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Service Of a Man is the Service Of God. DEDICATED TO INDIA VISION 2020. The Dream Of Our Real President Of India Mahamahim Dr. A.P.J. Abdul Kalam
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SatyaDharma
अखिल भारतीय अंगिका साहित्य समिति के पदाधिकारी एवं सदस्यगण

संस्थापक सह अध्यक्ष
डॉ रमेश मोहन शर्मा "आत्मविश्वास"

उपाअध्यक्ष
१ . डॉ ब्रह्मदेव ब्रह्म
२. श्री रत्नेश शर्मा "अंजन"


कोषाध्यक्ष
श्री श्रवण बिहारी

महासचिव
डॉ मुकेशचन्द्र शर्मा "अधिवक्ता"

उप महासचिव
श्री अनिल कुमार मंडल "बेकार"

कार्यकारिणी सदस्य
१. श्रीमती सविता देवी
२. श्रीमति उषा देवी
३. डॉ कंचन माला
४. श्री गुलशन कुमार
५. हरी प्रमोद शर्मा "हरिताभ"



परामर्श

संरक्षक
श्री आनन्दी प्रसाद मंडल (समाजसेवी)

तकनीकि निर्देशन
स्फोटाचार्य आशीष आनन्द

अंगिका भाषा प्रचार अभियान समिति

डॉ रमेश मोहन शर्मा "आत्मविश्वास"
डॉ ब्रह्मदेव ब्रह्म
अधिवक्ता प्रभाश्चंद्र मतवाला
साथी सुरेश सूर्य
श्रवण बिहारी
अनिल कुमार मंडल "बेकार"
कवि महेंद्र निशाकर
कपिलदेव ठाकुर "कृपाला"
योगेन्द्र मंडल "कर्मयोगी"

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नाम - डॉ रमेश मोहन शर्मा "आत्मविश्वास"
उपनाम - डॉ आत्मविश्वास
पिता - श्री भागो प्रसाद शर्मा
पता - जयमंगल टोला परबत्ता, पो - साहू परबत्ता, भागलपुर, बिहार-८५३२०४       (भारत) मो. न. - ८८०९५९७५९५
सेवा - प्रधानाध्यापक, महर्षि मेंहीं उच्च विद्यालय, अठ्गामा-राघोपुर (भागलपुर)
जन्म - ०१ फरबरी १९४९ ई.
शिक्षा - बी.ए. ऑनर्स, टी.एन.बी. कॉलेज, भागलपुर
एम.ए., तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर
बी.एड., राजकीय महाविद्यालय, भागलपुर
शोध - पी-एच.डी. - अंगिका अंचल के लोकसाहित्य का अध्ययन (१९८६ ई.)
डी.लिट्. - अंगिका भाषा का ध्वनिवैज्ञानिक अध्ययन (२००० ई.)
मर्मज्ञ - अंगिका लोक साहित्य मर्मज्ञ
संस्थापक - अंगिका साहित्य विकास समिति, परबत्ता, भागलपुर (पंजीकृत)
ध्वन्याचार्य - अंगिका भाषा के प्रथम ध्वनि वैज्ञानिक
अध्यक्ष - अखिल भारतीय जहानु विचार एवं विकास मंच, नवगछिया, भागलपुर
मेम्बर - रिसर्च बोर्ड ऑफ़ एडवाईजर्स, अमेरिकन बायोग्राफिकल इंस्टिट्यूट         (USA)
पूर्व सदस्य - स्नातकोत्तर अंगिका पाठ्यक्रम निर्माण हेतु गठित प्रथम परामर्शदात्री           समिति, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर
फेलोशिप - डॉ. आंबेडकर फेलोशिप (१९९४), (भारतीय दलित साहित्य           अकादमी, दिल्ली)
सम्पादक - अन्गिकांचल (त्रैमासिक, अवैतनिक सेवा १९९२ ई. से )
भाषासर्वेक्षक - अंगिका अंचल की भाषा के प्रथम भाषासर्वेक्षक
प्रतिपादक - अंगिका भाषा की वैज्ञानिक वर्तनी
प्रवर्तक - अंगिका भाषा के युग-प्रवर्तक
सम्मान-उपाधि - अंग-कलाधर (अ.भा.सा. सम्मलेन, भागलपुर प्रमंडल)
शुन्ग्बाहू सम्मान (विश्व विभूति) दियारा महोत्सव २००८
पुरस्कार - भवप्रीता पुरस्कार (१९९९) अंगिका साहित्य कला मंच, भागलपुर
गोपीनाथ तिवारी पुरस्कार - जहान्वी अंगिका संस्कृति संस्थान, पटना
रचनाएँ - १. लोकगाथा बाबा बिसुरौथ ( अंगिका गीतिकाव्य भाषा टीका)
        २. जोति-तपस्या (अंगिका महाकाव्य, सम्पूर्ण सवैया छंद में)
        ३. ऐना (हिंदी अंग्रेजी तथा अंगिका मिश्रित रचनाएँ)
        ४. कैसें लिखबअ कैसें पढ़बअ (अंगिका व्याकरण)
        ५. अंगिका लोकसाहित्य की भूमिका और भाषा सर्वेक्षण
        ६. बाबा अनंतदास (अंगिका निबंध)
        ७. लेखक (समीक्षात्मक निबंध)
        ८. अनुस्वार (नासिक ध्वनियों का स्वरुप-निरूपण)

(डॉ. आत्मविश्वास - एक युगपुरुष)


समादरणीय बन्धुवर ! हमारे हृदयरूपी फुलवारी में वर्षो से खिल रहे पुष्पों के सुगंध हमें मादकता की उच्चतम शिखर पर अभिभूत करने वाले युगपुरुषरूपी पुष्पों में एक युगपुरुष डॉ. रमेश मोहन शर्मा "आत्मविश्वास" जी हैं। जिन्होंने अपने सुकृत्यों से न जाने मुझ जैसे कितने सुहृदयों को अपनी मधुर सुगंध से सुवासित कर रहे होंगे। इनकी शिक्षा-दीक्षा विषयक कुछ भी कहना मानो उच्चतम उपाधियों को शीलभंगिमा से ओतप्रोत करना ही होगा। ऐसे प्रतिभावान व्यक्तित्व के धनी इस संसार को एक नया मार्ग , एक नयी दिशा दिखाने को जो महान आत्मा अवतरित होते हैं उन्हें ही हम "युगपुरुष अथवा अवतार" की सर्वोत्कृष्ट भावों से सम्बोधित करते हैं। भारतवर्ष के प्रथम अंगिका ध्वनि वैज्ञानिक तथा अंगिका के "जनक" की अतुलनीय उपाधियों से सम्मानित "डॉ. आत्मविश्वास जी " ने संसार के लिए एक ऐसी नयी दिशा एवं एक ऐसा मार्ग प्रशस्त किया है जिसकी रेखा वर्तमान समय से लेकर वैदिक युगों तक अपनी स्वर्णमय प्रकाशपुंज से प्रकाशित कर रही है। इनकी "अनुस्वर" की स्थापना ने न केवल व्याकरण को आधार प्रदान किया है , न केवल ध्वनि विज्ञान को सुसज्जित किया है बल्कि भारत के भविष्य के लिए इन्होंने वृहद् रोजगार का द्वार खोल दिया है। इतना ही नहीं, इनके "अनुस्वर" की स्थापना से ऋग्वेदों को भी पूर्णता प्राप्त हुई है। जिस बिन्दु की पराकाष्ठा को प्राप्त करने में भगवान सनत्कुमार ने उस बिन्दु को "स्वरोवाव्यंजनोवा" कहकर तथा महर्षि पाणिनि ने "अयोगवाह" कहकर सम्बोधित किया। उसी बिन्दु को इन्होंने "स्वर" की संज्ञा में लाकर इसे पूर्णता प्रदान किया है। डॉ. आत्मविश्वास जी ने अपने अन्वेषण में यह दृष्टिगोचर किया कि भगवान सनत्कुमार और महर्षि पाणिनि समुद्र की अथाह गहराइयों के तल तक जाकर भी उसकी सतह को स्पर्श किये बगैर ही वापस लौट आये। हमने भी कुछ ऐसा ही आभास किया परन्तु हमारी दिशा भिन्न है। इस आभास के द्वारा न कि हमने इन्हें पुष्टि प्रदान किया बल्कि इनके अन्वेषण से हमने भी स्वयं को पुष्ट होने की सामर्थ्यता प्राप्त हुई है। हमारी चेतना यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं करती बल्कि गौरवान्वित होती है कि "डॉ. आत्मविश्वास" भगवान सनत्कुमार एवं महर्षि पाणिनि के ही अवतार हैं। यदि हम विकासवाद के सिद्धांत का भी अवलोकन करें तथा गीता के उस श्लोक का अवलोकन करें जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि हमारा अंतिम संकल्प ही दूसरे जन्म का सार होता है। इस आधार पर भी यह कहना अतिशयोक्ति नहीं हो सकती। हमारी चेतनागत विकास ही हमारे जन्म का उद्देश्य है तथा यही प्रकृति का नियम भी है। हमारी चेतना एक जन्म में जहाँ तक विकसित हो पाती है, दूसरे जन्म में हम वहीं से प्रारंभ करते हैं। यदि विशेष रूप में किसी खास विषय पर हमारा अनुसंधान चल रहा हो तो तब तक हम जन्म लेते रहते हैं जब तक हमारा अनुसंधान सम्पूर्ण न हो जाय। तब तक हमारा विकास अवरूद्ध रहता है जबतक हमारे शुद्ध मन की अभिव्यक्तियों की पूर्ति न हो जाय। अशुद्ध मन हमें अधोगति तथा शुद्ध मन हमें उर्ध्वगति प्रदान करता है। इस आधार पर भी डॉ. आत्मविश्वास ने यह सिद्ध कर दिया है कि भगवान सनत्कुमार और महर्षि पाणिनि की आत्मा ने ही डॉ. आत्मविश्वास के रूप में जन्म लिया है। ऐसे युगपुरुष, अवतारीपुरुष डॉ. आत्मविश्वास जी को हमारा शत्-शत् नमन है। देश की कानून व्यवस्था भले ही इन्हें अंगिका के ध्वनि वैज्ञानिक और अंगिका के जनक से अलंकृत करे परन्तु सत्य की तथा हमारी दृष्टि में डॉ. आत्मविश्वास जी एक प्रकाण्ड ध्वनि वैज्ञानिक एवं ध्वनि के जनक हैं, क्योंकि जो महान आत्मा भगवान सनत्कुमार और महर्षि पाणिनि की हो वे आत्मा डॉ. आत्मविश्वास के रूप में भी देशकालातीत ही हो सकते हैं। इनके ज्ञान तथा अनुसंधान की रेखा किसी भी विषयों से आबद्ध नहीं बल्कि विषयातीत ही है। अत: डॉ. आत्मविश्वास की कृति ब्रह्माण्डव्यापी ही है, ब्रह्म के समान व्यापकता से एकात्म है, अद्वैत है, आत्मैक्य है। डॉ. आत्मविश्वास जी के इन अलौकिक सुकृत्यों ने ईश्वर से तारतम्यता स्थापित कर हमें ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व को एक नया सूर्योदय प्रदान किया है, एक अलौकिक आभा प्रदान किया है। इनकी शैक्षणिक जीवनशैली को सुनकर हमारा मन प्रफुल्लित एवं गदगद ही नहीं होता वरन् प्रफुल्लित भी प्रफुल्लित हो जाता है और गदगद भी गदगद हो उठता है। गदगद के हृदय को भी झंकृत कर देने वाली डॉ आत्मविश्वास रूपी वीणा की तान यह सिद्ध कर देती है कि इनके हृदयग्रन्थियों में साक्षात् माता सरस्वती का वास है और इनके जीवन की साधन इन्हें साधना के उच्चतम शिखर पर पदासीन करती है । साथ ही साथ इनका कर्म एक सर्वश्रेष्ठ कर्मयोगी के जीवन को चरितार्थ करती है। ऐसे महायोगी को हम पुनः बारम्बार नमन करते हैं और अंततः हमारा हृदय स्त्रोक्तम् गाने को विवश हो जाता है - "या देवी सर्वभूतेषु डॉ. आत्मविश्वासरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ॥ - स्फोटाचार्य

डॉ़ आत्मविश्वास - एक युग पुरूष (भाग-२)
........... और इस अंगिका बोली को आपने डॉ आत्मविश्वास के रूप में भाषा, साहित्य और ध्वनि देकर न कि केवल अंगिका भाषा, अंगिका प्रदेश और अंगिका साहित्य को जीवंत, गौरवान्वित और पूर्ण किया है अपितु अंगिकापुत्र के स्वर्णिम भविष्य को भी उजागर किया है, एक नये रोजगार की अभूतपूर्व द्वार खोल दिया है। भारतीय संविधान के आठवीं अनुसूची तक इसे पहुँचा कर न कि आपने आर्यावर्त्त के शिखर को ऊँचा किया है बल्कि अंगिका को पूर्ण भाषा से प्रमाणित कर दुनियाँ के आठवें अजूबे और चौथी कोहिनूर की उपाधि को भी शिरमौर्य कर लिया है। इतना ही नहीं, ब्रह्माण्डव्यापी सनातन ज्ञान को केन्द्रीयभूत कर भगवान सनकादिक, महर्षि पाणिनि और वेदों को भी सम्पूर्ण किया है। आपकी यह महती कृपा विश्व के मानस पटल पर अमरता की फुहार लिये अनन्तकाल तक बरसती रहेगी। अत: आपके इस अभूतपूर्व कार्य के लिए हम व्यष्टि एवं समष्टिभाव से आपके प्रति अगाध कृतज्ञता प्रकट करते हम अघाते नहीं, फूले नहीं समाते। संसार आपके इस कृति को स्वयं प्रदीप्त जीवनधारा की लौ के समान निश्चय ही अपने हृदय में धारण करेगी। हम आपके उन्मुक्त एवं अवर्चनीय सुकृत्यों को कुछ भी शब्दों में व्यक्त करें तो शब्दों की सुन्दरता, विशालता और तीव्रता में कटुता का भाव उत्पन्न होने का भय ही हमें दृष्टिगोचर होता है। आपके महती कृपा के प्रतिफल को उपाधि से अलंकृत करने में उत्कर्ष एवं प्रकर्ष उदाहरण "सूर्य को दीपक दिखाना" भी ब्रह्माण्ड में सूर्य की नगण्यता के सदृश ही प्रतीत होता है। हम अपनी इस पीड़ा में आपके प्रति हमें हमारे हृदय की पवित्र गाथा ही हमें तुच्छ एवं पूर्ण होने का आभास कराती है, शब्दविहीन होने का आभास कराती है और शब्दातीत कर हमें ईश्वर से तारतम्य एवं तादात्म्य स्थापित करने पर विवश कर देती है। आपसे एकता, आपके ध्वनिविज्ञान से एकता, हमें परमात्मा से एकात्म का बोध कराती है। - आपका भावातीत - स्फोटाचार्य आशीष आनन्द

ताजा खबर
अंगिका के जनक
ध्वनि वैज्ञानिक
डॉ रमेश मोहन शर्मा "आत्मविश्वास "


१७ जून २०१८ रविवार को काव्य गोष्ठी में उपस्थित अंगिका भाषा के प्रथम मानक व्याकरणकार डॉ. रमेश मोहन शर्मा "आत्मविश्वास", परिषद् के अध्यक्ष महेंद्र निशाकर , डॉ. भूपेंद्र मंडल, डॉ. जयंत जलज , गीतकार कपिलदेव कृपाला जी एवं अन्य




मिडिया के सामने ध्वनि वैज्ञानिक डॉ. रमेश मोहन शर्मा "आत्मविश्वास"
(१७ जून २०१८)



कवि प्रभाश्चंद्र "मतवाला" को सम्मानित करते "डॉ. आत्मविश्वास"



















अंगिका के जनक
ध्वनि वैज्ञानिक
डॉ रमेश मोहन शर्मा "आत्मविश्वास"

सन्देश

       हिंदी के अपेक्षा अंगिका वर्तनी का स्वरुप अधिक वैज्ञानिक है | इसके माध्यम से जैसा बोला जाता है वैसा लिखा भी जाता है | उदाहरण के तौर पर हिंदी के निम्नांकित वाक्य पर ध्यान दें - ''उसने मुझे अपना लिया'' तथा ''यह मेरा अपना काम है''| उक्त दोनों वाकया में 'अपना' शब्द के लिखित स्वरुप (वर्तनी) एक सामान अवश्य है किन्तु दोनों वाकया में प्रयुक्त 'अपना' शब्द के ध्वन्यात्मक स्वरुप में स्थूल अंतर है | पहले वाकया में 'अपना' के अन्त्य ध्वनि के उच्चारण-स्वरुप मौखिक है जबकि दुसरे वाक्य के 'अपना' शब्द के अन्त्य ध्वनि का उच्चारण-स्वरुप नासिक है | अतः स्पष्ट है कि हिंदी भाषा के वर्तनी में वैज्ञानिकता का अभाव अवश्य है | इस दृष्टि से अंगिका भाषा का ध्वनि-विज्ञान हिंदी की अपेक्षा अधिक सशक्त है |
       ध्यातव्य है कि अंगिका भाषा का ध्वनि-स्वरुप प्राचीन वैदिककालीन भाषा के ध्वनि-स्वरुप से साम्य सम्बन्ध स्थापित करने में समर्थ है | कलकत्ता विश्वविद्यालय के शोध- परिक्षण के मंतव्य तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय , भागलपुर को प्राप्त है कि ''अंगिका भाषा का ध्वनि वैज्ञानिक अध्ययन'' के शोधकर्ता डॉ शर्मा ने अपने ध्वनि- विषयक शोध में हनुमान कूद की छलांग लगाईं है जो सत्य भी है |" किन्तु, लोगों को यह भ्रम उत्पन्न होता है कि डॉ आत्मविश्वास को वैदिककालीन ध्वनि-स्वरुप का ज्ञान कैसे हुआ | अंगिका के पाठक को हम कहना चाहते हैं कि "ऋग्वेद प्रातिशाख्यम" आदि प्राचीन वैदिक ग्रन्थ के आधार पर ही हमको इसका ज्ञान हासिल हुआ है | दोनों काल के ध्वनि के उच्चारण-स्वरुप के लिखित विवेचन के आधार पर ही मैंने यह निष्कर्ष प्राप्त किया है |
       ध्यातव्य है कि प्रातिशाख्यम के आधार पर ही हमने अंगिका भाषा में उदात्त, अनुदात्त और स्वारित स्वर के उच्चारण-स्वरुप निरुपित किया है | ऋग्वेद प्रातिशाख्यम जैसे प्राचीन ग्रंथों में जिसको 'स्वारित' स्वर कहा गया है, वह अंगिका का खड़ीपाय है | ऋग्वेद प्रातिशाख्यम में उच्चारित ध्वनि का प्रकार निम्नांकित रूप से बताया गया है - "आयाम विस्राम्भाक्षेपेस्त उच्यन्ते"| यही सूत्र के आधार पर अंगिका खड़ीपाय का स्वरुप निरुपित किया गया है | स्वारित स्वर (खड़ीपाय) के उच्चारण 'तिर्यग्ग्मन' के आधार पर होता है अर्थात खड़ीपाय के उच्चारण में प्राणवायु के निमित्त उच्चारणावयव तनाव या खिंचाव की अवस्था में जाकर फिर शैथिल्य की अवस्था में आ जाता है | इस उच्चारण- लक्षण का अनुभव साधारण पाठक को नहीं हो सकता है | इसका अनुभव ध्वनि-विशेषज्ञ को ही हो सकता है | अतः विद्वान पाठक एवं सच्चा साहित्य-साधक को ध्वनि-विज्ञान- सम्मत वर्तनी का ही प्रयोग करना चाहिए |

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