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SatyaDharma
अखिल भारतीय अंगिका साहित्य समिति के पदाधिकारी एवं सदस्यगण

संस्थापक सह अध्यक्ष
डॉ रमेश मोहन शर्मा "आत्मविश्वास"

उपाअध्यक्ष
१ . डॉ ब्रह्मदेव ब्रह्म
२. श्री रत्नेश शर्मा "अंजन"


कोषाध्यक्ष
श्री श्रवण बिहारी

महासचिव
डॉ मुकेशचन्द्र शर्मा "अधिवक्ता"

उप महासचिव
श्री अनिल कुमार मंडल "बेकार"

कार्यकारिणी सदस्य
१. श्रीमती सविता देवी
२. श्रीमति उषा देवी
३. डॉ कंचन माला
४. श्री गुलशन कुमार
५. हरी प्रमोद शर्मा "हरिताभ"


परामर्श

संरक्षक
श्री आनन्दी प्रसाद मंडल (समाजसेवी)

तकनीकि निर्देशन
स्फोटाचार्य आशीष आनन्द

अंगिका भाषा प्रचार अभियान समिति

डॉ रमेश मोहन शर्मा "आत्मविश्वास"
डॉ ब्रह्मदेव ब्रह्म
अधिवक्ता प्रभाश्चंद्र मतवाला
साथी सुरेश सूर्य
श्रवण बिहारी
अनिल कुमार मंडल "बेकार"
कवि महेंद्र निशाकर
कपिलदेव ठाकुर "कृपाला"
योगेन्द्र मंडल "कर्मयोगी"


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ताजा खबर
अंगिका के जनक
ध्वनि वैज्ञानिक
डॉ रमेश मोहन शर्मा "आत्मविश्वास "


१७ जून २०१८ रविवार को काव्य गोष्ठी में उपस्थित अंगिका भाषा के प्रथम मानक व्याकरणकार डॉ. रमेश मोहन शर्मा "आत्मविश्वास", परिषद् के अध्यक्ष महेंद्र निशाकर , डॉ. भूपेंद्र मंडल, डॉ. जयंत जलज , गीतकार कपिलदेव कृपाला जी एवं अन्य




मिडिया के सामने ध्वनि वैज्ञानिक डॉ. रमेश मोहन शर्मा "आत्मविश्वास"
(१७ जून २०१८)



कवि प्रभाश्चंद्र "मतवाला" को सम्मानित करते "डॉ. आत्मविश्वास"



















अंगिका के जनक
ध्वनि वैज्ञानिक
डॉ रमेश मोहन शर्मा "आत्मविश्वास"

सन्देश

       हिंदी के अपेक्षा अंगिका वर्तनी का स्वरुप अधिक वैज्ञानिक है | इसके माध्यम से जैसा बोला जाता है वैसा लिखा भी जाता है | उदाहरण के तौर पर हिंदी के निम्नांकित वाक्य पर ध्यान दें - ''उसने मुझे अपना लिया'' तथा ''यह मेरा अपना काम है''| उक्त दोनों वाकया में 'अपना' शब्द के लिखित स्वरुप (वर्तनी) एक सामान अवश्य है किन्तु दोनों वाकया में प्रयुक्त 'अपना' शब्द के ध्वन्यात्मक स्वरुप में स्थूल अंतर है | पहले वाकया में 'अपना' के अन्त्य ध्वनि के उच्चारण-स्वरुप मौखिक है जबकि दुसरे वाक्य के 'अपना' शब्द के अन्त्य ध्वनि का उच्चारण-स्वरुप नासिक है | अतः स्पष्ट है कि हिंदी भाषा के वर्तनी में वैज्ञानिकता का अभाव अवश्य है | इस दृष्टि से अंगिका भाषा का ध्वनि-विज्ञान हिंदी की अपेक्षा अधिक सशक्त है |
       ध्यातव्य है कि अंगिका भाषा का ध्वनि-स्वरुप प्राचीन वैदिककालीन भाषा के ध्वनि-स्वरुप से साम्य सम्बन्ध स्थापित करने में समर्थ है | कलकत्ता विश्वविद्यालय के शोध- परिक्षण के मंतव्य तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय , भागलपुर को प्राप्त है कि ''अंगिका भाषा का ध्वनि वैज्ञानिक अध्ययन'' के शोधकर्ता डॉ शर्मा ने अपने ध्वनि- विषयक शोध में हनुमान कूद की छलांग लगाईं है जो सत्य भी है |" किन्तु, लोगों को यह भ्रम उत्पन्न होता है कि डॉ आत्मविश्वास को वैदिककालीन ध्वनि-स्वरुप का ज्ञान कैसे हुआ | अंगिका के पाठक को हम कहना चाहते हैं कि "ऋग्वेद प्रातिशाख्यम" आदि प्राचीन वैदिक ग्रन्थ के आधार पर ही हमको इसका ज्ञान हासिल हुआ है | दोनों काल के ध्वनि के उच्चारण-स्वरुप के लिखित विवेचन के आधार पर ही मैंने यह निष्कर्ष प्राप्त किया है |
       ध्यातव्य है कि प्रातिशाख्यम के आधार पर ही हमने अंगिका भाषा में उदात्त, अनुदात्त और स्वारित स्वर के उच्चारण-स्वरुप निरुपित किया है | ऋग्वेद प्रातिशाख्यम जैसे प्राचीन ग्रंथों में जिसको 'स्वारित' स्वर कहा गया है, वह अंगिका का खड़ीपाय है | ऋग्वेद प्रातिशाख्यम में उच्चारित ध्वनि का प्रकार निम्नांकित रूप से बताया गया है - "आयाम विस्राम्भाक्षेपेस्त उच्यन्ते"| यही सूत्र के आधार पर अंगिका खड़ीपाय का स्वरुप निरुपित किया गया है | स्वारित स्वर (खड़ीपाय) के उच्चारण 'तिर्यग्ग्मन' के आधार पर होता है अर्थात खड़ीपाय के उच्चारण में प्राणवायु के निमित्त उच्चारणावयव तनाव या खिंचाव की अवस्था में जाकर फिर शैथिल्य की अवस्था में आ जाता है | इस उच्चारण- लक्षण का अनुभव साधारण पाठक को नहीं हो सकता है | इसका अनुभव ध्वनि-विशेषज्ञ को ही हो सकता है | अतः विद्वान पाठक एवं सच्चा साहित्य-साधक को ध्वनि-विज्ञान- सम्मत वर्तनी का ही प्रयोग करना चाहिए |

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