| परम्परा | योग का मूल लक्ष्य | मुख्य दृष्टिकोण |
| • वेद (उपनिषद्) | इंद्रिय-निग्रह और मन को ब्रह्म में लीन करना | ज्ञान, ध्यान और आत्म-साक्षात्कार |
| • आगम (तंत्र) | शिव-शक्ति का सामंजस्य और कुंडलिनी का ऊर्ध्वगमन | प्राण-साधना, मंत्र, मुद्रा और ऊर्जा का संतुलन |
| विषय | शिव सूत्र का दृष्टिकोण |
|---|---|
| चेतना की स्थिति | केवल ध्यान लगाना योग नहीं है, बल्कि हर पल स्वयं को शिव स्वरूप अनुभव करना योग है। |
| जगत की दृष्टि | "दृश्यं शरीरम्" — साधक के लिए संपूर्ण संसार और अपना शरीर शिव का ही नृत्य/रूप प्रतीत होता है। |
| मुक्ति का अर्थ | "जीवन्मुक्तः" — जीवित रहते हुए सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर आनंद में रहना। |
| योग का प्रकार | सामवेद में रूप / वर्णन |
| • नाद / संगीत योग | स्वरों की साधना द्वारा मन को परमात्मा में लीन करना। |
| • मंत्र / जप योग | ऋचाओं का शुद्ध उच्चारण और साम-गान के द्वारा अंतःकरण की शुद्धि। |
| • ध्यान योग | संगीत और ओंकार के उच्चारण से मन की एकाग्रता और समाधि की प्राप्ति। |
| • भक्ति योग | ईश्वर (अग्नि, इन्द्र, सोम) के प्रति लयबद्ध गीतों के माध्यम से समर्पण और स्तुति। |
अर्थ: मनुष्य को इस संसार में निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों/कर्मों को करते हुए 100 वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। इस प्रकार अनासक्त होकर कर्म करने से मनुष्य कर्म-बंधन में नहीं फंसता।
यौगिक दृष्टिकोण : यही भावना श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कर्मयोग का आधार बनती है। कर्म त्यागना योग नहीं है, बल्कि कर्मफल के प्रति आसक्ति का त्याग करके कर्तव्य का पालन करना ही योग है।| विषय | विवरण |
|---|---|
| मुख्य विचार | प्रज्ञानं ब्रह्म (शुद्ध चेतन तत्त्व ही ब्रह्म है) |
| योग का स्वरूप | ज्ञानयोग एवं आत्म-साक्षात्कार |
| साधना का लक्ष्य | चित्त/इंद्रियों को अंतर्मुखी करके आत्मा और ब्रह्म के अभेद को जानना |
| विषय | सांख्य दर्शन (कपिल) | योग दर्शन (पतंजलि) |
| • दृष्टिकोण | सैद्धांतिक (ज्ञान-प्रधान) | व्यावहारिक (साधना-प्रधान) |
| • ईश्वर का स्थान | निरीश्वरवादी (ईश्वर की प्रत्यक्ष आवश्यकता नहीं मानी) | सेश्वरवादी (ईश्वर साधना में सहायक माना गया) |
| • तत्वों की संख्या |
25 तत्व (प्रकृति, पुरुष, महत आदि)
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26 तत्व (सांख्य के 25 तत्व + 1 ईश्वर)
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| • मुख्य साधन | तत्व ज्ञान / विवेक ज्ञान | अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम आदि) |
| अध्याय (पाद) | विषय वस्तु |
| १. समाधि पाद : | योग का स्वरूप, चित्त की वृत्तियाँ और समाधि के प्रकार। |
| २. साधन पाद : | क्रियायोग, क्लेश (दुःख के कारण) और अष्टांग योग के पहले 5 अंग। |
| ३. विभूति पाद : | अष्टांग योग के अंतिम 3 अंग (धारणा, ध्यान, समाधि) और उनसे प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ। |
| ४. कैवल्य पाद : | मोक्ष, चेतना का स्वरूप और परम स्वतंत्रता (कैवल्य)। |
| अंग (दृष्टि) | अर्थ व स्वरूप |
| 1. मित्रा | योग मार्ग की ओर झुकाव और कल्याणकारी दृष्टि। |
| 2. तारा | सत्य को जानने की तीव्र इच्छा और जिज्ञासा। |
| 3. बला | संकल्प और संयम में दृढ़ता आना। |
| 4. दीप्रा | शंकाओं का निवारण और ज्ञान का प्रकाश होना। |
| 5. स्थिरा | ध्यान और साधना में स्थिरता प्राप्त होना। |
| 6. कांता | आत्मा के वास्तविक स्वरूप से प्रेम और आनंद। |
| 7. प्रभा | परम समाधि की अवस्था और केवलज्ञान के समीप पहुँचना। |
| 8. परा | पूर्ण मुक्ति, कर्म-मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति। |
| अंग | अर्थ/उद्देश्य |
|---|---|
| १. आसन | शरीर में स्थिरता और दृढ़ता लाना |
| २. प्राणायाम | प्राणवायु का नियमन और नाड़ी शुद्धि |
| ३. प्रत्याहार | इंद्रियों को बाह्य विषयों से समेटना |
| ४. धारणा | चित्त को किसी एक स्थान/बिंदु पर केंद्रित करना |
| ५. ध्यान | आत्म-स्वरूप में निरंतर लौ लगाना |
| ६. समाधि | द्वैत (भेद) भाव समाप्त होकर परम तत्त्व में लीन होना |
सुंदरकांड में हनुमान जी द्वारा समुद्र लांघने की घटना को योग की पराकाष्ठा (ध्यान, वायु-साधना और संकल्प शक्ति) के रूप में दर्शाया गया है। जब मन एकाग्र होकर एक लक्ष्य (श्री राम का कार्य) पर टिक जाता है, तो असंभव कार्य भी संभव हो जाता है।
उत्तरकांड में भक्ति की कठिनता और योग के अंगों का वर्णन करते हुए गोस्वामी जी लिखते हैं:
यम नियम आसन अभ्यासा। जप जोग बिराग सब तासा॥
यहाँ योग की साधना (यम, नियम, आसन, ध्यान, प्राणायाम) को प्रभु की प्राप्ति का एक साधन माना गया है, लेकिन इसे कठिन मार्ग (जैसे खड्ग की धार पर चलना) बताया गया है।
मानस में योग की सार्थकता मन को वश में करने और 'मैं और मोर' (अहंकार और ममता) को मिटाने में मानी गई है:
• मोहि कपट छल छिद्र न भावा। निर्मल मन जन सो मोहि पावा॥
| योग मार्ग | मुख्य सिद्धांत | किस स्वभाव के व्यक्ति के लिए उपयुक्त ? |
|---|---|---|
| कर्म-योग (Action) |
निष्काम कर्म (बिना फल की चिंता किए केवल अपना कर्तव्य निभाना) | कर्मठ और सक्रिय व्यक्ति |
| भक्ति-योग (Devotion) |
भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण, प्रेम और श्रद्धा | भावुक और श्रद्धालु व्यक्ति |
| ज्ञान-योग (Knowledge) |
सत्य और असत्य, आत्मा और शरीर के अंतर को विवेक से समझना | चिंतनशील और बुद्धिजीवी व्यक्ति |
| राज-योग/ध्यान-योग (Meditation) | मन और इंद्रियों पर नियंत्रण पाकर ध्यान केंद्रित करना | अनुशासन और एकाग्रता चाहने वाले व्यक्ति |
"समता (संतुलन) ही योग है।" सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय और सफलता-विफलता में मन को शांत और स्थिर रखना ही वास्तविक योग है।
"दुखों के संयोग तथा वियोग से रहित हो जाना ही योग है।" जब मनुष्य सांसारिक कष्टों से विचलित होना छोड़ देता है, तब वह योग की स्थिति में होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता का अध्याय 5 'संन्यास योग' (कर्मसंन्यास योग) के नाम से जाना जाता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मसंन्यास (कर्मों का त्याग) और कर्मयोग (निष्काम भाव से कर्म करना) के बीच के अंतर तथा दोनों के संबंध को स्पष्ट किया है।"कर्मों में कुशलता ही योग है।" बिना आसक्ति और फलासक्ति के समभाव से अपना कर्तव्य पूरा करना ही योग की कला है।