वयं पर नियंत्रण) के द्वारा मन को अपना मित्र बनाना आवश्यक है, वरना अनियंत्रित मन शत्रु की तरह व्यवहार करता है।
  • निरंतर अभ्यास : जब अर्जुन कहते हैं कि मन वायु की तरह चंचल है, तो कृष्ण उत्तर देते हैं कि अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।

      सामान्यतः प्राचीन काल से अभी तक लोग भारतीय दर्शन के 'योग' को समझने और करने के लिए, करने वालों ने अपना सर्वस्व लगा दिया है परन्तु 'योग' शब्द की रहस्यमयी गाथा ने बड़े-से-बड़े विद्वानों, साधकों और तपस्वियों को भी 'मृगतृष्णा' की भाँति योग रुपी प्यास से बेचैन और व्याकुल कर योग की अत्यंत रहस्यमयी गुफाओं में कैद कर दिया है और उससे निवृति पाने का कोई भी मार्ग दृष्टिगोचर नहीं जान पड़ता है ! परन्तु,
     "ब्रह्मर्षि स्फोटाचार्य" ने 'योग' का इतना सरल और सटीक परिभाषा दिया है कि आम जनमानस भी इसके अर्थ को भली-भाँती समझ सकता है और अपने जीवन में निर्बाध रूप से अमल कर सकता है ! इनके 'योग' की इस परिभाषा की गरिमा यह है कि भागवत गीता में श्रीकृष्ण के द्वारा दिए गए योग की सर्वोत्कृष्ट परिभाषा "योगः कर्मसु कौशलम" (अध्याय 2, श्लोक 50) में यद्यपि ज्ञानीजन 'कौशलम' का अर्थ "तन्मयता अथवा मन से किया गया" ही समझते हैं परन्तु, इससे पूर्व जो हमलोगों ने भागवत गीता का अध्ययन किया उसमें कहीं 'कौशलम' का अर्थ ("तन्मयता अथवा मन से किया गया") नहीं दर्शाया गया है! इसलिए "कौशलम" एक प्रश्न बनकर विद्वानों, साधकों और तपस्वियों को 'प्रश्नचित्त' होने में अत्यंत ही सूक्ष्म परन्तु जटिल बाधा उत्पन्न कर देता है!
      परन्तु "ब्रह्मर्षि स्फोटाचार्य" ने इस प्रश्न को भी अनुप्राणित कर "श्रीकृष्ण" के "योगः कर्मसु कौशलम" ("कर्म में कुशलता ही योग है") में "पूर्णमनसा करणमेव कौशलम्" ("और पूर्ण मन से करना ही कुशलता है ।") को जोड़कर बिलकुल ही सहज बना दिया है और प्रश्नचित्त कर इसे हमारे मानस-पटल पर अंकित करने का अद्वितीय प्रयास किया है ! क्योंकि,
      यदि हम कहते हैं - "कर्म में कुशलता ही योग है" तो एक प्रश्न उठता है - "कुशलता क्या है ?" इसी का उत्तर देते हुए "ब्रह्मर्षि स्फोटाचार्य" ने कहा - "पूर्ण मन से करना ही कुशलता है ।" यद्यपि प्रश्न कहीं भी बन सकता है, यहाँ भी हम प्रश्न खड़ा कर सकते हैं कि "मन से कैसे करते हैं ?" परन्तु, इस प्रश्न का यहाँ पर महत्त्व इसलिए नहीं रह जाता है क्योंकि सभी मनुष्य का कोई-ना-कोई एक मनपसंद काम अवश्य होता है और जो उसका मनपसंद काम होता है वह खुद कहता है कि इसमें हमको मन लगता है, कोई कहता है इस काम में मुझे बहुत मन लगता है तो वह व्यक्ति उस काम को पूरे मन से कर सकता है ! इसलिए प्रत्येक व्यक्ति यह जानता है कि कार्य को कैसे पूरे मन से किया जाता है ! अतः "मन से कैसे करते हैं ?" इस प्रश्न का किसी के लिए भी कोई महत्त्व नहीं रह जाता है !
      इस प्रकार, "ब्रह्मर्षि स्फोटाचार्य" ने श्रीकृष्ण के इस सूत्र - "योगः कर्मसु कौशलम" को सरलता और सहजता के चरमोत्कर्ष बिंदु पर लाकर इतना सहज, सरल और सुलभ बना दिया है कि अब आम जन-मानस भी आसानी से योग को उपलब्ध हो सकता है और कर्मयोग के परमसुख तथा परमानुभूति को प्राप्त कर इसी जीवन में मोक्ष के परमानन्द को भी अनुभूत कर सकता है !
      अतः "ब्रह्मर्षि स्फोटाचार्य" ने इस सूत्र का रहस्य-भेदन सर्व-सुलभ भाषा में किया है - "योगः कर्मसु कौशलम, पूर्णमनसा करणमेव च कौशलम्। तस्मात् पूर्णेन मनसा कृतं कर्मैव योगः॥" अर्थात् "कर्म में कुशलता ही योग है, और पूर्ण मन से करना ही कुशलता है । इसलिए पूर्ण मन से किया गया कर्म ही योग है ।।"
ब्रह्मर्षि स्फोटाचार्य की दृष्टि में योग का सरल, संक्षिप्त, स्वाभाविक, मार्मिक तथा सम्पूर्ण अध्यात्मिक परिभाषा है :
• "पूर्णेन मनसा कृतं कर्मैव योगः।" - अर्थात् "पूर्ण मन से किया गया कर्म ही योग है ।"
बावजूद इसके "ब्रह्मर्षि स्फोटाचार्य" ने श्रीकृष्ण के इस सूत्र - "योगः कर्मसु कौशलम" को ही सर्वश्रेष्ठ और अतिउत्तम योग सूत्र मानते और बताते हैं तथा सम्पूर्ण मानव मन से इसी परम सूत्र को अनुकरण, अवलोकन और निदिध्यासन करने का निवेदन करते हैं ! क्योंकि "योगः कर्मसु कौशलम" का वास्तविक अर्थ यही है - "पूर्ण मन से किया गया कर्म ही योग है ।"
      "ब्रह्मर्षि स्फोटाचार्य" का यह विचार "पूर्णेन मनसा कृतं कर्मैव योगः।" - अर्थात् "पूर्ण मन से किया गया कर्म ही योग है ।" योग के वास्तविक और सूक्ष्म अर्थ को बेहद ख़ूबसूरत तरीक़े से प्रस्तुत करता है।  
      आमतौर पर योग को केवल शारीरिक आसनों, प्राणायाम या ध्यान तक सीमित मान लिया जाता है, लेकिन यह पंक्ति योग के व्यावहारिक और कर्मयोग वाले रूप को रेखांकित करती है।
श्रीमद्भगवद्गीता के "योगः कर्मसु कौशलम्" (कर्मों में कुशलता ही योग है) के सिद्धांत की तरह, यह विचार भी यह सिखाता है कि:
  • उपस्थिति (Presence) : आप जो भी काम कर रहे हों—चाहे वह पढ़ाई हो, कोई कलात्मक सृजन हो, या दैनिक जीवन का कोई साधारण सा काम—यदि आपका मन उसमें पूरी तरह लीन है, तो वही आपकी साधना बन जाती है और यही साधना 'योग' बन जाता है । अन्यथा कर्म-बंधन !
  • बिखराव का अंत : जब मन आधा-अधूरा या भटका हुआ न होकर 'पूर्ण' होता है, तो कार्य और कर्ता के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है। वही स्थिति (जुड़ना) योग है।
मुख्य संदर्भ और अर्थ:
  • समर्पण और भक्ति: जब किसी कार्य, ईश्वर की उपासना या कर्तव्य को बिना किसी भटकाव और पूरे समर्पण के साथ किया जाता है, तो उसे 'पूर्णमनसा' कहा जाता है।
  • वैदिक व आध्यात्मिक महत्व: शास्त्रों और दर्शन में माना गया है कि केवल शरीर या शब्दों से किया गया कार्य अधूरा होता है; जब तक उसमें मन का पूर्ण सहयोग ('पूर्णमनसा') न हो, तब तक वह सिद्ध नहीं होता।
  • मानसिक स्थिति: यह स्थिति चित्त की स्थिरता, ईमानदारी और एकाग्रता को दर्शाती है।

इसलिए यह प्रसिद्ध श्लोक "मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।" अमृतबिन्दु उपनिषद् (श्लोक 2) का है, जो मैत्रायणी उपनिषद् और अन्य वेदांत ग्रंथों में भी पाया जाता है।
पूर्ण श्लोक:
मन एव मनुष्याणां, कारणं बन्धमोक्षयोः।
बन्धाय विषयासक्तं, मुक्त्ये निर्विषयं स्मृतम्॥
सरल अर्थ:
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः: मनुष्यों के बंधन (संसार/दुःख में फँसने) और मोक्ष (मुक्ति/शांति) का मूल कारण उनका मन ही है।
बन्धाय विषयासक्तं: जब मन सांसारिक विषयों, भोगों और वासनाओं में आसक्त (लीन) रहता है, तो वह बंधन का कारण बनता है।
मुक्त्ये निर्विषयं स्मृतम्: जब मन विषयों की आसक्ति से रहित (शांत और शुद्ध) हो जाता है, तो वही मोक्ष या आत्म-मुक्ति का मार्ग खोलता है।
सार:
मन स्वयमेव न अच्छा है न बुरा; यह एक साधन है। यदि यह बाह्य संसार और वासनाओं की ओर भटकता है तो दुःख देता है, और यदि यह अंतर्मुखी होकर आत्म-चिंतन में लगता है तो मुक्ति प्रदान करता है।

"पूर्णेन मनसा कृतं कर्म एव योगः" ("पूर्ण मन से किया गया कर्म ही योग है।")
यह वाक्य मुख्य रूप से तीन घटकों से मिलकर बना है:
गुण/भाव (तृतीया विभक्ति): पूर्णमनसा (पूर्ण मन से)
क्रिया/कर्म (कृदन्त): कृतं कर्म (किया गया कार्य)
परिणाम/परिभाषा: एव योगः (ही योग है)
      इस संरचना और अर्थ-गांभीर्य के आधार पर "ब्रह्मर्षि स्फोटाचार्य" ने अन्य सभी संभावित और सुंदर वाक्य नीचे दिए गए हैं: परन्तु "पूर्णेन मनसा कृतं कर्म एव योगः" के सामान प्रश्नचित्त कोई भी नहीं है ।
'योग' की परिभाषा पर आधारित वाक्य (कर्म और मन के भाव)
एकाग्रचित्तेन कृतं कर्म एव योगः। (एकाग्र चित्त से किया गया कर्म ही योग है।)
निष्कामभावेन कृतं कर्म एव योगः। (बिना फल की इच्छा के निष्काम भाव से किया गया कर्म ही योग है।)
समत्वभावेन कृतं कर्म एव योगः। (समता के भाव से किया गया कर्म ही योग है। — भगवद्गीता के "समत्वं योग उच्यते" पर आधारित)
सत्यनिष्ठया कृतं कर्म एव योगः। (सत्य और निष्ठा से किया गया कर्म ही योग है।)
अहंकाररहितेन कृतं कर्म एव योगः। (बिना अहंकार के किया गया कर्म ही योग है।)
निःस्वार्थभावेन कृतं कर्म एव योगः। (निःस्वार्थ भाव से किया गया कर्म ही योग है।)

      यद्यपि श्रीकृष्ण ने योग को छः खण्डों (कर्म-योग, भक्ति-योग, ज्ञान-योग, राज-योग, ध्यान-योग और सन्यास-योग) (राज-योग, ध्यान-योग को एक श्रेणी में तथा सन्यास-योग से श्रेष्ठ कर्म-योग) में विभक्त किया है परंतु निष्कर्षतः यदि हम सूक्ष्म अथवा मोटी दृष्टि से भी देखें तो "योगः कर्मसु कौशलम"("पूर्ण मन से किया गया कर्म ही योग है ।") में ही उक्त सभी योग समाहित हो जाते हैं, क्योंकि किसी भी योग के मूल में पूर्णरूपेण "कर्म" ही निहित है !
      अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि "योगः कर्मसु कौशलम"("पूर्ण मन से किया गया कर्म ही योग है ।") ही योग की एकमात्र परिभाषा है !

दर्शन और
में योग का स्वरूप :
स्थिर करने और ध्यान लगाने की प्रक्रिया को 'योग'
• • का बल: अंतर को समझना) ही योग का अंतिम लक्ष्य है।

सांख्य