!! OM ATMAGURVE NAMAH !! !! OM ATMAGURVE NAMAH !! !! OM ATMAGURVE NAMAH !! !! OM ATMAGURVE NAMAH !! !! OM ATMAGURVE NAMAH !!
!! ॐ आत्मागुरवे नमः !!
!! OM ATMAGURVE NAMAH !! !! OM ATMAGURVE NAMAH !! !! OM ATMAGURVE NAMAH !! !! OM ATMAGURVE NAMAH !! !! OM ATMAGURVE NAMAH !!
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स्फोट वही
उद्गीत वही
ब्रह्मनाद शब्द
ध्वनिधार वही
स्फोट वही
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ब्रह्मनाद शब्द
ध्वनिधार वही
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सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक चैतन्य शरीर - स्फोटाचार्य
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ध्वनिधार वही
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  • सरस्वती मंदिर, भवानीपुर

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  • जैसे मानव तन बसे जीवा हैं अनेक, वैसे मानव जीव है प्रभु के तन में एक ! - स्फोटाचार्य

    प्रश्नोत्तर संवाद ( स्फोटाचार्य - नानकचंद देव)

    🌹💥स्फोट💥🌹

    प्रश्नकर्ता - नानकचन्द देव
    प्रश्न - भगवन् सकारात्मकता और नकारात्मकता पर थोड़ा विस्तार से प्रकाश डाल अनुग्रहित करें। सादरम् 🙏🏻🌹💥🕉 उत्तर (स्फोटाचार्य) - ॐ
    चतु: श्लोकी भागवत का आश्रय अथवा आधार यही है। नाकारात्मक - यह ब्रह्म नहीं यह ब्रह्म नहीं यह ब्रह्म नहीं... , इस प्रकार नहीं निषेध की पद्धति से कहीं भी ब्रह्म नहीं है अर्थात् ईश्वर है ही नहीं । अत: नाकारात्मक भावना के कारण रहते हुए भी नहीं मिलता। साकारात्मक - यह भी ब्रह्म है यह भी ब्रह्म है यह भी ब्रह्म है .... , इस प्रकार अन्वय की पद्धति से सर्वत्र ही ब्रह्म ही है। जबकि जो नहीं है वही ईश्वर है। अत: साकारात्मकता के कारण वह जो नहीं है वह भी प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार जीवन में भी किसी भी क्षेत्र में नाकारात्मक भावना से - यह नहीं हो सकता , इस प्रकार के भावनाओं से हम उसके तथ्य और सत्य से अनभिज्ञ ही रह जाते हैं। जबकि साकारात्मक भावना किसी भी अज्ञात को भी स्वीकार कर लेती है - हाँ यह हो सकता है हाँ यह है, इस पर तब हमारे अन्दर प्रश्न आता है यह कैसे हो सकता है , यह एक स्वयं में स्वयं से जिज्ञासा हो जाती है , चूँकि हमने होने का स्तित्व पहले ही स्वीकार कर लिया है इसलिए हमारे जिज्ञासाओं की पूर्ति भी हो जाती है। चाहे हम नाकारात्मक भाव रखें चाहे साकारात्मक, प्रकृति हमारे उन भावों की पूर्ति अवश्य करती है। साधारणतया प्रत्येक मनुष्य के मष्तिष्क में लगभग साठ हजार विचार अथवा भाव आते हैं जिनमें लगभग ७० फीसदी नाकारात्मक और ३० फीसदी साकारात्मक होती है, इसलिए प्राकृत रूप से अधिकतर लोग नाकारात्मक भावों में उलझ कर अपने जीवन को कष्टप्रद बना लेते हैं और कहते हैं यह संसार दुखालय है। जबकि जो लोग प्रकृति के इस भाव परक सिद्धान्तों को जानते हैं वे साकारात्मक भावों में जीते हैं। अपने अंदर आने वाले दोनों भावों में से नाकारात्मकता को हटाकर साकारात्मक भाव को स्थापित कर लेते हैं जिससे उनका जीवन सुखप्रद और संसार सुखालय हो जाता है। इस संसार में जितने भी महामानव, महान विभूति अथवा महान ऋषि-मुनि हुए, उन्हें यह रहस्य अवश्य ज्ञात था, जिससे वे सर्वदा ही आनन्द की अनुभूति करते रहे। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


    स्फोटाचार्य सन्देश - हमारे संस्कार के सिवा इस संसार में हमारा कुछ भी बपौती नहीं, क्योंकि संस्कार ही एक ऐसी वस्तु हमारे पास है कि जितना इसे हम संसार में छोड़कर जाते हैं उससे कई गुणा साथ लेकर भी जाते हैं।
    नानकचंद देव : संस्कार से क्या तात्पर्य है? कैसा स्वरूप है इसका? संस्कार को यहां कैसे छोड़ कर जाते हैं? और साथ कैसे ले जाते हैं ?? सविस्तार समझायें प्रभो !!

    स्फोटाचार्य : संस्कार का तात्पर्य अन्त: एवं बाह्य कर्म की प्रवृत्ति से है। कर्म प्रवृति का स्वयं की मनोवृत्ति पर एवं सामाजिक व्यवस्था पर जो हमारा प्रभाव है चाहे अच्छा या बुरा, यही हमारे संस्कार का स्वरूप है। हमारे कर्म का यही स्वरूप जो समाज व देशादि के मानस पटल पर छोड़कर हम दैहिक लीला समाप्त कर विदा हो जाते हैं और हम अपने कृत्य को अपने साथ अपने मन अथवा चित्त में संजो कर जाते हैं। यही संस्कार हमारा प्रारब्ध बनकर हमें वापस मिलता है। कर्मवृत्ति की पवित्रता से हमारे संस्कार उत्तम दिशा को प्राप्त होते हैं। एक तरफ हमारे मनसा, वाचा एवं कर्मणा की एक समरूपता से जहाँ हम अच्छे संस्कारों से सुसज्जित होते हैं वहीं दूसरी तरफ इसकी भिन्नता से बुरे संस्कारों के वशीभूत होकर हम अपने स्वयं के स्तित्व को ही नष्ट व धूल-धूसरित कर देते हैं। जैसे इन्द्र ने अपने कुकृत्यों अथवा कुसंस्कारों के कारण अनेकों बार उपेक्षित योनी को प्राप्त किया। संस्कार हमारे पात्रता की आकृति का अन्वेषण करती है, जैसा पात्र होगा द्रव्य उसमें वही आकृति लेती है। अत: हमारे संस्कार पर ही हमारे ज्ञान की शुद्धता एवं उपलब्धता निर्भर करती है।


    नानकचंद देव : संसार में भौतिक शरीर यात्रा के लिए तो आज निरन्तर विस्तारोन्मुखता ही अपेक्षित लगती है। प्रभो!
    स्फोटाचार्य : सनातन संस्कृति के अधिमानस धरोहर को सुरक्षित एवं संरक्षित करने की सर्वश्रेष्ठ भावनाओं से ओतप्रोत वैदिक ऋषियों ने बड़े ही सुसज्जित तरीके से "वेद" को तीन खण्डों में प्रतिपादित किया गया है, जो मानवीय मानस पटल के बाह्यान्तरिक सामर्थ्यता को सहज रूप से ही दृष्टिगोचर करता है। वैदिक ऋषियों ने समकालीन एवं अनन्त दूरदर्शिता के लक्ष्य को परिलक्षित करते हुए इतनी सूक्ष्मता और सहजता से मानसपटल पर इसे उड़ेला है जैसे मानो एक जादूगर ने अपनी जादूगरी से समस्त जीव को सम्मोहित कर रखा हो। इस त्रिवैधिक सम्मोहन क्रिया में वैदिक ऋषियों ने सम्पूर्ण मानवीय मष्तिष्क को उसके जीवन का आधार प्रदान करने हेतु "वेद" को तीन भागों में विभक्त कर दिया है। पहला - ज्ञानखण्ड, दूसरा - उपासनाखण्ड एवं तीसरा - कर्मखण्ड। वैदिक ऋषियों ने "ज्ञानखण्ड" की श्रेणी में ऐसे अधिमानस को आध्यात्मिक आधार दिया है जिसकी मष्तिष्कीय क्षमता उत्कृष्ट तथा समदर्शी हो, जो मानव ही नहीं अपितु चराचर जीवों हेतु कल्याणकारी हो, जो ब्रह्म के सदृश ही निर्भेद, निर्लेप तथा निर्विकार हो। दूसरी "उपासनाखण्ड" में वैदिक ऋषियों ने ऐसे मानस को आधार दिया है जिसकी मष्तिष्कीय क्षमता मध्यमवर्गीय हो। जो अपनी उपासना और भक्ति भाव से आधिदैविक प्रणेताओं को तथा स्वयं के इच्छित इष्टदेव को समर्पित हो जहाँ भक्ति की रसधारा में प्रवाहित होकर इष्टरूपी सागर में विलीन हो जाता हो, जिसके लिए इष्ट के सिवा कोई दूसरा संकल्प न हो। तीसरा "कर्मखण्ड" की श्रेणी में वैदिक ऋषियों ने ऐसे मानव को आधार दिया है जिसकी मष्तिष्कीय क्षमता निम्न हो। जो केवल अपने स्मरणशक्ति का प्रयोक्ता हो। ऐसे मानव को वैदिक ऋषियों ने विदित विधि एवं विधान की भव्यता से अलंकृत किया है। वैदिक ऋषियों की अनुभवशैली इतनी तीक्ष्ण रही है कि कर्मकाण्ड पर आधारित रहने वाले को अपनी निम्नता का बोध न हो सके और स्वयं को श्रेष्ठ समझता रहे और यह जानकर उद्विग्न तथा उद्वेलित न हों, इसलिए उन्होंने मायारूपी दृश्यात्मक जगत में कर्मखण्ड के विधि-विधान की भव्यता को विशेष उजागर तथा सम्पूर्ण विस्तार प्रदान किया है ताकि जो निम्न मष्तिष्क के मानव हैं वे विधि वैभव की अकूत भव्यता एवं प्रभुता की सागर में पांडित्यता का विहार कर स्वयं के अहं को तुष्टि प्रदान करता रहे। वेद के त्रिविध प्रणालियों को निर्माण करने वाले वैदिक ऋषि इतने सूक्ष्मदर्शी थे कि वे प्रकृति के विकासवादादि सिद्धांतों को भलीभाँति अनुभूत किये थे। अत: वैदिक ऋषियों का यह निश्चय सुदृढ़ है कि कालांतर में निम्न मष्तिष्कीय मानव भी जन्मजन्मोंपरान्त मानसता के पटल पर पहुँच कर अधिमानसता के दरवाजे पर सिंहनाद करने में अवश्य सफल होंगे। अत: वैदिक ऋषियों की नीति इतनी उदार एवं सापेक्षतातीत रही है जो अनादि काल से चराचर जगत के जीवों के लिए किसी भी दृष्टिकोण से कल्याणकारी ही सिद्ध होती है। ऐसे ब्रह्मतुल्य वैदिक ऋषियों को हम अपनी चतुर्विध समाधि को भी समर्पित कर दें तो उनके ऋषिऋण से हम उऋण नहीं हो सकते। शाश्वत रूप से हम उन्हें समर्पित हों यह अभीप्सा हमारी सृष्टि के दरवाजे पर सिंहनाद करती है। - या देवी सर्वभूतेषु ऋषिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ॥ - स्फोटाचार्य
    जी भगवन्, स्वाभाविक ही है। बाहरी विस्तार मायाबद्ध है तथा आन्तरिक सिमटाव आत्मबद्ध है। यदि हम दोनों में साथ - साथ अविरल धारा की ओर अधिगमन करते हैं तो बाहरी विस्तार की सीमाओं का अतिक्रमण कर पाना लगभग प्रत्यक्ष भी कल्पनातीत ही है और आन्तरिक सिमटाव से अप्रत्यक्ष कल्पनातीत भी प्रत्यक्ष घटित होने की परम संभावना है प्रभु।


    नानकचंद देव : भगवन् ! इस मायाबद्ध बहिर्मुखी जीव का जिसमें परम लाभ हो वह मार्गदर्शन दीजिए प्रभो!
    स्फोटाचार्य : जी प्रभु समान्य लाभ में - कर्म की शुद्धता हो । मध्यम लाभ में - हे अर्जुन तू युद्ध भी कर और मुझे भी याद रख। और परम लाभ में - समर्पण। यह कि ईश्वर ही सभी कार्यों का सम्पादन करता है हम निमित्त भी नहीं। क्योंकि यदि हम निमित्त भी बन जाएँ तो योगक्षेम पूर्ण नहीं हो पाता।


    स्फोटाचार्य सन्देश: निराकार का सामान्य अर्थ जो सभी को पता है। तात्विकता है - जो आकार इतना व्यापक हो कि उसकी व्यापकता सामान्य मानस ही नहीं बल्कि असम्प्रज्ञात तथा सहजादि के लिए भी एकत्व करना संभव नहीं । वह उसमें विलीन ही हो जाता है। उसका स्तित्व खो ही जाता है। वह स्तित्वविहीन ही हो जाता है। अथवा निराकर इतना सूक्ष्म से सूक्ष्मगत हो कि उसके स्तित्व होने का बोध ही खो देता है। जैसे हम गणित के "बिन्दु" की परिभाषा जानते हैं कि बिन्दु वह है जिसकी लम्बाई अथवा मुटाई नहीं हो अर्थात् वह हो ही नहीं, फिर भी वह है। अत: निराकार अथवा सूक्ष्म अथवा की स्पष्टीकरण, सम्पूर्ण सत्य केवल उसी के समक्ष प्रस्तुत होता है जो माया की आठवीं मंजिल के भी परे "धर्ममेघ" का भेदन कर लिया हो। निराकार कहा जिसने नहीं जाना। जाना जो वो ब्रह्म समाना।। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ
    नानकचंद देव : भगवन् यहां माया की आठ मंजिल कौन सी है ?
    स्फोटाचार्य : सहस्त्रार के पार और उससे भी पार


    नानकचंद देव : भगवन् यह प्रविधि अध्यात्म से अनुप्राणित है या विज्ञान के द्वारा प्रायोजित। 🙏🏻🌹💥🕉
    स्फोटाचार्य : दोनों को मिश्रित करके है भगवन्


    नानकचंद देव : भगवन् वह सर्वस्व क्या ? और भगवान को कैसे समर्पित करें ? जिससे भगवान की प्राप्ति होती है!
    स्फोटाचार्य : सर्वस्व केवल मन होता है क्योंकि हमारे सम्पूर्णता का मूल मन ही है। मने इति मानव: ॥ मन ही जीव है।


    नानकचंद देव : मन का स्वरुप क्या है भगवन् ! इसे भगवान को कैसे समर्पित कैसे करें?
    स्फोटाचार्य : मन का स्वरूप शब्द है, भाव है जब हम मन को निशब्द और भावशून्य हो जाते हैं तो यही समर्पण हो जाता है। भाव शून्य और निशब्द इस आशय से कि अपने इष्ट, आत्मा , परमात्मा अथवा बिन्दु के सापेक्ष हो। महान भक्त मीरा ने कहा - मध्य रात्रि प्रभु दर्शन दीन्हा प्रेम नदी के तीर। अर्थात् जहाँ केन्द्रीभूत होकर हमारा मन ज्ञान-अज्ञानता के मध्य हो अर्थात् शून्य ही हो। केवल और केवल जब हमारे मन में इष्ट ही शेष होते हैं तो यही मन का समर्पण है। होते हम केन्द्रीभूत और घनीभूत हैं पर यह मन से होने के कारण मन ही समर्पित हो जाता है।


    नानकचंद देव : भगवन् मन की इस भावशून्य स्थिति को कैसे प्राप्त किया जाये ! किस प्रविधि से यह मन निशब्द होता है?
    स्फोटाचार्य : निशब्द होने के अनेक विधि हैं। ज्ञान, ध्यान और समाधि इसके प्रमुख हैं। और सबसे ऊँची है समझ। हमें स्वयं में समझ को विकसित करना होता है उस हेतु जो हमारा गन्तव्य है, क्योंकि समझ से ही ये तीनों का समाधान प्राप्त होता है। अन्यथा भक्ति आदि।🌹💥ॐ


    नानकचंद देव : यह हो जाना कैसे हो भगवन् !
    स्फोटाचार्य : हम जो होना चाहते हैं उसी का साकारात्मक चिंतन एवं भाव में जीने से हम वह होने के लिए प्रकृति को आकर्षित करते हैं और हो जाता है, यही आकर्षण का सिद्धांत भी है और शब्द, विचार तथा मंत्रादि का विज्ञान भी।
    आत्मा एक ही है जिसे हम परमात्मा कहते हैं। केवल समझाने के लिए आत्मा कहा जाता है। जो ऊर्जा ब्रह्माण्डगत है वही ऊर्जा पिण्डगत (शरीरगत) भी है। ब्रह्माण्डगत होने के कारण जिस ऊर्जा को हम परमात्मा कहते हैं, पिण्डगत होने के कारण उसी ऊर्जा को आत्मा कहते हैं। यदि हम इसे एक वाक्य में कहें तो -"महाब्रह्माण्डीय चेतना परब्रह्म (परमात्मा) है, पिण्ड की परिधि में कार्य करता है वही सत्ता आत्मा कहलाती है।" "जीवात्मा प्रभु का अंश है, जस अंश नभ को देखिये। घट-मठ प्रपंचहिं जब मिटै, नहीं अंश कहना चाहिए।। यह भेद पूरी तरह से तब हमारे समझ आ सकता है जब हमारे अंदर का घटाकाश इस ब्रह्माण्ड के मठाकाश से एकत्व स्थापित कर ले। इसी को परमात्मा से तारतम्य स्थापित करना कहा जाता है। अत; आत्मा केवल और केवल एक ही है। - स्फोटाचार्य


    नानकचंद देव : भगवन् घटाकाश का मठाकाश से एकत्व स्थापन की वह प्रविधि कैसी है ?
    स्फोटाचार्य : विदेह । इस शरीर को इस ब्रह्माण्ड से मेल कर देखना।
    सनातन ज्ञान के वर्ण व्यवस्था का मूल आधार मानव के आन्तरिक ऊर्जा का अधिगामी क्षेत्र है। भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि मैंने चार वर्णों में सृष्टि का निर्माण किया है। यह चतुर्मुखी ऊर्जा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में भी व्याप्त है, जो उद्गम से ही है और सभी जीव के अन्तस्थ में ये चारो वर्ण विद्यमान है क्योंकि पिण्डे स ब्रह्माण्डे , ब्रह्माण्डे स पिण्डे। जो ब्रह्माण्ड है वही शरीर है। पहला वर्ण - मानव की वह चेतना जो ज्ञान, ब्रह्मज्ञानादि की ओर अग्रसर होती है वह ब्राह्मण है। क्योंकि उसकी चेतना ज्ञान की ओर है और ज्ञान ही ब्राह्म है इसलिए ज्ञान की चेतना की ओर अग्रसर मानव ब्राह्मण है। दूसरा - वह मानव जिसकी चेतना देश को रक्षित करना तथा रजोगुण प्रधान है । वह जो समाज और देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने को सर्वदा आतुर रहते हैं वे क्षत्रिय हैं। तीसरा - मानव की वह ऊर्जा जो व्यापार के क्षेत्र की ओर जाती है, जो उद्यमी है, वह वैश्य है। अत: जिस मानव की चेतना व्यवसाय की ओर अग्रसर है वह वैश्य है। चौथा - वह मानव जिसकी चेतना सेवा भाव की ओर हो, जो मानव के सेवार्थ को ही अपना धन संचय का साधन निर्धारित किया हो, इस चेतना को धारण करने वाला शूद्र कहलाता है। जो जन्मना तथा कर्मणा से पूर्णतया मुक्त है। - स्फोटाचार्य


    नानकचंद देव : भोगासक्ति अद्वैत की पराकाष्ठा तक पहुंचने में बाधक का कार्य करती है। अतः ज्ञान की पराकाष्ठा तक भी कोई विरला ही पहुंच पाता होगा !
    स्फोटाचार्य : यह भ्रान्ति है कि विवाह विद्यानाशक है। सत्य तो यह है कि विद्या और ज्ञान की पराकाष्ठा तब पूर्ण होती है जब विवाह की पराकाष्ठा एक-दूसरे से अद्वैतता को धारण कर लेती है। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ जी, क्योंकि बाधा ही तो परीक्षा है।


    नानकचंद देव : भगवन् इन बाधाओं के संतरण का उपाय क्या है !
    स्फोटाचार्य : सबसे पहली और सबसे बड़ी बाधा यही है कि हम उसे बाधा मान बैठते हैं। यदि हम इसे सहयोगी मानें तभी यह संभव है। किसी भी बड़ी से बड़ी बाधा को यदि हम साकारात्मक रूप दे दें तो वही बाधा हमारा समाधान बन जाता है और जब किसी छोटी-सी भी घटना को यदि हम बाधा मान ले़ं तो वह भी भयंकर रूप धारण कर लेती है। यही विचारों की शक्ति और यही आकर्षण का सिद्धांत भी है। एक बार हम जो पूरे मन से मान लेते हैं वही घटित होता है तो हम उसे बाधा के स्थान पर उसे समाधान क्यों न मान लें।


    नानकचंद देव : भगवन् ईश्वर के अपरिवर्तनीय होने का पता कैसे चला ?। जब संसार में हर चीज परिवर्तन शील है।
    स्फोटाचार्य : जब हम ईश्वर से तादात्म्य स्थापित करते हैं।


    नानकचंद देव : यदि हमें ऐसा महसूस हो कि हमारे किसी आदत चाहे वह अच्छा हो या बुरा के कारण कोई काम अवरूध्द हो सकता है तो यह एक भ्रम मात्र ही है और यही भ्रम हमें हमारे आदतों के प्रति हमें दास बना देता है।
    ससंदर्भ आशय समझाएं भगवन् !
    स्फोटाचार्य : हमारी कोई भी आदत । जैसे मान लें हम बिना भोजन के नहीं रह सकते। यह हमारा भ्रम ही है क्योंकि भोजन हमें जिन्दा रखने के लिए पर्याप्त नहीं। बुत अच्छा व्यंजन खिलाकर यदि हमारा नाक मुँह बन्द कर दिया जाय तो हम शीघ्र ही विदा हो जाऐंगे। इससे यह सिद्ध होता है कि भोजन जिंदा रहने के लिए हमारी आवश्यकता नहीं है। हमें केवल यह भ्रम होता है कि हम भोजन या हवा के बगैर मर सकते हैं। परन्तु यह वास्तविकता नहीं है यह हम भलीभाँति जानते हैं। यही भ्रम हमें भोजन का दास बना देता है।


    🌹💥स्फोट💥🌹 मुक्ति, भक्ति और शक्ति में क्या अंतर है? अध्यात्म में इसका क्या महत्व है? अध्यात्म में मुक्ति ही सर्वोपरि है। भक्ति मुक्ति तक पहुँचने का एक मार्ग है और शक्ति मुक्ति तक पहूँचने में बाधक। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ
    नानकचंद देव : शक्ति से आशय क्या है ? क्या स्वरुप है शक्ति का? शक्ति मुक्ति तक पहुचने में बाधक कैसे ? भगवन् 🙏🏻🌹🌹
    स्फोटाचार्य : यहाँ शक्ति का आशय भौतिक,दैविक तथा आत्मिक चमत्कारों से है जो अहंकार को जन्म देती है और मान-सम्मान के दलदल में धकेल देती है। यह सभी मन की प्रक्रिया है और मन सांसारिक है और सांसारिकता ही आशक्ति है। परन्तु इसी मन को यदि हम आत्मा से जोड़ दें तो यह मुक्ति है क्योंकि आत्मा ज्ञानस्वरूप है और मुक्ति ज्ञान से ही संभव है। इसलिए मन मुक्ति में बाधक है।


    नानकचंद देव : भगवन् आत्मा ज्ञानमय है अतः ज्ञान से ही मुक्ति लभ्य है । मन बन्धन का हेतु है , पर यह मन ज्ञान में भी तो सहायक है । क्या मन के बिना ज्ञान सम्भव है ! सादरं 🙏🏻🌹💥🕉
    स्फोटाचार्य : सत्यम, मन के सिवा संसार में कुछ भी असंभव नहीं। मन यदि बंधन का कारण है तो मन ही मुक्ति का भी कारण है क्योंकि मन से ही आत्मा , परमात्मा का सफर तय होता है परन्तु इस हेतु मन के द्वारा ही मन का अतिक्रमण करना होता है क्योंकि मन ही दृष्टि, दृश्य, द्रष्टा और तथाता में रूपान्तरित अथवा भासित होता है। मन एक माध्यम है ज्ञान अथवा आत्मा अथवा किसी भी तक पहुँचने का परन्तु कारण है और कारण का विलय जब महाकारण में हो जाता है तब वही मन द्रष्टा तथा तथाता कहलाता है परन्तु तब मन स्तित्वविहीन हो जाता है। जहाँ शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा रूपी महाकारण का बोध होता है और तभी महाकारण का विलय कैवल्य में हो पाता है और तब वह आत्मा-आत्मा नहीं परमात्मा अनुभूत होता है।


    नानकचंद देव : तथाता का भावार्थ क्या है भगवन् !
    स्फोटाचार्य : जो भाव द्रष्टा के भी ऊपर का हो, जहाँ कुछ नहीं हो और जहाँ कुछ नहीं होने से ही सबकुछ का बोध हो।


    नानकचंद देव : भगवन् इस अवस्था में और जडावस्था में भेद क्या रहेगा ? स्थूल बुद्धि से तो यह अवस्था जडवत ही जान पडती है ।
    स्फोटाचार्य : सत्यम्, इस अवस्था का महत्व ही निर्भेद होने से है। स्थूल बुद्धि जब योग को प्राप्त करता है तब वह स्थूल बुद्धि भी सूक्ष्मातिसूक्ष्म होकर बुद्धियोगमुपाश्रित्य हो जाता है तब इस अवस्था में हमारे चैतन्यता के सिवा कुछ भी शेष नहीं रहता । जब केवल और केवल चैतन्यता ही शेष हो तो जड़ का कोई स्तित्व ही नहीं रहता और जबतक जड़ता का स्तित्व शेष रहता है तबतक पूर्ण चैतन्यता नहीं होता। इसी को एकोहं द्विजोनास्ति कहा गया है। अर्थात् निर्भेद। चेतन के लिए जड़ चेतन नहीं रह सकता। इस संसार का एक कण भी जड़ नहीं क्योंकि वह चेतन के ही अधीन है। संसार का कण-कण द्रुतगति से भाग रहा है, परन्तु हमें जड़ भासित होता है वस्तुतः जड़ है नहीं। इस अवस्था में भासित होने वाले प्रत्येक जड़ पदार्थ भी हमसे चैतन्यता के सदृश ही व्यवहृत होते हैं।
    जड़त्व का बोध असम्प्रज्ञात तक होता है क्योंकि त्रिगुणातीत होने से ही हमारी प्रकृति निष्क्रिय हो जाती है। अत: हम इस जड़ समाधि से उपर उठकर सहजता में और सहजता से ऊपर उठकर सौम्यता में जड़ता के बोध से मुक्त होते हैं। क्योंकि तीनों गुणों के साम्यावस्था नहीं होने के कारण प्रकृति निष्क्रिय हो जाती है और सौम्यावस्था से सक्रिय। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने सौम्य समाधि का प्रसार किया। और इसलिए कि वह अध्यात्म अथवा दर्शन के उच्च समाधि धर्ममेघ को प्राप्त कर सके।
    संत ज्ञानेश्वर मिट्टी का दीवार बना रहे थे और कुछ बने दीवार पर ही बैठकर। उनसे कोई संत आकाशमार्ग से सिंह की सवारी पर संत ज्ञानेश्वर से मिलने आ रहे थे। यह सुनकर संत ज्ञानेश्वर को लगा कि इतने बड़े संत हमसे मिलने आ रहे हैं हमें जाना होगा। और संत ज्ञानेश्वर ने दीवार को ही कहा चलो और दीवार चल पड़ा आकाशमार्ग से । उसपर संत ज्ञानेश्वर की बेटी थी थी। वायु मार्ग में ही संत ज्ञानेश्वर ने उनको प्रणाम किया परन्तु उस संत ने संत ज्ञानेश्वर से कहा आप मुझे प्रणाम न करें क्योंकि आप श्रेष्ठ हैं मैंने तो जीव पर नियंत्रण पाया है पर आप तो निर्जीव पर नियंत्रण पाये हैं इसलिए आप श्रेष्ठ हैं। अत: संत ज्ञानेश्वर के लिए कुछ भी निर्जीव नहीं। सब कुछ चेतन है।


    नानकचंद देव : इस उदाहरण में ज्ञानेश्वर जी तो जडवत नही हुए उनका चिन्तन चेतनवत ही चल रहा है । यहां जड का स्थान परिवर्तन हो रहा है वह तो यान्त्रिक उपकरण हम नित्य दैनिक जीवन में काम ले ही रहे हैं ।
    स्फोटाचार्य : जी अवश्य । परन्तु यांत्रिक उपकरण की सृष्टि उपकरणों के निमित्त कृत्रिम है परन्तु दीवार का यन्त्रवत हो जाना प्राकृत है।


    नानकचंद देव : जन्मजात प्रवृति से ज्यादा स्वभाव निर्माण में वातावरण और संन्निधि सम्पर्क की भूमिका दृष्टिगोचर होती है । यदि वातावरण और सम्पर्कों को परिमार्जित कर दिया जाए तो एक बालक का स्वभाव स्वतः परिष्कृत हो जाएगा । सादर
    स्फोटाचार्य : सत्यम्। परन्तु उसका मूल स्वभाव खो नहीं सकता क्योंकि मूल स्वभाव ही व्यक्ति की मूल प्रकृति है और प्रकृति व्यक्त हो ही जाती है। कार्तिकेय साक्षात् भगवान के पुत्र और सानिध्य में परिमार्जित होने के पश्चात भी समय समय पर अपने मूल स्वभाव को प्रदर्शित किया। जिसके दुषपरिणाम ही समक्ष आये। भगवान श्रीहरि के कर्ण में रहते हुए भी मल की प्रकृति मल ही रही। आदि।


    🌹💥स्फोट💥🌹 अपार भक्ति और श्रद्धा से विष भी प्रसाद बन जाता है। इसका मीरा का विष पीने से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है। और श्रद्धारहित होने पर अमृत भी अवसाद बन जाता है। इसका राहु केतु से बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है।-स्फोटाचार्य🌹💥ॐ
    नानकचंद देव : पर ये सभी उदाहरण अप्रत्यक्ष हैं भगवन् !
    स्फोटाचार्य : जी प्रभु सत्यम्। यह तबतक ही अप्रत्यक्ष रह पाता है जबतक हम इसके भावों से एकाकार नहीं कर लेते। तत्पश्चात प्रत्यक्ष ही है।


    नानकचंद देव : आज इन भावों से एकाकार हो भौतिक जगत को भावजगत के अनुरुप देख ने और तदनुरुप परिवर्तित कर देने वाले उदाहरण दुर्लभतर ही हैं । कोई है भी इसमें भी संदेह ही है ! भगवन्
    स्फोटाचार्य : संदेह ही होने का पुष्टि करता है प्रभु। आदिकाल में भी बिरले ही थे, आज भी बिरले ही हैं और भविष्य में भी बिरले ही रहेंगे। यदि आदि काल में संदेह न होता कि कोई शक्ति है तो ईश्वर की पुष्टि नहीं होती भगवन्। अत: संदेह ही सम देह यानि ऐसा होने का पूरक है भगवन्। हे प्रभु आपको तो भलीभाँति ज्ञात है कि भारतीय दर्शन में प्रमाण उसे कहते हैं जो सत्य ज्ञान कराने में सहायता करे अर्थात् वह बात जिससे किसी दूसरी बात का यथार्थ ज्ञान हो। प्रमाण न्याय का मुख्य विषय है। 'प्रमा' नाम है यथार्थ ज्ञान का। यथार्थ ज्ञान का जो कारण हो अर्थात् जिसके द्वारा यथार्थ ज्ञान हो उसे प्रमाण कहते हैं। महर्षि गौतम ने चार प्रमाण माने हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द। अत: हे प्रभु अनुभव के पटल पर भी यही अंकित है।और इस अनुभव का अन्वेषण करने में संदेह ही सबसे बड़ा सहायक सिद्ध होता है।


    नानकचंद देव : मीरा को विष अमृत हो गया , ज्ञानदेव के लिए दीवार उडने लगी लेकिन यहां आंख अर्पण में भाव में क्या विकृति रह गई जो आंख नई नहीं आई । सादरं
    स्फोटाचार्य : अतिउत्तम। अध्यात्म एक सम्पूर्ण विज्ञान है। यह अतिविस्तार का विषय है परन्तु हम यथासंभव संक्षेप में स्पष्ट करने का प्रयत्न कर रहे हैं। किसी भी बाह्य क्रिया के द्वारा हम भावों की घनीभूतता अथवा संवेदनाओं की पराकाष्ठा का आकलन नहीं कर सकते हैं परन्तु यह तय है कि यदि हमारे भावों के संवेदनाओं की गति जितनी तीव्रता से हमारे अवचेतन मन में स्थान बना पाती है उतनी ही तीव्रता से वह घटना घटित होती है। जबतक हमारा विचार चेतन से अवचेतन मन में स्थान नहीं पाती तब तक वह घटित नहीं हो सकता है, यही प्रकृति का नियम है और इसलिए इसे विधि का विधान भी कहा जाता है। यह घटना इस बात की पुष्टि करती है कि उस बालिका ने अपनी आँख अर्पण करने की संवेदनाएँ घनीभूत कर ली और यह विचार अवचेतन मन में प्रवेश कर गई और घटित हो गई। हम यह भी नहीं कह सकते हैं कि उसने तुरंत सोचा और किया और हम यह भी नहीं कह सकते हैं कि लम्बे अन्तराल से उसके मन में ऐसी भावनाएँ चल रही थी। चाहे वह लम्बे समय से चले अथवा नहीं, घटना का कारण केवल उन विचारों के घनीभूत होने से है। घटना यह स्पष्ट नहीं करती कि इसके पीछे उस बालिका का उद्देश्य क्या है। निश्चय ही उसका उद्देश्य यह नहीं था कि हम आँख अर्पण करें और मुझे आँख पुनः आ जाए और यदि यह उद्देश्य था भी तो जितना विश्वास और जितनी आस्था उसे अपनी आँख निकाल लेने का था उतना ही प्रबल विश्वास या आस्था उसे वापस होने का नहीं था। या यूँ कहें कि आँख वापस आ ही जाएगा यह विचार पूर्ण घनीभूत होकर उसके अवचेतन मन में स्थान नहीं पा सका, जिसके कारण आँख वापस नहीं आ सका। दूसरा यह कि यदि उसका उद्देश्य कुछ और हो जो हो सकता है पूरा भी हो गया हो परन्तु वह इन घटना क्रम से दूर हो जो हमें पता नहीं है। और यदि उसका कोई भी उद्देश्य पूर्ण नहीं हुआ हो तो यह निश्चित हो जाता है कि उद्देश्य पूर्ण होने की भावनाएँ घनीभूत ही नहीं हुआ और अवचेतन मन तक पहुँच ही नहीं सका अथवा पूर्ण होने के प्रति भावनाएँ संदेहास्पद हो अथवा यूँ कहें कि उद्देश्य पूर्ण होने के प्रति आस्था और विश्वास की कमी रह गई हो। सामान्य तौर पर भी हम यही कहते हैं कि असफलता यही दर्शाती है कि सफलता का प्रयास हमने पूरे मन से नहीं किया गया। ऐसे मामलों में धर्म उन्माद ज्यादा ही पाया जाता है । विश्वास और आस्था अंधविश्वास और अंधास्था तब बन जाती है जब विश्वास और आस्था के विज्ञान को जाना ही नहीं गया हो और यह विज्ञान जानने के लिए पुस्तक अथवा शास्त्र पर्याप्त नहीं अपितु यह हृदयग्रन्थियों से ही प्राप्त की जा सकती है, आत्मा से ही प्राप्त की जा सकती है। इस संसार में जितने भी महापुरुष अथवा महान संत हुए अथवा महान वैज्ञानिक हुए उन सबों को यह " विचार की शक्ति, आकर्षण का सिद्धांत और चेतन, अवचेतन तथा अचेतन मन का विज्ञान " निश्चय ही पता था। इन्होंनें पुस्तकों, ग्रन्थादि के माध्यम से जनमानस तक पहुँचाया अवश्य परन्तु उसे पढ़कर समझ पाना बहुत ही कठिन और जटिल ही है। इसका कारण हमारी मष्तिष्कीय क्षमता है और अध्यात्म के अनुसार हृदयग्रन्थियों की शुद्धता और पवित्रता है दोनों एक ही बात है। इस रहस्य को ग्रन्थों ने रहस्य में ही प्रस्तुत किया है। परन्तु यही बात यदि हमारे अन्त: करण में उभरने लगे तो समझना बहुत ही आसान हो जाता है। इसे चाहे हम पुस्तक पढ़कर समझ लें अथवा हृदय से समझ लें, दोनों स्थिति में यह काम तभी करता है जब हम इस पर अमल करना जान जाएँ, इसे जीना जान जाएँ। अन्यथा ज्ञान तो सबको है झूठ नहीं बोलना चाहिए फिर भी बोलते हैं, कारण - ज्ञान अमल में नहीं है। इस विज्ञान अथवा रहस्य को जीने वालों के लिए संसार में कुछ भी असंभव नहीं। वह चाहे तो एक नयी सृष्टि का निर्माण भी कर सकता है।


    नानकचंद देव : वह सृष्टि निर्माण प्रत्यक्ष भौतिक होगा या अवचेतन में स्वप्न दृश्यों की तरह अभौतिक।
    स्फोटाचार्य : भौतिक , प्रत्यक्ष ।


    नानकचंद देव : ऐसे तदाकार वृति सत्पुरुषों ने इस सृष्टि के मानवों परपीडनोन्मुखी विपरीत मति के परिवर्तन का संकल्प न कर उपदेश परिपाटी को ही आगे क्यों बढाया। ज्ञानेश्वरजी तो समर्थ थे। उन्होंने ज्ञानेश्वरी का प्रणयन क्यों किया। क्यों न उन्होंने उस ज्ञान की प्राप्त सब को हो जाए ऐसी भावना नहीं की ? सादरं
    स्फोटाचार्य : यदि केवल संतों की ही भावना काम करे तो यह संभव अवश्य है। जिस व्यक्ति का संतों या भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा है उसका कल्याण कालांतर से होते आया है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अपनी भावना होती है और उसकी स्वयं की भावना ही स्वयं के लिए संतों की भावना को स्वयं में स्थान नहीं देती है। यदि कोई स्वयं की भावना से भाव शून्य हो जाए तो यह अवश्यम्भावी ही है। दूसरी बात यह कि यदि संत सम्पूर्ण सृष्टि हेतु ऐसी भावना करे तो सबसे पहले इस सृष्टि का विनाश होता तत्पश्चात् निर्माण, क्योंकि वर्तमान सृष्टि के कालचक्र का जो आधार है वह बिना खंडित हुए नहीं हो सकता। इसके साथ ही संतों ने सृष्टि के रहस्य को पूर्णतः जाना और उसके साथ चला। अध्यात्म की पराकाष्ठा यही है कि सृष्टि के नियमों को जानकर उसके अनुरूप ही चलना है। इसी कारण संतों ने ज्ञान के माध्यम से साकारात्मक भावों को जनमानस में प्रेषित किया।


    नानकचंद देव : भौतिक जगत के परिवर्तन के लिए कालचक्र की बाधा हो सकती है मानस परिवर्तन के संकल्प में तो यह बाधा नहीं होती । सत्युग त्रेता द्वापर और कलियुग सर्वत्र भौतिक संघर्ष और परिवर्तन ही परिलक्षित होता है । इसके स्थान पर तदाकार वृति से मानस परिवर्तन क्यों नहीं किया गया ? जिसके परिवर्तन होने पर सभी संघर्ष और उन्माद स्वतः ही समाप्त हो जाते। सादरं
    स्फोटाचार्य : सत्यम प्रत्येक व्यक्ति के भाव कर्म प्रधान हैं उसे टाला नहीं जा सकता । जिसका कर्म जो उसके भावों से बन चुका है उसे भोगना ही पड़ेगा । यही प्रकृति का नियम है। इस नियम को न्यूटन ने अपने गति नियम से प्रदर्शित किया । यहाँ न्यूटन का तीसरा गति नियम लागू होता है -" प्रत्येक क्रिया के विपरीत तथा प्रतिकूल प्रतिक्रिया होती है। जिसने यह नहीं जान कर अपने तपो बल या ज्ञान बल ऐसा करने का प्रयास किया जैसे राजा बलि आदि उसे स्वयं श्रीनारायण ने बाधित किया ताकि सृष्टि नष्ट होने से बचे।


    नानकचंद देव : भगवन् ! एक अबोध शिशु जब बोध की ओर अग्रसर होगा तो उसके भाव स्वकर्म प्रधान होंगे या परिवेश , परवरिश प्रधान होंगे?
    स्फोटाचार्य : परवरिश अथवा परिवेश आंशिक मात्र ही महत्व रखता है। मूल महत्व तो उसके प्रारब्ध का है। पूर्व जन्म में मृत्यु के समय उसकी चेतना जहाँ होगी वहीं से उसका यह जीवन आगे बढ़ेगा। सभी बच्चे एक ही विद्यालय में पढ़ते हैं और कौरव और पाण्डवों का परवरिश भी एक समान ही रहा, खासकर पाण्डवों को। फिर भी सभी भिन्न -भिन्न गुण धारक और भिन्न-भिन्न क्षमता वाले हुए। कारण क्या है। कदाचित् प्रारब्ध। अत: परवरिश और परिवेश आंशिक मात्र ही ।


    नानकचंद देव : इस उदाहरण में स्पष्टतः परवरिश और संन्निधि का अन्तर है । पाण्डवों की परवरिश कुन्ती और अन्य सात्विक जनों के मध्य हुई पर कौरवों की परवरिश प्रतिशोधा आक्रान्त गान्धारी ,शकुनि और महत्वाकांक्षी धृतराष्ट की संन्निधि में हुए। सादरं
    स्फोटाचार्य : मैंने खासकर पाण्डवों ......... लिखा है भगवन्। पाँचो भिन्न हैं।


    नानकचंद देव : पाण्डवों में योग्यता क्षमता का भेद हो सकता है पर नैतिकता के प्रति दृष्टिकोण तो एक धरातल पर ही था । भगवन्
    स्फोटाचार्य : जी सत्यम केवल नैतिकता । जिसका मूल्य सांसारिक जगत में ही मात्र है आध्यात्मिक जगत में नहीं। आध्यात्मिक जगत में नैतिकता के भेदन के बिना चरमावस्था को प्राप्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि यही नैतिकता असम्प्रज्ञात के जड़ समाधि से आगे नहीं जाने देती है और धर्ममेघ से वंचित रह जाता है जहाँ जाकर सत्य स्पष्ट रूप से सामने प्रकट हो जाता है। यह एक अंतिम रहस्य है जिसे केवल आप जैसे पुरोधाओं के साथ ही उजागर किया जा सकता है। धर्ममेघ समाधि ही योग दर्शन की पराकाष्ठा है। प्रकृति का नियम हैं अगली सीढ़ी पर चढ़ने के लिये पिछली सीढ़ी को छोड़ना होता हैं, जबकि अधिकांश मनुष्य अगली सीढ़ी पर चढ़ना तो चाहते हैं लेकिन पिछली सीढ़ी को छोड़ना ही नही चाहते हैं। यही कारण है कि वह आगे नहीं बढ़ पाते हैं। जो व्यक्ति पिछली सीढ़ी को नहीं छोड़ते हैं वह कभी आगे नहीं बढ पाते हैं, जो व्यक्ति पिछली सीढ़ीयों को छोड़ते जाते हैं वह मंज़िल पर पहुँच पाते है। यह तो सामान्य बात है परन्तु इसका उपयोग केवल इमारत पर चढ़ने मात्र हेतु ही नहीं। बल्कि यह नियम प्रत्येक क्षेत्र में लागू है जहाँ आगे बढ़ने की बात है , ऊपर चढ़ने की बात है।


    🌹💥स्फोट💥🌹 श्रीकृष्ण की लीला मुख्यतः सौम्यता अर्थात् प्रेम की अभूतपूर्व संदेश है संसार को। राधा-कृष्ण प्रेम की प्रतिमूर्ति है इसलिए हर जगह राधा-कृष्ण की ही छवि प्रतिस्थापित है । इस सृष्टि में राधा-कृष्ण के समान शुद्ध और पवित्र प्रेम न ही इससे पहले इस संसार में हुआ था और न ही होगा "नभूतो नभविष्यति"। राधा ही श्रीस्वरूपा है। रूक्मिणी तथा अन्य प्रारब्ध से संचित संस्स्कारों की अभिव्यक्ति मात्र है। इसलिए श्रीकृष्ण के साथ श्रीराधा को छोड़कर अन्य की प्रतिस्थापना नगण्य ही है।-स्फोटाचार्य🌹💥ॐ
    नानकचंद देव : भगवन् ! यह भौतिक जगत की लीला है या भक्तों के भाव जगत का शब्दचित्र ! सादरम्
    स्फोटाचार्य : दोनों है प्रभु। क्योंकि जो भक्तों के भाव जगत में शब्द चित्र में घटित होगा, वह भौतिक जगत में अवश्य घटित होगा। कैसे है वह श्लोक - राम कथा निज मानस राखा, समय पाय उमा संग भाखा। ठीक से याद नहीं मुझे यह।


    नानकचंद देव : रामचरित निज मानस राखा। पाय सुसमय उमा संग भाषा।। भगवन् ! भक्त की भावुक प्रवृति यथा यस्मै रोचते तथैव परिवर्तते।। की होती है अतः जो घटित नही हुआ वह उसे भी अपने भाव जगत में घटितवत परिकल्पित कर लेता है!
    स्फोटाचार्य : जी निस्संदेह। अत: हे भगवन् ! भक्त की यही परिकल्पना जब घनीभूत हो जाती है तो वह यथार्थ बन जाता है। यही प्रकृति का नियम भी है, जिसे आज के आधुनिक विज्ञान ने आकर्षण का सिद्धांत, पावर अॉफ थॉट और क्या-क्या नाम दिया है।


    नानकचंद देव : हां हरिदासजी के रासरसानन्द की तरह वह सीमित परिधि में हो सकता है । पर समष्टि में सबको साक्षात् हो जाए इसका उदाहरण दुर्लभ है । सादरम्
    स्फोटाचार्य : जी सत्यम्। ऐसा इसलिए क्योंकि भक्तों की भावना अधिकतर व्यष्टि की ही होती है यदि प्रह्लाद की तरह समष्टिगत हो तो यह समष्टि रूप में दृष्टिगोचर होती है।


    🌹💥स्फोट💥🌹 जगत अर्थात् सृष्टि, सृष्टि अर्थात् जो सृजित है । जो भी सृजित है वह नश्वर है। यह प्रकाशमय सृष्टि जिसमें आकाशगंगा, सौरमंडल और ग्रहों पर जीव है, यह अंधकारमय सृष्टि का कुछ अंशमात्र ही है । यदि आधुनिक विज्ञान के आधार पर अनुभव का आकलन किया जाय तो यह प्रकाशमय सृष्टि अंधकारमय सृष्टि में मात्र १७ फीसदी ही है शेष ८३ फीसदी अंधकार ही है। और यह अंधकारमय सृष्टि के बाहर जो आकाश के समान है वही अनन्त है जिसके बाहर कोई अवकाश नहीं । यह अंधकार के बाहर कितना फैला है इसके विस्तार की परिकल्पना नहीं की जा सकती है , साथ ही सर्वदा विस्तारित होते रहती है। यह प्रकाशमय और अंधकारमय सृष्टि अनन्त आकाश के सामान के स्तर पर नगण्य ही है। इस प्रकाशमय और अंधकारमय सृष्टि के नाश(लय) होने पर भी (इसलिए यह नश्वर है।)वह अनन्त आकाशस्वरूप सृष्टि जैसा था वैसा ही रहता है। इस पर इस सृष्टि के सृजन और नाश का कोई प्रभाव नहीं होता है, इसलिए इसे शाश्वत कहा जाता है , इसलिए यह ईश्वर है और इसलिए यह सनातन है। इसके अधीन लय हे पर भी यह अव्यक्त रूप में निहित है। इसी अव्यक्त का व्यक्त होना ही सृष्टि है। इस अनन्त आकाशरूपी को अनुभूत कर लेना ही आत्मज्ञान अथवा ब्रह्मज्ञान है। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - मानव के तरह शरीर का होना , ऐसा मुझे जानने वाला मूढ़ ही है। जो तत्व से मुझे जानता है वही यथार्थ है। - स्फोटाचार्य यथा - मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।  यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत: ।। श्री भगवान् बोले- हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्त्व से अर्थात् यथार्थ रूप से जानता है।
    नानकचंद देव : सम्भवतः मर्त्यलोक में उसे तत्त्वतः जानने वाला इस समय कोई मौजूद नहीं है।
    स्फोटाचार्य : तब तो असंतुलन व्याप्त होने से सृष्टि ही नहीं रह सकता भगवन्।


    नानकचंद देव : भगवन् हर क्षेत्र में असंतुलन ही तो हो रहा है आज ! यदि तत्त्वतः जानने वाले होते तो इन विनाशक आण्विक , रसायनिक , और जैविक हथियारों की प्रतिस्पर्धा को नहीं रोकते क्या ?
    स्फोटाचार्य : जो हमें असंतुलन प्रतीक हो रहा है वास्तव में वही संतुलन है। क्या हम इसे भूल जाएँ कि मेरी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, तो ये आणविक मिसाइल कैसे बन सकते हैं। रोकना अधर्म को है और जबतक अधर्म अपनी पराकाष्ठा को नहीं छू लेती तक तक उसे रोका नहीं जा सकता। यही न हमारी वाणी है भगवन् - यदा- यदा हि धर्मस्य.......। अत: वर्तमान समय में मैं अधर्म के द्वारा ही अधर्म का विनाश कराऊँगा। धर्म निष्पक्ष होगा। यही न आपकी वाणी है भगवन्।


    🌹💥स्फोट💥🌹 किसी भी मनुष्य को सफलता और शांति तभी प्राप्त हो सकती है जब वह केवल और केवल साकारात्मक विचारों से जुड़ा रहे। पर निंदा, दूसरे की बुराई तथा नाकारात्मक विचारों से जुड़े रहने वाला स्वयं नकारा बन कर रह जाता है और अपने स्वर्णिम जीवन को भी कष्टप्रद बना लेता है। ऐसा जानता तो सभी है पर जीता बिरले ही है। क्या आप बिरला बनेंगे ? - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ
    नानकचंद देव : भगवन् सकारात्मकता और नकारात्मकता पर थोड़ा विस्तार से प्रकाश डाल अनुग्रहित करें। सादरम्
    स्फोटाचार्य : ॐ चतु: श्लोकी भागवत का आश्रय अथवा आधार यही है। नाकारात्मक - यह ब्रह्म नहीं यह ब्रह्म नहीं यह ब्रह्म नहीं... , इस प्रकार नहीं निषेध की पद्धति से कहीं भी ब्रह्म नहीं है अर्थात् ईश्वर है ही नहीं । अत: नाकारात्मक भावना के कारण रहते हुए भी नहीं मिलता। साकारात्मक - यह भी ब्रह्म है यह भी ब्रह्म है यह भी ब्रह्म है .... , इस प्रकार अन्वय की पद्धति से सर्वत्र ही ब्रह्म ही है। जबकि जो नहीं है वही ईश्वर है। अत: साकारात्मकता के कारण वह जो नहीं है वह भी प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार जीवन में भी किसी भी क्षेत्र में नाकारात्मक भावना से - यह नहीं हो सकता , इस प्रकार के भावनाओं से हम उसके तथ्य और सत्य से अनभिज्ञ ही रह जाते हैं। जबकि साकारात्मक भावना किसी भी अज्ञात को भी स्वीकार कर लेती है - हाँ यह हो सकता है हाँ यह है, इस पर तब हमारे अन्दर प्रश्न आता है यह कैसे हो सकता है , यह एक स्वयं में स्वयं से जिज्ञासा हो जाती है , चूँकि हमने होने का स्तित्व पहले ही स्वीकार कर लिया है इसलिए हमारे जिज्ञासाओं की पूर्ति भी हो जाती है। चाहे हम नाकारात्मक भाव रखें चाहे साकारात्मक, प्रकृति हमारे उन भावों की पूर्ति अवश्य करती है। साधारणतया प्रत्येक मनुष्य के मष्तिष्क में लगभग साठ हजार विचार अथवा भाव आते हैं जिनमें लगभग ७० फीसदी नाकारात्मक और ३० फीसदी साकारात्मक होती है, इसलिए प्राकृत रूप से अधिकतर लोग नाकारात्मक भावों में उलझ कर अपने जीवन को कष्टप्रद बना लेते हैं और कहते हैं यह संसार दुखालय है। जबकि जो लोग प्रकृति के इस भाव परक सिद्धान्तों के जानते हैं वे साकारात्मक भावों में जीते हैं। अपने अंदर आने वाले दोनों भावों में से नाकारात्मकता को हटाकर साकारात्मक भाव को स्थापित कर लेते हैं जिससे उनका जीवन सुखप्रद और संसार सुखालय हो जाता है। इस संसार में जितने भी महामानव, महान विभूति अथवा महान ऋषि-मुनि हुए, उन्हें यह रहस्य अवश्य ज्ञात था, जिससे वे सर्वदा ही आनन्द की अनुभूति करते रहे।


    नानकचंद देव : जीव (मन) का क्या स्वरुप है ? शरीरस्थ आत्मा का क्या स्वरुप है ? वह शरीर में कहां स्थित है? उसे मन कैसे प्राप्त कर सकता है?
    स्फोटाचार्य : जीव का स्वरूप विचार है और आत्मा का स्वरूप निर्विचार। वह शरीर में और शरीर से बाहर भी सर्वत्र समान रूप से स्थित है परन्तु शरीर की परिधि में ही इसे जाना जा सकता है। उसे मन स्वयं के संकल्प से प्राप्त कर सकता है।


    नानकचंद देव : विचार तो एक कल्पना है । इसका तात्पर्य जीव यथार्थ नही कल्पना मात्र है । आत्म निर्विचार है तो उसे विचार से कैसे पा सकते हैं।
    स्फोटाचार्य : सत्यम् विचार यदि कल्पना है तो विचार यथार्थ भी है, यही शब्द ब्रह्म है। इस संसार में शब्द (विचार) के बिना कुछ भी करना संभव नहीं । हम जानते हैं कि अव्यक्त ही व्यक्त है। चूँकि शब्द का जन्म नि: शब्द से हुआ है, विचार का जन्म निर्विचार से हुआ है इसलिए वापस जाने का साधन भी वही होगा। बिना शब्द के बिना विचार के अथवा बिना कल्पना का सहयोग लिए यथार्थ तक नहीं जा सकते। जैसे गणित में पहले एक्स मान लेते हैं और फिर एक्स का वैल्यू निकाल लेते हैं तो उत्तर यानि यथार्थ सिद्ध हो जाता है। हमारा यह शरीर भी माया है कल्पना ही है विचार ही है, फिर भी हम इसी शरीर से लौकिक तथा पारलौकिक दोनों कार्य सिद्ध करते हैं।


    नानकचंद देव :
    स्फोटाचार्य :


    धन्यवाद मित्र! 🌹💐🌹
    हम दुखी नहीं बल्कि सुखी हैं मित्र! क्योंकि कोई भी शब्द हमारे मन को आच्छादित कर सकती है परन्तु हमारी आत्मा को नहीं। और यदि आत्मा गुरु मन चेला हो तो कदाचित् नहीं। "आत्मस्वरूप हैं सब जग जीवा, जीव स्वरूप हैं पिण्ड ब्रह्माण्डा।" - स्फोटाचार्य

    नहीं। आप जिस धर्म में हैं वह भी सनातन का ही एक अंग है, हाँ आप यह कह सकते हैं कि हम भारतवर्ष के जीवनशैली को जीना चाहते हैं तो आप स्वतंत्र हैं। क्योंकि सनातन ज्ञान और सनातन धर्म पृथ्वी पर किसी मर्यादित रेखाओं के अधीन नहीं, किसी देश और किसी काल के अधीन नहीं। हमारा सनातन धर्म देशकालातीत है। इसकी सीमा अखिल ब्रह्माण्ड के अनन्त असीमता से आबद्ध है। इसलिए सनातन धर्म अथवा सनातन ज्ञान सार्वभौम है। - स्फोटाचार्य


    सत्य कहा आपने परन्तु , राजनीति सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए जो है वह सौ फीसदी लोगों को खुश नहीं रख सकते। इस परिस्थिति में हमारी संज्ञा उतने प्रतिशत में दूषित हो जाती है । यदि अनादि काल से विष्णु भगवान से प्रारंभ करें और ऐसे एक भी शासक को ढ़ूँकर बताएँ कि कौन ऐसा है, यह असंभव ही है। जहाँ "राज" शब्द है वह केवल रजोगुण प्रधान है और जो रजोगुण प्रधान है वह अपने गुण और धर्म को नहीं छोड़ सकता। इसके साथ जो लोग इनके विरोधी होंगे उनके लिए राजनीति में "छल बल कल " एवं शाम दाम दण्ड भेद इत्यादि भावों और कर्मों का समावेश स्वत: ही हो जाता है। भगवान श्री राम ने भी धोबी को प्रसन्न किया तो सीता और समाज के लिए अच्छी नीति नहीं रही। स्वयं के मर्यादा के लिए सबसे बड़ी अग्नि परीक्षा को उत्तीर्ण कर आयी माता सीता के लिए इतिहास में एक प्रश्न छोड़ दिया है। इतना ही नहीं सुग्रीव के अग्रज बालि और तारा के प्रश्नों को भी श्रीराम ने इतिहास पर छोड़ दिया। "कौनहि कारण नाथ मोहे मारा। मैं बैरी सुग्रीव प्यारा"॥ आज भी हजारों मानस पटल पर ऐसे कई प्रश्न झिंझोड़े ले रहे हैं। - स्फोटाचार्य


    बिना गलती का क्षमा माँगना यदि महानता है तो अपराध भी है। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    यदि हम किसी की बुराई करते हैं तो वह राजनीति ही हो सकता है जो संसार का सबसे दूषित शब्द और क्षेत्र है।


    १. गुरु की आवश्यकता- यह है कि एक गलत संस्कार को भोगने में कई जन्म लग जाते हैं और न जाने ऐसे कितने संस्कार हमारे अन्दर निहित होता है। ऐसे सभी संस्कारों को जिसे भोगने में जन्मों लग सकता है, सद्गुरु उसका भोग महीनों में करा देते हैं। यही गुरु की आवश्यकता है। २. गुरुपूजन की आवश्यकता - वास्तविक गुरु पूजा है - गुरु द्वारा प्राप्त ज्ञान को जीवन में धारण करना। ऐसा नहीं होने से उस ज्ञान का कोई महत्व नहीं। फूल से पूजना और अगरबत्ती दिखाना बाह्य पूजा है । सच्चे गुरु बाह्य पूजा से प्रसन्न नहीं होते। ३. गुरु के कर्त्तव्य - गुरु का कर्त्तव्य है कि वे अपने अनुभव किए हुए मूल ज्ञान को शिष्य के अन्दर भर देने का प्रयत्न करे। "साधु ऐसा जानिए जैसा सूप सुहाय। सार-सार को गहि रखै, थोथा देत उड़ाय। गुरु का कर्त्तव्य और है कि वे शिष्य के बुरे संस्कारों का भोग कराकर अच्छे संस्कारों को भर दे और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर दे। ॐ🙏🏻🌹🙏🏻 ४. गुरु के प्रकार - गुरु नाम है ज्ञान का , शिष्य सीख ले सोई। ज्ञान मरजाद जाने बिना, गुरु अरु शिष्य न होई।। (गुरु का अर्थ मूलतः "ज्ञान" है) फिर भी कई माध्यमों से कई तरह से ज्ञान प्राप्त करते हैं, जिसमें मूलतः सात प्रकार हैं । साधारण तौर पर कह देते हैं भौतिक गुरु और आध्यात्मिक गुरु। पर दैविक गुरु नहीं कहते। पर इन सात प्रकार में सब स्पष्ट हो जाता है- प्रथम गुरु माता पिता, रज बीरज की सोई दाता।।१॥ दोसर गुरु मन की धाई, गिरह बास की बंध छोराई।।२॥ तेसर गुरु जिन धारिया नामा, लै लै नाम पुकारै गामा।।३॥ चौथे गुरु जिन शिक्षा दीन्हा, जग व्यवहार तबै सब कीन्हा॥४॥ पंचम गुरु जिन वैष्णव कीन्हा, राम नाम का सुमिरन दीन्हा॥५॥ छठे गुरु जिन भ्रमगढ़ तोड़ा, दुविधा मेटि एक से जोड़ा॥६॥ सातम गुरु सत शब्द लखाया, जहाँ का तत्व वहाँ समाया॥७॥ (यदि सातो गुरु का महत्व पूरी तरह समझ में न आवे तो कृपया सूचित करेंगे।) ५. मार्गच्युत गुरु के प्रति शिष्य का व्यवहार कैसा हो? - तत्क्षण ही ऐसे गुरु का विनयपूर्वक त्याग कर देना चाहिए। पर इस बात का भान गुरु को नहीं कहना चाहिए कि वे मार्गच्युत हैं। ६. मार्गच्युत शिष्य के प्रति गुरु का कर्तव्य व व्यवहार कैसा हो? - गुरु को हर संभव प्रयास करना चाहिए कि वे ऐसे शिष्यों को सही मार्ग पर ले आवे। जब अथक परिश्रम से भी ऐसा शिष्य सही मार्ग पर न आवे तो उसके अहंकार को बढ़ाकर उसे यह कहकर निकाले कि वत्स तुम निपुण हो चुके हो, अब अपना रास्ता स्वयं धारण करो। अहंकार बढ़ाने से उसे ध्वस्त होना अवश्यम्भावी है । तब उसे उस वक्त एहसास स्वयं हो जाता है जब ठोकर लगती है और उसे आहत होता है। ७. उद्दंड शिष्य के प्रति गुरु का व्यवहार कैसा हो? - यदि उदंड होते हुए भी उसमें ग्राह्य गुण है तो उससे ज्यादा प्रेमपूर्वक और छलपूर्वक ही व्यवहार करना चाहिए। ८. गुरु कैसा होना चाहिए? - तत्वदर्शी। अखण्ड मंडलाकारं व्याप्तम येन चराचरम। तत्पदं दर्शितम् येन तस्मै श्री गुरवे नम:॥ ९. शिष्यों में संस्कार कैसे डाले गुरु? - सर्वप्रथम शिष्यों के सभी पूर्व संस्कारों का भोग करवा दे तथा उसके मन की अभिव्यक्तियों को पूरा करवा दे, निषेध नहीं। क्योंकि जो निषेध किया गया है वह कभी भी प्रबल हो सकता है। ॐ


    ॐ💥"स्फोट"💥ॐ ॐ, आज गुरु पूर्णिमा के अतिपावन अवसर पर यह अभीप्सा करता हूँ कि यदि मेरा मन वचन और कर्म परम सद्गुरु और ईश्वर की आत्मैक्यता में पूर्णरूपेण ओतप्रोत रहता हो तो चराचर जगत के जीव के जीवन में अंतिम दीक्षा प्राप्त हो और अंतिम गुरु की उपलब्धि हो, जिससे वे अंतिम ज्ञान के स्पर्श से अपने जीवन को सार्थक बना सकें। अंतिम दीक्षा-आत्म दीक्षा, अंतिम गुरु - आत्मगुरु और अंतिम ज्ञान - आत्मज्ञान को उपलब्ध हो तथा दिव्यदृष्टि के परिसीमाओं को पार कर आत्मदृष्टि में अवस्थित होकर स्थितप्रज्ञ हो जाएँ , जिससे चराचर जीव व जगत की अद्वैतता व आत्मैक्यता का स्वयं में बोध हो और जीवन सम्पूर्ण सार्थक सिद्ध हो । जिससे गुरु पूर्णिमा का तत्वबोध हो। - स्फोटाचार्य । ॐ 🐚🐚🐚🙏🏻🌹🙏🏻🌹🙏🏻🌹🙏🏻🌹ॐ

    स्वतंत्र सन्देश

    🌹💥स्फोट💥🌹

    लाखों में कोई एक है जो ऐसे हमारे संदेशों को समझ पाता है और जो समझ पाता है वह प्रश्नचित्त होने के कारण केवल स्वीकृति देता है। दूसरी बात जिज्ञासु की है जो यह भी लाखों में एक है।सदियों से जिज्ञासुओं का पूर्ण अभाव ही चलता आ रहा है। यही कारण है कि हम आप जैसे ऊब जाते हैं फिर संभलते हैं स्वयं में स्वयं का सत्संग चलना ही हमारी तृप्ति बन जाती है, फिर संसार से विरक्ति भी होती है फिर पुनः संसारी के लिए करुणा भी उभर आती है और फिर हम लिख बैठते हैं, फिर हम व्यक्त हो जाते हैं और यही हमें होना भी है क्योंकि ब्रह्म भी अव्यक्त नहीं रह पाता, उसे भी स्वयं में स्वयं से व्यक्त होना ही पड़ता है, यही हमारी गति है , यही हमारी सद्गति भी है और यही प्रकृति भी है, यही अपरा है और यही परा है इसलिए हमारा धरा का धरा है, संसारी मूर्त बनकर खड़ा है , वह अपने अन्दर सजगता को जन्म होने नहीं देता। हमारी आपकी लेखनी से होता भी है तो उसे गृहस्थ का बहाना मानकर दबा देता है पर उसे पता नहीं कि वह अपनी सजगता को नहीं दबाता, अपनी चेतना को नहीं दबाता बल्कि हमारे अन्दर उद्वेलित हो रही करुणामयी चेतना को भी दबा देता है, पर हमारे जैसे पूर्ण सजग हैं, चेतन ही हैं इसलिए हम दबदब कर उभरते रहेंगे, यही हमारी नियति है। -स्फोटाचार्य ॐहरिॐ🌹💥ॐ


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    विचार यदि कल्पना है तो विचार यथार्थ भी है, यही शब्द ब्रह्म है। इस संसार में शब्द (विचार) के बिना कुछ भी करना संभव नहीं । हम जानते हैं कि अव्यक्त ही व्यक्त है। चूँकि शब्द का जन्म नि: शब्द से हुआ है, विचार का जन्म निर्विचार से हुआ है इसलिए वापस जाने का साधन भी वही होगा। बिना शब्द के बिना विचार के अथवा बिना कल्पना का सहयोग लिए यथार्थ तक नहीं जा सकते। जैसे गणित में पहले एक्स मान लेते हैं और फिर एक्स का वैल्यू निकाल लेते हैं तो उत्तर यानि यथार्थ सिद्ध हो जाता है। हमारा यह शरीर भी माया है कल्पना ही है विचार ही है, फिर भी हम इसी शरीर से लौकिक तथा पारलौकिक दोनों कार्य सिद्ध करते हैं।-स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    "जब शरीर ही अपना नहीं है तो पुत्र और धन क्या होगा।" शरीर जीव (मन) के लिए है ताकि जीव शरीरस्थ आत्मा की प्राप्ति करे। आत्मा स्वयं मोक्ष स्वरूप ही है, आत्मा ज्ञानस्वरूप ही है । अत: सनातन ज्ञान की पहली आवश्यकता है कि जीव अपनी आत्मा को प्राप्त करे, मोक्ष स्वतः सिद्ध हो जाता है। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    धर्म मतभेदों का मूलक है और अध्यात्म एकत्व का द्योतक। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    जैसे मानव तन बसे, जीवा हैं अनेक। वैसे मानव जीव है, प्रभु के तन में एक।। जिसके कारण पंचमहाभूत का निर्माण हुआ वह आत्मा अथवा परमात्मा है। जिसका निर्माण पंचभूतों के आधार पर हुआ वह जीव है। परन्तु जीव की अपनी सत्ता नहीं होती। आत्मा के स्तित्व के परिधि में होने के कारण ही जीव को प्राणशक्ति प्राप्त होती है। पंचभूतों का शरीर तथा आत्मा व परमात्मा की प्राणशक्ति के शरीर रूपी पिंड में मिलने से जो शरीरगत तीसरे तत्व जन्म होता है वही जीव कहलाता है। इसलिए पंचभूत का होने के कारण जीव की सामान्य दृष्टि बाह्य अर्थात् भौतिक होती है और अतिसूक्ष्म आत्मा के ऊर्जा के कारण जीव का स्वरूप भी सूक्ष्म ही होता है। महाब्रह्माण्डीय चेतना परब्रह्म है तथा पिण्ड की परिधि में जो कार्य करता है वही सत्ता आत्मा कहलाती है। अत: महाब्रह्माण्डीय चेतना परब्रह्म है तथा इसी के परिधि के अन्दर जो पिण्ड का निर्माण हुआ, इस पिण्ड की परिधि में वही महाब्रह्माण्डीय चेतना होने से वह आत्मा कहलाती है। पिण्ड की परिधि में यह चेतना निष्क्रिय होती है परन्तु इसी चेतना के कारण जीव सक्रिय होता है।- स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    नाकारात्मक - नाकारात्मक में और कमजोर साकारात्मकता में सरलता से प्रवेश पा जाती है परन्तु प्रबल साकारात्मकता में नाकारात्मकता को प्रवेश हेतु घनघोर युद्ध करना होता है और अंततः नाकारात्मकता या तो पलायन कर जाती है या मिट फिर जाती है। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    एक ही वाक्य को जब एक ही मनुष्य अलग -अलग मन: स्थिति में पढ़ता अथवा श्रवण करता है तो उसके अलग-अलग भाव प्रकट होते हैं। अत: जो व्यक्ति जिस मन: स्थिति में जिसे पढ़ता अथवा श्रवण करता है उसकी समझ वैसी ही होती है और तदनुरूप उनके विचारों की अभिव्यक्ति भी वैसी ही होती है। इसलिए कुछ भी पढ़ने व श्रवण करने के समय स्वयं को प्रसन्नचित्त एवं शांतचित्त रख कर ही करना चाहिए। अन्यथा परिणाम विनाशकारी ही होता है। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    तथाकथित साधु संतों की कमी नहीं है इस जगत में , इसलिए वस्त्रों अथवा वेशभूषा से अथवा अमुक सम्प्रदाय के मठाधीश हैं से पहचान करना यथार्थपूर्ण नहीं हो सकता है। संतों को पहचानने के लिए संत ही बनना पड़ता है। ज्ञान को जानने के लिए ज्ञान ही बनना पड़ता है तथा ईश्वर को पहचानने के लिए ईश्वर ही बनना पड़ता है। ऐसा करना तभी संभव है जब हमारा जुड़ाव हमारे शरीरगत आत्मा से हो और शरीरगत आत्मा की एकता ब्रह्माण्डगत आत्मा से हो अर्थात् परमात्मा से हो। इससे पूर्व उक्त के प्रति हमारा दृष्टिकोण ही हो सकता है जो केवल भ्रमपूर्ण ही रहता है। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    सामान्य स्तर पर शरीर दो होता है- स्थूल और सूक्ष्म । इसलिए सामान्य स्तर पर ही सूक्ष्म शरीर को कारण शरीर कह दिया जाता है। मूलत: शरीर पाँच होते हैं - स्थूल, सूक्ष्म, कारण, महाकारण और कैवल्य। इसी पाँच शरीर को योग विज्ञान के अनुसार हमारे शरीर की पाँच परतें कही जाती है। अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोष। इसी तरह वेदों में जीवात्मा के पाँच शरीर बताए गए हैं- जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद। इस पाँच शरीर या कोष के अलग-अलग ग्रंथों में अलग- अलग विश्लेषण मिलता है। आधुनिक विज्ञान के जगत में इसे Physical body, Astral body, crystal body, Casual body और Bless body कहा जाता है। इन पाँचो शरीर की अलग-अलग अवस्था होती है - सामान्य, जाग्रत, स्वप्न, सु‍षुप्ति और तुरीय। यह चेतना या आत्मा के रहने के पाँच स्तर हैं और साधक को पाँचो स्तर की अवस्थानुकूल अपनी अपनी अनुभूति प्राप्त होती है।- स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    सनातन संस्कृति के लचीला होने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यही है कि अनेकों मत हो गये, अनेकों वाद हो गये। इससे भी बड़ा दुष्परिणाम, इससे भी बड़ी खाई है पंडितों का वेद और संतों का भेद, जो न किसी काल में यह खाई पाटा गया है और न ही भविष्य में पाटा जा सकता है। यही सनातन संस्कृति का सबसे बड़ा दुर्भाग्य भी है और सौभाग्य भी। सौभाग्य यह कि सभी को अपने अपने अनुसार मत मिल जाते हैं और दुर्भाग्य यह कि यह कभी एकता की धागा में पिरो नहीं सका, एक माला बन नहीं सका , सनातन के गले की शोभा बन न सका। एकाकी पुष्प बनकर ही रह गया। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    मनुष्य आजीवन छात्र ही रहता है और जो जीवन पर्यन्त छात्र बन कर नहीं रह सकता वह जीवन हेतु पात्र नहीं बन पाता है। जिसने सीखने की आदत छोड़ दी समझो जीवन ने उसे वहीं छोड़ दिया । ज्ञान बड़े से मिले या छोटे के से मिले अथवा संसार के अंतिम कतार में खड़े मानव से मिले, वह हमेशा जीवन का अंग और पथ प्रदर्शक ही बनता है। परन्तु, जिसमें ज्ञानी होने का दम्भ और अहंकार होता है उसका नाश अवश्यमभावी हो जाता है। ब्रह्मज्ञानी उद्धव जी को भी अनपढ़ गोपियों से ज्ञान प्राप्त हुआ जिससे उनका जीवन चरितार्थ और कृतज्ञ हुआ। परन्तु, यदि ज्ञान लेकर उसे जीवन में धारण न किया गया तो वह वैसा ही अभागा होता है जैसे एक धनी का कंजूसी वश भूखे रहना तथा वास्तविक ज्ञान से वंचित ही रह जाता है। इस प्रकार ज्ञान अथवा शिक्षा का हमारे जीवन में तभी महत्व रहता है जब उसे जीने का प्रयत्न पूरे दिल से किया जाय, अन्यथा हमारे मष्तिष्क में उस ज्ञान का महत्व कूड़े के अलावा और कुछ नहीं । अत: जीवन भर मनुष्य को सीखने की जिज्ञासा और उसे जीने की अभिलाषा ही मनुष्य को जीवन की पात्रता से अभिभूत कराती है। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    प्रत्येक जीव अपने प्रथम जन्म में ब्राह्मण ही थे परन्तु अपने कर्मों के अनुसार वर्णों में विभक्त हुए। आज भी नवजात शिशु के मष्तक पर लिखा नहीं होता कि ये किस वर्ण का है। कर्मानुसार निगमित वर्ण व्यवस्था में जन्म लेने से जन्मना कहलाते हैं जबकि यह वर्ण व्यवस्था ही प्रारंभ से कर्मणा ही है। गीता के चार वर्णों की सृष्टि का यही सार है। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    किसी भी मनुष्य को सफलता और शांति तभी प्राप्त हो सकती है जब वह केवल और केवल साकारात्मक विचारों से जुड़ा रहे। पर निंदा, दूसरे की बुराई तथा नाकारात्मक विचारों से जुड़े रहने वाला स्वयं नकारा बन कर रह जाता है और अपने स्वर्णिम जीवन को भी कष्टप्रद बना लेता है। ऐसा जानता तो सभी है पर जीता बिरले ही है। क्या आप बिरला बनेंगे ? - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    ज्ञानीजन "सर्वंखल्लविदं ब्रह्म और वासुदेवम सर्वम् " में भेद नहीं जानते, क्योंकि जो सर्वम् है वास्तव में वही वासुदेव भी है। वासुदेव को मानव के समान शरीर वाला भक्त जन समझते हैं जो वासुदेव का यथार्थ रूप नहीं, " मनुष्याणां सहस्त्रेषु........।" अत: जबतक इन दोनों में भेद है वह ज्ञानी नहीं।- स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    पनीर प्राचीन ही नहीं अपितु प्राकृत है। दुग्ध में हंस का चोंच लगते ही वह फट जाता है और जल को छोड़कर हंस केवल पनीर का ही पान करता है। यदि इसी प्रकार मनुष्य इसका सेवन करे तो यह अमृत समान है, परन्तु वर्तमान के आधुनिक परिवेश में जिह्वानन्द हेतु मसाला मिश्रित कर विषतुल्य बना कर विषपान ही करता है।-स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    शिक्षा वही सार्थक होता है जो हमारे अन्दर की शक्तियों को जगाने में सहायक सिद्ध हो। ॐ


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    इस संसार में वही खुश रह सकता है और अपने जन्मजन्मान्तर को सुख और शांति से भर सकता है जिसने अपने बीते हुए भूत को भूलना सीखा हो, भविष्य की चिन्ता को छोड़ना सीखा हो और वर्तमान के जीवन से संतुष्ट रहना सीखा हो। कदाचित् यह कठिन है परन्तु असंभव भी नहीं। यदि संसार में कुछ भी सीखने योग्य है तो यही है क्योंकि यही योग्यता हमारे वर्तमान और भविष्य के सपने को सुनहरे रंगों से भर सकता है, वह भी बिना भविष्य का चिन्तन किये ही। दूसरा कोई विकल्प नहीं। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    जगत अर्थात् सृष्टि, सृष्टि अर्थात् जो सृजित है । जो भी सृजित है वह नश्वर है। यह प्रकाशमय सृष्टि जिसमें आकाशगंगा, सौरमंडल और ग्रहों पर जीव है, यह अंधकारमय सृष्टि का कुछ अंशमात्र ही है । यदि आधुनिक विज्ञान के आधार पर अनुभव का आकलन किया जाय तो यह प्रकाशमय सृष्टि अंधकारमय सृष्टि में मात्र १७ फीसदी ही है शेष ८३ फीसदी अंधकार ही है। और यह अंधकारमय सृष्टि के बाहर जो आकाश के समान है वही अनन्त है जिसके बाहर कोई अवकाश नहीं । यह अंधकार के बाहर कितना फैला है इसके विस्तार की परिकल्पना नहीं की जा सकती है , साथ ही सर्वदा विस्तारित होते रहती है। यह प्रकाशमय और अंधकारमय सृष्टि अनन्त आकाश के सामान के स्तर पर नगण्य ही है। इस प्रकाशमय और अंधकारमय सृष्टि के नाश(लय) होने पर भी (इसलिए यह नश्वर है।)वह अनन्त आकाशस्वरूप सृष्टि जैसा था वैसा ही रहता है। इस पर इस सृष्टि के सृजन और नाश का कोई प्रभाव नहीं होता है, इसलिए इसे शाश्वत कहा जाता है , इसलिए यह ईश्वर है और इसलिए यह सनातन है। इसके अधीन लय होने पर भी यह अव्यक्त रूप में निहित है। इसी अव्यक्त का व्यक्त होना ही सृष्टि है। इस अनन्त आकाशरूपी को अनुभूत कर लेना ही आत्मज्ञान अथवा ब्रह्मज्ञान है। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - मानव के तरह शरीर का होना , ऐसा मुझे जानने वाला मूढ़ ही है। जो तत्व से मुझे जानता है वही यथार्थ है। - स्फोटाचार्य यथा - मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत: ।। श्री भगवान् बोले- हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्त्व से अर्थात् यथार्थ रूप से जानता है।


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    यदि तुम मतों से मुक्त हो तो सत्य से युक्त हो। यदि सत्य से युक्त हो तो असत्य से मुक्त हो और यदि तुम सत्यासत्य से मुक्त हो तो परमपद से युक्त हो। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    हमारे भारतवर्ष की सनातन संस्कृति इतनी उत्कृष्ट है कि यहाँ नारी को देवी कहने का विधान है, इससे आशय स्पष्ट है कि हम स्वयं ही देव बन जाते हैं।-स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    यदि हम सभी अपनी अर्धांगिनी को राधे अथवा लक्ष्मी कहना प्रारंभ कर दें और स्वीकार कर लें तो हम स्वत: ही नर से नारायण बन जाते हैं। -स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ

    संसार में जब मनुष्य के अहंकार की पूर्ति होती है तब मनुष्य खुश और संतुष्ट हो जाता है जबकि यही उसके विनाश का कारण है।- स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    मैं आरक्षण का समर्थक हूँ परन्तु अभी तक देश में आरक्षण लागू नहीं हुआ है, जो है वह आरक्षण नहीं अपितु वर्णाक्षण है। -स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ

    अपार भक्ति और श्रद्धा से विष भी प्रसाद बन जाता है। इसका मीरा का विष पीने से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है। और श्रद्धारहित होने पर अमृत भी अवसाद बन जाता है। इसका राहु केतु से बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है।-स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    हे पार्थ ! यदि पुत्रादि से सद्गति होती तो संसार के सभी जीव सद्गति को प्राप्त हो चुके होते। निश्चय ही यह सांसारिक सद्गति ही है, निश्चय ही यह आधिभौतिक सद्गति ही है। इससे ऊपर आधिदैविक एवं आध्यात्मिक सद्गति का सफर शेष रह जाता है। हमारे सनातन ज्ञान की सर्वोच्च पराकाष्ठा आध्यात्मिक सद्गति की ओर इंगित एवं परिलक्षित करती है। अत: जीव का लक्ष्य आधिभौतिक तथा आधिदैविक सद्गति को साथ लेकर आध्यात्मिक सद्गति तक पहुँचने का है। आधिभौतिक सद्गति तो पुत्रादि से संभव हो जाता है, आधिदैविक सद्गति तो इष्टदेव की भक्ति कर संभव हो जाता है परन्तु आध्यात्मिक सद्गति बिना आत्मा को प्राप्त किये संभव नहीं हो सकता है। हमारे भारतीय सनातन ज्ञान के योग दर्शन की पराकाष्ठा एवं सबसे पहली आवश्यकता है कि मनुष्य सर्वप्रथम अपनी आत्मा को प्राप्त करे, तभी आध्यात्मिक सद्गति होना संभव है, "अधि आत्मने इति अध्यात्म:"। अत: शास्त्रादि का तात्विक सार यही है कि मनुष्य को आत्मा की अराधना करनी चाहिए। ॐ आत्मने नम: - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    श्रीकृष्ण की लीला मुख्यतः सौम्यता अर्थात् प्रेम की अभूतपूर्व संदेश है संसार को। राधा-कृष्ण प्रेम की प्रतिमूर्ति है इसलिए हर जगह राधा-कृष्ण की ही छवि प्रतिस्थापित है । इस सृष्टि में राधा-कृष्ण के समान शुद्ध और पवित्र प्रेम न ही इससे पहले इस संसार में हुआ था और न ही होगा "नभूतो नभविष्यति"। राधा ही श्रीस्वरूपा है। रूक्मिणी तथा अन्य प्रारब्ध से संचित संस्स्कारों की अभिव्यक्ति मात्र है। इसलिए श्रीकृष्ण के साथ श्रीराधा को छोड़कर अन्य की प्रतिस्थापना नगण्य ही है।-स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    इस जगत में अनेकों किवदंती है, जिनमें से एक सबसे विशाल किवदंती है "आत्मा भटक रही है"। ऐसा हम इसलिए कह देते हैं क्योंकि हमें आत्मा का बोध ही नहीं है। जिस आत्मा को वेदों, उपनिषदों, शास्त्रों एवं संतादि ने निर्लिप्त, निर्विकार, पवित्र एवं चैतन्यस्वरूप कहा है यह जानते हुए भी यह कहना कि आत्मा भटक रही है , ईश्वर आत्मा को शांति प्रदान करें आदि-आदि, यह हमारी अज्ञानता के सिवा कुछ और हो ही नहीं सकता है। दूसरी बात यह कि वेदों, उपनिषदों, शास्त्रों एवं संतादि ने जिस आत्मा का केवल एक स्तित्व होने की स्थिति को ही स्वीकारा है, चाहे उसे आत्मा कह लें अथवा परमात्मा। "जीवात्मा प्रभु का अंश है, जस अंश नभ को देखिये। घट-मठ प्रपंचहि जब मिटै, नहीं अंश कहना चाहिए।। जिस आत्मा में सम्पूर्ण स्तित्व ही व्याप्त है जिस आत्मा के बाहर कोई अवकाश शेष नहीं है, जो आत्मा सर्वथा विस्तृत होते रहती है, जिस विस्तार होने के कारण ही आत्मा ब्रह्म कहलाती है, वह आत्मा आखिर भटके तो कहाँ भटके । इससे भी बड़ी विडम्बना तब दृष्टिगोचर होती है जब श्राद्धकर्म के आमंत्रण-पत्र में सर्वप्रथम लिखा होता है - नैनं छिन्दति शस्त्राणि , नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो , न शोषयति मारुतः।। इसके बावजूद भी लिखा होता है उनकी आत्मा की शांति के लिए। जबकि आत्मा स्वाभावतः ही शांतस्वरूप है। स्पष्ट ही है कि जो तत्व संसार के पंचमहाभूतों से प्रभावहीन है वह कदाचित ही शांतस्वरूप ही होगा। क्योंकि इस पंचमहाभूतों का कारण भी आत्मा ही है। इस प्रकार हम सभी यह सब जानते हुए भी यदि ऐसा कहते हैं तो यह भी स्पष्ट है कि हम शिक्षा ग्रहण करके भी साक्षर की श्रेणी में ही हैं क्योंकि शिक्षित तो हम तब होते हैं जब ग्रहण किये गये शिक्षा का हम जीवन में उपयोग करते हैं अन्यथा हम साक्षर मात्र ही हैं। अत: इसे हम अज्ञानता की उपमा से ही सुशोभित कर सकते हैं। आशय स्पष्ट है कि भटकते हम हैं, जीव भटकता है, हमारा स्तित्व आत्मा के अधीन होने से ही हम जीव हैं, इसलिए हम पंचमहाभूतों से प्रभावित होते हैं, इसलिए हम आवागमन के कालचक्र में रौंधे जाते हैं और इसलिए हमें मुक्ति की आवश्यकता होती है। परन्तु आत्मा स्वयं मुक्तस्वरूप ही है। जिस दिन हम (जीव) वेदों, उपनिषदों, शास्त्रों व संतादि से आत्मलाभ प्राप्त कर लेते हैं उसी दिन उसी क्षण हम भी मुक्तस्वरुप ही हो जाते हैं। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    किसी भी अपराध का मुख्यतः दो कारण होता है - पहला - अभाव और दूसरा स्वभाव। अभाव में किये जा रहे अपराधों को व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से उनके अभावों का समाधान सर्वदा के लिए किया जा सकता है क्योंकि अभाव के कारण अपराध करने वालों के अन्दर ग्लानि भी अवश्य होती है अत: अभाव के अपराध को रोका जा सकता है, यह संभव है। अभाव में धैर्य सबसे महत्वपूर्ण एवं सबसे बड़ी शक्ति है। परन्तु स्वभाव में जो अपराध है उसे रोकना अथवा उस पर अंकुश लगाना बहुत ही जटिल है किन्तु असंभव नहीं। जटिलता यह है कि जिसके स्वभाव में ही अपराध है वह चतुर भी होता है । अपनी बाह्य क्रिया एवं वाक्पटुता से अपने उत्तम चरित्र को प्रदर्शित करता है इसलिए उसे परखना बहुत ही मुश्किल है और यदि परख भी लिया जाय और विरोध किया जाय तो उसके द्वारा एक नये अपराध का होना संभावित हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में ऐसा व्यक्ति अमुक को ही अपराधी सिद्ध करने को आतुर हो जाता है। ऐसे स्वाभाविक अपराध वाले व्यक्ति ही अधर्मी तथा म्लेच्छों की श्रेणी में आता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वभाव से अपराधी व्यक्ति अभाव में अपराधी से अधिक दया के पात्र होते हैं, तभी भगवान ने यदा-यदा आकर उनका उद्धार किया है। क्योंकि अभाव में धैर्य और धर्म को संजोना तथा जो स्वभाव है उसे बदलना धार्मिक एवं अध्यात्मिक पुरोधाओं के लिए भी अत्यन्त कठिन एवं जटिल ही होता है। और जो अपने स्वभाव को बदलकर उच्च स्तर का बना सकता है निस्संदेह ही वह महात्मा ही है, क्योंकि स्वभाव को बदलने में अनन्त पीड़ा का सामना करना पड़ता है और जो इस पीड़ा का सामना करले तो वह पीड़ा प्रार्थना बन जाती है और जब किसी की पीड़ा प्रार्थना बन जाती है तब उस पर परमात्मा की अनन्त कृपा हो जाती है। अत: ऐसा व्यक्ति दुराचारी से सदाचारी और दुरात्मा से महात्मा तक का सफर तय कर लेता है और संसार में यश, कीर्ति एवं मान सम्मान के साथ पूजनीय भी होता है। अत: अन्ततः यही अभीप्सा होती है - सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत्।। - स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ


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    वह धर्म - धर्म नहीं हो सकता जो किसी भी जीव के नीचता और उच्चता का बोध कराता हो। धर्म सर्वदा ही चराचर जीवों से प्रेम, सौहार्द्रता, सहिष्णुता, दया, क्षमा एवं परोपकार को महत्व देता है और इसे ही अंगीभूत करता है। इसके अतिरिक्त किसी भी प्रकार का संवाद-विवाद अथवा कर्म हमें अधर्म का अधिकारी बनाता है तथा ईश्वरीय प्रकोपों का भागी बनाता है। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    सद्गुरु केवल और केवल आत्मा ही है । यही शास्त्रकारों और संतों का मत है। साधक जिस आत्मा का वरन करता है वही। इसलिए शास्त्रकारों ने शास्त्रों से आत्मलाभ का निर्देश दिया है।और एक ही आत्मा प्रत्येक जीव में है। और सम्पूर्ण सृष्टि एक ही आत्मा में विद्यमान है।-स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    मुक्ति, भक्ति और शक्ति में क्या अंतर है? अध्यात्म में इसका क्या महत्व है? अध्यात्म में मुक्ति ही सर्वोपरि है। भक्ति मुक्ति तक पहुँचने का एक मार्ग है और शक्ति मुक्ति तक पहूँचने में बाधक। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    यदि हमें ऐसा महसूस हो कि हमारे किसी आदत चाहे वह अच्छा हो या बुरा के कारण कोई काम अवरूध्द हो सकता है तो यह एक भ्रम मात्र ही है और यही भ्रम हमें हमारे आदतों के प्रति हमें दास बना देता है। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    जब भी दिल से लिखा जाएगा तभी दिल तक पहुँचेगा। संगीतकारों ने भी क्या खूब कहा है - "जिस्म की बात नहीं है ये, दिल तक जाना है। लंबी दूरी तय करने में , वक्त तो लगता है।।-स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    प्रश्न पूछने का जन्मजात अधिकार है मनुष्य का । पर अभी मठाधीशों का शैष्टिक भय व्याप्त है।-स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    दूसरों को प्रभावित करना भी कामिनी कंचन काया ही है । तत्वबोध यह बोध कराता है कि ज्ञानियों को प्रभावित करने नहीं आता और अज्ञानी प्रभावित कर पूजनीय होता है। क्योंकि सत्य कड़वा होने से ही प्रभावहीन है और असत्य मीठा होने के कारण प्रभावशाली। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    विद्या , शिक्षा अथवा ज्ञान का महत्व और सार्थकता तभी सिद्ध हो सकती है जब विद्यार्थी- शिक्षा देने वाले शिक्षक तथा ज्ञान देने वाले गुरु के गुरुऋण से पूर्णतः मुक्त हो। गुरुऋण से मुक्ति केवल धन देने मात्र से भी संभव नहीं है बल्कि यथोचित धन के साथ साथ मनसा, वाचा एवं कर्मणा से गुरु अथवा शिक्षक का सदा आभारी हो। क्योंकि एक सच्चे गुरु अथवा शिक्षक केवल चन्द शब्दों के ही ज्ञान नहीं देते अपितु उन शब्दों के पीछे शिक्षक अथवा गुरु की ताउम्र तपश्चर्या एवं करुणा की संवेदनाएँ अविरल रूप से विद्यार्थियों अथवा शिष्यों पर न्यौछावर होती है । और हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि "सहानुभूति को केवल धन अथवा स्वर्णों से नहीं चुकाया जा सकता।" हमने दसवीं कक्षा में पढ़ा था - Sympathy is greater than far & gold. - इसलिए यथोचित धन सम्मान एवं सहानुभूति के साथ ही गुरुऋण से उऋण होना संभव है तत्पश्चात् ही उनके द्वारा प्राप्त शिक्षा का अपेक्षाकृत लाभ अथवा पद प्राप्त हो सकता है। दानवीर कर्ण और गुरुभक्त आरुणि जैसे दोनों तरह के अनेकों प्रमाण हैं संसार में।-स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    सनातन धर्म पृथ्वी से सम्बंधित धर्म नहीं है। यह परमात्मा से उत्पन्न नियमों का विज्ञान है, और इसके बिना इस ब्रह्माण्ड का कोई कण क्रिया शील नहीं होता, न ही उत्पन्न होता है। यह आचरण संहिता नहीं है, और पुराणों में इस सत्य को कथाओं के द्वारा समझाया गया है। अब अन्धास्थावादी उन कथाओं को पकड़ कर बैठ जाता है और किसी संस्कृति की आचरण संहिता को सनातन धर्म समझने लगता है तो यह उसकी मूर्खता है। इसमें प्राचीन ऋषियों का क्या दोष है।अब कोई पृथ्वी को गृह समझने लगे, योगासन को योग समझने लगे, कैलाश को हिमालय पर्वत की छोटी समझने लगे और पातल को पृथ्वी के अन्दर ढूँढने लगे तो इसमें बेचारे गुरुओं का क्या दोष है। सनातन धर्म ब्रह्माण्ड का धर्म है और इसकी समस्त व्याख्याएँ ब्रह्माण्ड से सम्बंधित हैं। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    ब्रह्माण्डीय ज्ञान को जानना ही सनातन धर्म है तथा इसके विपरीत जानने वाला ही म्लेच्छ है। अत: जो ब्रह्माण्डीय ज्ञान से अभिभूत हुआ वही सनातनी है और वही सत्यधर्मा भी । -स्फोटााचार्य🌹💥ॐ

    स्टीफन हॉकिन्स एक श्रेष्ठ ऋषि (वैज्ञानिक)थे । आज वे ब्रह्मलीन हुए। शायद फ्रांस के। इन्होंने सृष्टि के सृजन का सम्पूर्ण रहस्य पाया और संसार को उससे अभिभूत कराया। इन्हें हमारा कोटिशः नमन। जिस रहस्य को ऋषियों ने ज्योतिबिन्दु अथवा स्फोट कहकर सम्बोधित किया । उसे ही इन्होंने "बिग बैंग" से । पुन: उनको बारम्बार कोटिशः नमन।🌹🌹🌹🌹🌹💥ॐ -स्फोटााचार्य🌹💥ॐ


    🌹💥स्फोट💥🌹

    दुनियाँ की अपरिवर्तनशील चीज मौत नहीं क्योंकि मौत ही परिवर्तन अर्थात् जीवन का कारक है । अपरिवर्तनशील वह है जो सदा एक ही अवस्था में रहे। अत: इस दुनियाँ का सबसे बड़ा परिवर्तनशील मौत ही है जिसके होने से ही जीवन का रूपांतरण संभव है। यदि संसार में कुछ अपरिवर्तनीय है तो वह केवल और केवल ईश्वर ही है। इसलिए वह शाश्वत और सनातन है।-स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    निद्रा अथवा ध्यान में प्राप्त किया गया ब्रह्माण्डीय ऊर्जा ही प्राण है क्योंकि, नींद अचेत ध्यान है और ध्यान सचेत नींद और जो ऊर्जा इससे प्राप्त होती है उसी का बल प्राणी अथवा चराचर जगत का प्राण है।-स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    जो ध्यानयुक्त है वही प्राणयुक्त है और जो निष्ध्यान है वही निष्प्राण है क्योंकि, वास्तव में हम उतना ही समय जीते हैं जितना समय ध्यान में रहते हैं।-स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    उन्मादिक तांत्रिक का अंत बुरा होता है । वास्तव में तंत्र ही सृष्टि का विज्ञान है । परन्तु जिस बाममार्गी विधि से इसे प्राप्त करने का प्रयास करता है उसका अंत बहुत कष्टदायी देखा गया है । यदि तंत्र के वास्तविक विज्ञान को समझा जाय तो प्राणी का अंत ही नहीं होता। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    जिसका संबंध स्वयं अन्त: (आत्मा) से है उसे मोक्ष प्राप्ति के लिए किसी भी पर की दासता आवश्यक नहीं और बिना अन्त: (आत्मा) की दासता के मोक्ष भी संभव नहीं। क्योंकि अन्त: अथवा आत्मा ही ज्ञान स्वरूप है। बल्कि आत्मा सभी व्यक्त अव्यक्त स्वरूपों का स्वरूप है।-स्फोटाचार्य🌹💥ॐ - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    उर्ध्वगति केवल और केवल आत्मज्ञान अथवा ब्रह्म ज्ञान के आध्यात्मिक शीर्ष से संबंधित और संभव है न कि आधिभौतिक और आधिदैविक से। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


    🌹💥स्फोट💥🌹

    जो सूक्ष्म है वही विराट भी है , जो केन्द्र है वही परिधि भी है, जो निर्गुण है वही सगुण भी है, जो माया है वही मायाधीश भी है, जो ऋणात्मक है वही धनात्मक भी है, जो श्रेष्ठ है वही निकृष्ट भी है, जो अच्छा है वही बुरा भी है, जो प्रकाश है वही अंधकार भी है, जो उत्थान है वही पतन भी है। अर्थात् प्रत्येक गुणों का श्रेष्ठतम तथा निकृष्टतम पदार्थ एक ही तत्व है, जो धर्म है वही अधर्म भी है अर्थात् दोनों शिराओं की पराकाष्ठा एक ही तत्व है।परन्तु सनातन ज्ञान ने अपने अन्दर निहित संरक्षण, प्रेम, करुणा एवं दयादि को ही स्थान दिया है तथा अपने ही दूसरे स्वरूप को नाकारात्मक ता को स्थानविहीन किया है। कारण एक स्वरूप से जहाँ जीव मात्र का कल्याण है वहीं दूसरे स्वरूप से विनाश। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


    🌹💥स्फोट💥🌹

    हमारे ऋषियों द्वारा नियम तो दिये गये परन्तु नियमों के विज्ञान को देना शायद उचित नहीं समझे, क्योंकि यदि हम उसके विज्ञान को जानने का प्रयत्न करें तो अवश्य जान सकते हैं जो प्रायोगिक होना भी आवश्यक है।- स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    संसार में एक फीसदी लोग आध्यात्मिक हैं , नौ फीसदी लोग आधिदैविक हैं, इक्यासी फीसदी लोग आधिभौतिक हैं, शेष नौ प्रतिशत मिश्रित हैं और जो इन सब से ऊपर हैं वे अपवाद हैं अर्थात् बिरले हैं।- स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    संसार में सनातन धर्म के सिवा दूसरा कोई धर्म नहीं। अधर्म के मार्ग को अपननाने वालों का कालांतर में एक अलग-अलग धर्म नामाकरण होता चला आ रहा है जो धर्म की श्रेणी में प्रयुक्त नहीं हो सकता है, तथाकथित धर्म तथा भ्रान्ति ही सिद्ध हो सकता है।- स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


    🌹💥स्फोट💥🌹

    जहाँ तक शास्त्रोक्त संबंधी कुछ भी प्रस्तुत करने की बात मेरे लिए होती है तो कदाचित् मैं स्वयं को इस विषय पर तुच्छ ही पाता हूँ। ऐसे तो इस जन्म में किसी भी वेदों शास्त्रों से मेरा साक्षात्कार नहीं परन्तु, हृदयरूपी शास्त्रों का सहारा ही मुझे पोषित करती है। जीवन में जब भी हृदय के उद्गार को परखने का वक्त आता है तो उद्गार के समतुल्य शास्त्रों का प्रमाण पाकर स्वयं को अभिगृहीत पाता हूँ। जब-जब मैंने शास्त्रों का अध्ययन करने का प्रयत्न किया तब-तब मैंने स्वयं को अपने अन्तस में ही पाया। पढ़ने तो शास्त्र बैठता हूँ किन्तु पढ़ने लगता हूँ हृदय। इस पीड़ा ने मुझे अनेक महात्माओं का साक्षात्कार कराया। दर-दर भटकने के पश्चात् अंततः मुझे एक सरल संत से साक्षात्कार हो ही गई और उन्होंने मुझे यह अवगत कराया कि मेरी यह पीड़ा अलौकिक पीड़ा है जो बिरले को होती है। तब से मैं इस अलौकिक पीड़ा में सुख और आनन्द प्राप्त करने लगा हूँ। अत: मैं किसी भी विषय का शास्त्रीय प्रमाण प्रस्तुत करने में असमर्थ ही हूँ। इसलिए मैं होली विषयक हृदय के उद्गार को ही पटल पर उद्धृत कर सकता हूँ। यथा - हमारे देश में होली के विज्ञान को ऋषियों ने अनेकों उद्योगों से जोड़ा है जिससे मानवीय समता का विकास हो, प्रेम और सौहार्दता का बीज अंकुरित हो, जिससे द्वेष और मतभेद जैसे असामाजिक संवेदनाओं का समूल ह्रास हो। विक्रम संवत के अंतिम मास फाल्गुन का तथा नववर्ष के प्रारंभिक मास चैत्र में प्रवेश करने वाले प्रकृति के सर्वश्रेष्ठ ऋतु वसंत ऋतु का मनमोहक वातावरण प्राणियों के मानस को उमंगित, उल्लसित एवं आह्लादित करती है। ऋतुओं में वसंत कहे जाने वाले भगवान श्रीकृष्ण की माधुर्यता मानव जीवन के आत्म तत्व को अतिसंवेदनशील बनाती है। इसके साथ इस तिथि को घटित होने वाली घटना महान भक्त प्रहलाद के भक्तवत्सलता की पूर्ति करते हुए अधर्म पर धर्म की विजय का ज्वलन्त उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। इस ऋतु में मानव ही नहीं वरन् पशु पक्षी पेड़ पौधे तथा सृष्टि के कण-कण में नवजीवन का संचार होता है , प्रत्येक प्राणी के हृदय को वसंत की उच्चतर स्पंदन प्राप्त होता है। रंग-अबीर के बहुरंगी आभाएँ सूर्य के सात किरणों-सी ऊर्जा प्रदान करती है । अत: होली पर्व का विज्ञान सामाजिक जीवन को सामाजिक व्यवस्था देने में पूर्णतः समर्थ है। वसंत ऋतु के होली दिवस में प्रकृति के प्रभुत्व का अद्भुत समावेश में प्रकृति अपने पुरातन एवं सनातन होने का शाश्वत ज्ञान स्फुटित करती है तथा वसंत की अलौकिक तरंग से तरंगित मानव मन अपनी ऊर्जा की चरमोत्कर्ष अवस्था को आभासित करती है। -स्फोटाचार्य🙏🏻🌹💥ॐ


    🌹💥स्फोट💥🌹

    केवल (बॉर्डर) सीमापर ही भारत माता, वेद माता एवं सम्पूर्ण उच्चतम विभूति अपने सूक्ष्मतातीत सुवर्णों को लिए स्वर्णिम पवन की पुलकित पुरबा बयार लिये देश के अपने प्राणप्रिय वीर सपूतों को मदमादित करते रहती है। उनकी महती कृपा एवं महाकल्याणकारी आभा माता वसुन्धरा की सुगन्धित एवं ओजस्वी धूलकणों से अपने रक्षक वीर पुत्रों को अलौकिक तेज से अभिभूत करती रहती है जो केवल और केवल महिमामंडित वीर जवान को ही आह्लादित करती है। धन्य है माता की महिषी कृपा और धन्य हैं भारत माता के वीर सपूत । हम व्यष्टि व समष्टि भावों से वीर सपूतों को सलाम करते हैं और अपने शुद्ध एवं पवित्र हृदय की सुभाषित करने वाली शुभकामनाओं से अलंकृत करते हम स्वयं को समर्पित करते हैं। -स्फोटाचार्य🌹🌹🌹🌹💥ॐ


    🌹💥स्फोट💥🌹

    "जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि" विवाद की दृष्टि विवाद समझती है संवाद की दृष्टि संवाद। संवाद वह है जो तर्क, तथ्य और विज्ञान की कसौटी पर हो और विवाद वह है जो मानी हुई हो। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    हमारी जैसी दृष्टि होती है वैसी ही सृष्टि होती है। व्रत त्यौहार का कोई भी विज्ञान यही है कि कोई भी त्यौहार केवल और केवल अधर्म पर धर्म की विजय है न कि वर्णानुक्रम पर । यदि हम इसके तर्क और तत्थों की कसौटी पर कसने की सामर्थ्यता रखते हैं तो हम स्वयं ही निर्णय लेने में सक्षम होते हैं और यही हमारे जीवन की सबसे उच्च आचरणावस्था भी कहा जा सकता है, जो हमें निश्चय ही समत्व के मार्ग से होकर गन्तव्य तक पहुँचाती है जहाँ हमें ज्ञान के अंतिम सोपान अनुभव से साक्षात्कार प्राप्त होता है। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    गुरु ढूँढ़ता तो सभी है परन्तु कोई शिष्य नहीं। यदि गुरु ढूँढने के बजाय हम शिष्य भाव को अपने अन्तस में जन्म दें और उसे पोषित करें तो हमारा दावा है कि तब उसे गुरु ढूँढ़ना नहीं होगा बल्कि गुरु स्वयं उसे ढूँढ लेगा। जबतक गुरु नहीं मिला समझो हममें शिष्यता का भाव पूर्णरूपेण विकसित नहीं हुआ है। - स्फोटाचार्य

    अमृत की वर्षा करा सकती है जिज्ञासुओं की जिज्ञासा। बशर्ते जिज्ञासा की अनवरत स्वच्छ धार बहनी आवश्यक है , जिज्ञासा की अनवरत सुगंधित बयार बहने की आवश्यकता है। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    यह भ्रान्ति है कि विवाह विद्यानाशक है। सत्य तो यह है कि विद्या और ज्ञान की पराकाष्ठा तब पूर्ण होती है जब विवाह की पराकाष्ठा एक-दूसरे से अद्वैतता को धारण कर लेती है। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    नौ मास के गर्भ में , तब फिर बाहर आय। सहस्र मास के गर्भ से, बिरले मुक्ति पाय ।। - स्फोटाचार्य


    🌹💥स्फोट💥🌹

    आज ही नहीं सदियों से हमने केवल बोलना सीख लिया है - आज के समय में ईमानदारी, आज के समय में सत्यवादी , आज के समय में समाजवादी, आज के समय में तत्वदर्शी, आज के समय में संत, आज के समय में अच्छे लोग हों , ये कैसे संभव है। यह केवल एक भ्रान्तिपूर्ण विचार धारा है। वास्तव में सत्य की पराकाष्ठा तो यही है कि आज के समय में उपर्युक्त सभी जितने उन्नत और विकसित हैं पहले नहीं थे। क्योंकि पहले जो भी हो रहा था, आज भी वही हो रहा है,जहाँ तक पहले से ज्यादा हो रहा है। पहले यदि समाजवादी था तो भूखमरी क्यों थी? आज यदि समाजवादी नहीं है तो इतने उद्योगपतियों ने इतने लोगों को रोजगार क्यों दे दिया। पहले यदि सत्य था तो फिर अब असत्य कैसे हो गया? अब यदि असत्य है तो सत्य की खोज हम क्यों करते हैं। पहले यदि तत्वदर्शी थे तो अब तथादर्शी कैसे हो गये? और आज यदि तथादर्शी है तो वह तत्व क्यों खोज रहा है? पहले यदि संत थे तो अब असंत कैसे हो गये? और आज यदि असंत हैं तो संत क्यों खोज रहे हैं? ऐसे न जाने कितने ज्ञान हमारे मानस पटल पर हिचकोले ले रहे हैं। परन्तु वास्तविकता यही है कि जो जैसा और जितना पहले था , आज भी वैसा और उतना ही है। कल भी रहेगा। सामान्य भाषा में यदि हम कहें तो जैसी दृष्टि , वैसी सृष्टि। यही ज्ञान और सृष्टि की विशालता और विराटता है। अत: विराटता की कुञ्जी हमारे पास है ।हम उस कुञ्जी का उपयोग करें तो हमारे पास किसी भी प्रकार के गिला-शिकवा का कोई कारण शेष नहीं रह जाता है। -स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ


    🌹💥स्फोट💥🌹

    सनातन ज्ञान के वर्ण व्यवस्था का मूल आधार मानव के आन्तरिक ऊर्जा का अधिगामी क्षेत्र है। भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि मैंने चार वर्णों में सृष्टि का निर्माण किया है। यह चतुर्मुखी ऊर्जा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में भी व्याप्त है, जो उद्गम से ही है और सभी जीव के अन्तस्थ में ये चारो वर्ण विद्यमान है क्योंकि पिण्डे स ब्रह्माण्डे , ब्रह्माण्डे स पिण्डे। जो ब्रह्माण्ड है वही शरीर है। पहला वर्ण - मानव की वह चेतना जो ज्ञान, ब्रह्मज्ञानादि की ओर अग्रसर होती है वह ब्राह्मण है। क्योंकि उसकी चेतना ज्ञान की ओर है और ज्ञान ही ब्राह्म है इसलिए ज्ञान की चेतना की ओर अग्रसर मानव ब्राह्मण है। दूसरा - वह मानव जिसकी चेतना देश को रक्षित करना तथा रजोगुण प्रधान है । वह जो समाज और देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने को सर्वदा आतुर रहते हैं वे क्षत्रिय हैं। तीसरा - मानव की वह ऊर्जा जो व्यापार के क्षेत्र की ओर जाती है, जो उद्यमी है, वह वैश्य है। अत: जिस मानव की चेतना व्यवसाय की ओर अग्रसर है वह वैश्य है। चौथा - वह मानव जिसकी चेतना सेवा भाव की ओर हो, जो मानव के सेवार्थ को ही अपना धन संचय का साधन निर्धारित किया हो, इस चेतना को धारण करने वाला शूद्र कहलाता है। जो जन्मना तथा कर्मणा से सर्वथा पूर्णतया मुक्त है। - स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ


    🌹💥स्फोट💥🌹

    आत्मा एक ही है जिसे हम परमात्मा कहते हैं। केवल समझाने के लिए आत्मा कहा जाता है। जो ऊर्जा ब्रह्माण्डगत है वही ऊर्जा पिण्डगत (शरीरगत) भी है। ब्रह्माण्डगत होने के कारण जिस ऊर्जा को हम परमात्मा कहते हैं, पिण्डगत होने के कारण उसी ऊर्जा को आत्मा कहते हैं। यदि हम इसे एक वाक्य में कहें तो -*"महाब्रह्माण्डीय चेतना परब्रह्म (परमात्मा) है, पिण्ड की परिधि में कार्य करता है वही सत्ता आत्मा कहलाती है।"* "जीवात्मा प्रभु का अंश है, जस अंश नभ को देखिये। घट-मठ प्रपंचहिं जब मिटै, नहीं अंश कहना चाहिए।। यह भेद पूरी तरह से तब हमारे समझ आ सकता है जब हमारे अंदर का घटाकाश इस ब्रह्माण्ड के मठाकाश से एकत्व स्थापित कर ले। इसी को परमात्मा से तारतम्य स्थापित करना कहा जाता है। अत; आत्मा केवल और केवल एक ही है। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


    🌹💥स्फोट💥🌹

    *(हो जाओ)*
    रोग तुम्हें सताये इससे पहले तुम रोग को सताओ और निरोग हो जाओ, शोक तुम्हें सताये इससे पहले तुम होनी को हाथ लगा दो और तुम प्रसन्न हो जाओ, भय तुम्हें आए इससे पहले तुम भय को भयभीत कर निर्भय हो जाओ, शंका तुम्हें सताये इससे पहले तुम उस पर विश्वास के बादल बन मंडरा जाओ और निर्शंक हो जाओ, द्वन्द्व तुम्हें सताये इससे पहले तुम एकत्व की भावनाओं का जाल बिछा दो और अद्वैत हो जाओ, काम तुम्हें सताये इससे पहले तुम कार्यों का समापन कर दो और निष्काम हो जाओ, क्रोध की अग्नि तुम्हें सताये इससे पहले तुम अपने आत्मा की शीतलता की लहर चला दो और शांत स्वरूप हो जाओ, लोभ तुम्हें सताये इससे पहले अपनी संतुष्टि का प्रकाश फैला दो और तुम निर्लोभ हो जाओ, मोह तुम्हें सताये इससे पहले अपने अन्तर में प्रेम की गंगा बहा दो और निर्मोही हो जाओ, अहंकार तुम्हें सताये इससे पहले तुम अपनी संस्कारों का सुगंध फैला दो और निरंकार हो जाओ! हाँ मित्र, ये सभी संभव हैं पर तब जब तुम इन विचारों में फँसो नहीं और इस चमत्कारी ज्ञान को हमेशा अमल में रखो। आशीष का आशीष सर्वदा सबके साथ। - स्फोटाचार्य🌹💥 ॐ


    🌹💥स्फोट💥🌹

    यदि एक क्षण में अपना सर्वस्व भगवान को सम्पूर्ण रूप से समर्पित करते हैं तो हमें एक क्षण में ही भागवत की प्राप्ति हो सकती है। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    तत्व बोध वह हो ही नहीं सकता जो बाह्य उपकरणों से प्राप्त होता हो, क्योंकि पठन अथवा श्रवण ज्ञान - ज्ञान की पहली कक्षा है। जिसे शास्त्रोक्त भी ज्ञान की संज्ञा अथवा परिभाषा नहीं है। - स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ

    इस संसार में कुछ भी कृत्रिम नहीं। क्योंकि बिना कारण के कुछ हो नहीं सकता क्योंकि यही प्रकृति का नियम है और जब यही प्रकृति का नियम है तो यह प्राकृत ही है। कृत्रिम तबतक ही है जबतक प्राकृत का पूर्ण बोध नहीं। -स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ

    सनातन ज्ञान के मूल भित्ति को ही वेदों ने सत्यधर्म कहा है और यही मूल सार्वभौमिकता सिद्ध करती है। ॐ - स्फोटाचार्य


    🌹💥स्फोट💥🌹

    हमारे "विचार सम्प्रेषण" व "स्फोट करने" का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, न ही किसी के विश्वास को तोड़ना और न ही किसी के आस्था को भंग करने तथा न ही किसी के श्रद्धा को दूषित करना है। अपितु, एक तेज धार वाली संकेतों के द्वारा उन्हें उनके श्रद्धेय आराध्य के आन्तरिक स्थिति अर्थात् उनके मूल तत्व तक पहुँचाने की संवेदना प्रेषित करना मात्र है। इस संदर्भ में खोजी साधक ही इसका यथार्थ लाभ अवश्य ले पाऐंगे, इनमें कोई सन्देह नहीं। किसी भी ज्ञान का, समझ के परे होने पर "यह नहीं हो सकता है" ऐसा सोचना, उसकी रूढ़िवादी और संकुचित मानसिकता को प्रकट करना है। इसके स्थान पर "यह कैसे हो सकता है" का विचार सम्प्रेषण करना अथवा उसे स्वयं से ढूँढ कर ज्ञात कर लेना ही चेतना का उर्ध्वगामी होना सिद्ध हो सकता है। इस परिपेक्ष में प्रतिकार के रूप में आवेशात्मक, द्वन्द्वात्मक अथवा विवादास्पद संवाद प्रेषित करना उनके निर्बल मन: स्थिति को दर्शाता है। संवाद की गति "यह नहीं हो सकता है" ऐसा कह देने से अवरूध्द ही हो जाती है और यदि "यह नहीं हो सकता है" के स्थान पर "यह कैसे हो सकता है?" जैसा प्रतिक्रिया व्यक्त करने पर जिज्ञासा का भाव उत्पन्न हो जाता है और इसके साथ ही संवाद की गति अविरल सत्संग का रूप धारण कर चेतना का परिमार्जन करने में सफलता प्राप्त कर लेती है और परिणामस्वरूप तत्वज्ञान व आत्मज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश करा देती है जो आगे चलकर कुछ ही दिनों/महीनों में जन्मजन्मान्तर के कार्यों का समापन कर सम्पूर्णता व आत्मैक्यता का बोध सहज ही प्राप्त करा देती है। मेरे विचार सम्प्रेषण का मात्र यही उद्देश्य है। इस संदेश के संदर्भ में किसी भी प्रकार की अनैतिक टीका-टिप्पणी करना, अहंकार की संज्ञा देना अथवा अपने पहुँच की बुद्धि का प्रयोग करना, उसके निजी चेतनागत संस्करण का बाधित होना तथा "बुद्धियोगमुपाश्रित" से वंचित होना है। "वसुधैवकुटुम्बकम्"। साकारात्मक भावों की प्रीताशा में। - स्फोटाचार्य आशीष आनन्द ।🌹💥ॐ


    🌹💥स्फोट💥🌹

    (तत्व ज्ञान) तत्व ज्ञान का अर्थ है- आत्मज्ञान- त अर्थात परमात्मा , त्व अर्थात जीवात्मा ! जीवात्मा और परमात्मा के एक होने पर ही तत्व ज्ञान होता है! तत्व ज्ञान बोध कराता है कि सृष्टि का सार तत्व क्या है, निर्माण का रहस्य क्या है और हमारे अस्तित्व के उद्देश्य अर्थात आत्मा के सत्य से हमें परिचित कराता है . तत्वज्ञान को सहज करने के लिए पांच भागो में सत्य को विभक्त किया गया है – प्रथम –परमात्मा , द्वितीय – प्रकृति, तृतीय – जीव , चतुर्थ – समय और पंचम – कर्म । ईश्वर स्वतंत्र है , परम शुद्ध और समस्त गुणों से परे है . वह सृष्टि के रचियता , संरक्षक और विनाशक है ।ईश्वर पर समय और स्थान का बंधन नहीं होता है । इश्वर सर्वव्यापी और अविनाशी है।प्रकृति ईश्वर से ही जीव और प्रकृति की उत्पत्ति हुई है । प्रकृति को शक्ति भी कहते है। इस प्रकृति अर्थात शक्ति के दो रूप है – अविद्या और विद्या । अविद्या प्रकृति का निम्न स्वरुप है और विद्या प्रकृति का उच्चतम स्वरुप है। अविद्या को अपरा विद्या और विद्या को परा विद्या के नाम से भी जाना जाता है। प्रकृति के अविद्या स्वरुप को ही माया कहते है . माया का अर्थ है- या माँ सा- माया अर्थात जो सत्य नही किन्तु सत्य प्रतीत होता है वही माया है ! ईश्वर को सृष्टि की रचना के लिए अपनी माया रुपी शक्ति का ही आश्रय लेना पड़ता है। प्रकृति का स्वभाव जड़ है अर्थात प्रकृति स्वयं से कुछ निर्माण नहीं करती है। प्रकृति को गति, चेतना से अर्थात् परमात्मा के संकल्प से प्राप्त होती है । जब सृष्टि की उत्पत्ति नहीं हुई होती है तो ईश्वर की यह दिव्य शक्ति साम्यावस्था में रहती है अर्थात इसके तत्व सत्व रज और तम समान मात्रा में उपस्थित रहते है । ईश्वर जब सृष्टि की रचना का संकल्प लेते है तब इन तत्वों में विषमता उत्पन्न होती है .सत्व रज और तम के विभिन्न आनुपातिक संयोग सृष्टि को विभिन्नता प्रदान करते है। सृष्टि के आदिकाल का प्रथम तत्व तमस है। तम से ही क्रमिक रूप से आकाश तत्व, आकाश से वायु, वायु से अग्नि , अग्नि से जल और जल से पृथ्वी तत्वों की उत्पत्ति होती है जिससे समस्त सृष्टि का प्रादुर्भाव होता है। पञ्च भूत तथा इन्द्रियों के भोग के विषय अर्थात् रूप रस गंध, स्पर्श शब्द यह सब अविद्या माया के स्वरुप है ! इस संसार में जो भी इन्द्रियों द्वारा अनुभूत किया जा सकता है सब माया के अंतर्गत आता है। माया ईश्वर की अद्वितीय शक्ति है और यह संसार में ऐसे समाई हुयीं है जैसे गर्मी/उर्जा के साथ अग्नि ! अगर अग्नि में से समस्त ऊष्मा को निकाल लिया जाये तो उसका कोई अस्तित्व नहीं रहता है ! जिस तरह ताप के बिना अग्नि की कल्पना नहीं कर सकते उसी प्रकार ईश्वर की माया भी ऐसी ही शक्ति है, जिसके बिना संसार की कल्पना करना भी असंभव है ! अविद्या माया के कारण मनुष्य के अहंकार की पुष्टि होती है और अहम् के साथ इर्ष्या, लोभ , क्रोध इत्यादि का भी जीवन में प्रवेश हो जाता है। माया के कारण ही मनुष्य नाशवान संसार को सत्य मानकर भौतिकता में उलझा रहता है। अविद्या अज्ञान पैदा करती है जो इश्वर को भुला देती है ! जीव आत्मा ईश्वर का ही अंश है किन्तु माया का प्रभाव दिव्य गुणों को आच्छादित कर अज्ञान को पैदा करती है जो जीव को संसार की ओर उन्मुख कर ईश्वर से दूर कर देता है। परा विद्या को ब्रह्म विद्या भी कहते है क्योकि विद्या रूप में शक्ति जीव के अन्दर सद्गुणों को विकसित करती है और सत्संग की इच्छा ज्ञान भक्ति प्रेम वैराग्य जैसे गुण प्रदान कर ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग दिखाती है। इन गुणों का विकास होने पर जीव ईश्वर दर्शन का अधिकारी होता है ! विद्या रुपी शक्ति जीव में इश्वरत्व की अनुभूति करा कर उसको स्वतंत्र और सामर्थ्यवान बनाती है ।आदि शक्ति का अविद्या रूप भी आवश्यक है। जिस तरह किसी भी फल का छिलका रहने पर फल बढता है और फल जब तैयार हो जाता है तो छिलका फेंक देना पड़ता है ! इसी तरह माया रूपी छिलका रहने पर धीरे- धीरे मर्म ज्ञान होता है ! जब ज्ञान रुपी फल परिपक्व हो जाता है तब अविद्या रूपी छिलके का त्याग कर देना चाहिए। प्रकृति की कोई भी बाधा वास्तव में बाधा नहीं होती जो भी बाधा दिखाई पड़ती है वह शक्ति को जगाने की चुनौती होती है ! उदाहरण के लिए बीज को जमीन में दबाने पर मिटटी की परत, जो बीज के ऊपर दिखती है, बाधा की तरह दिखाई देती है किन्तु सत्य तो यह होता है की जमीन बीज को दबा कर उसे अंकुरित होने में सहायता करती है ! इसलिए शक्ति के दोनों रूप आवशयक है. बंधन और मुक्ति दोनों ही करने वाली ही आदि शक्ति है उनकी माया से संसारी जीव माया में बंधा होता है, पर उनकी दया हो जाये तो वह बंधन से छूटने में सहायता भी करती है । यही कारण है कि माया के प्रभाव से मुक्त होने के लिए देवी की आराधना की जाती है, आत्मा की आराधना की जाती है। ॐ - स्फोटाचार्य🙏🏻🌹🙏🏻🌹💐ॐ


    🌹💥स्फोट💥🌹

    *(संसार एक व्यापार)*
    आत्मीय मित्रवर!
    यह संसार ही एक व्यापार है, एक उद्योग है, चाहे वह व्यापार किसी वस्तु, धन अथवा ज्ञान का ही क्यों न हो। इस जगत में प्रत्येक घटना व्यापारिक ही घटित होती है। यहाँ तो शब्द भी सबसे न्यूनतम तथा उच्चतम मूल्य पर क्रय-विक्रय किया जाता है। जहाँ किसी शब्द की कीमत कौड़ी के भाव बिकती है तो वहीं किसी शब्द की कीमत अनमोल भी है। यह व्यापार ही तो है। चाहे मोल बिके अथवा अनमोल, बिकता सबकुछ है यहाँ। यहाँ तो प्रत्येक जीव को एक-एक साँस की कीमत चुकानी पड़ती है। यह संसार व्यापारिक रूप से इतनी उन्नत है कि हम केवल एक-दूसरे से ही नहीं अपितु स्वयं में स्वयं से व्यापार करते हैं। यदि हम महर्षि याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी संवाद पर अपनी गहरी दृष्टिगोचर करें तो हम यही पाते हैं । माता-पिता पुत्र से व्यापार करता है, पुत्र माता पिता से व्यापार करता है, पति पत्नी से व्यापार करता है, पत्नी पति से व्यापार करती है। इस जगत में कोई भी किसी से अकारण प्रेम नहीं करता क्योंकि बिना कारण के इस दुनियाँ में कुछ भी घटित नहीं होता। इतना ही नहीं, इस संसार में हम स्वयं शास्त्र से व्यापार करते हैं और शास्त्र हमसे व्यापार करता है। यहीं यह विडम्बना नहीं थम जाती है मित्रो, यह व्यापार तो अपनी पराकाष्ठा पर आत्मा परमात्मा से व्यापार करता है और परमात्मा आत्मा से। तात्विक दृष्टि से दोनों एक होने पर भी एक-दूसरे से केवल और केवल व्यापार ही करता है। यदि वेदों-शास्त्रों को गहन चिंतन-मनन और निदिध्यासन किया जाय तो अनुभव ज्ञान के रूप में हमें यही ज्ञात होता है कि इस संसार का कण-कण एक-दूसरे से उच्चतम व्यापार करता है। हवाएँ सम्पूर्ण प्रकृति से व्यापार करती है और प्रकृति हवाओं से। सूर्य की किरणें जल की तरंगों से व्यापार करता है और जल की तरंगें सूर्य की किरणों से। आकाश धरती से व्यापार करता है तो धरती आकाश से। यदि सनातन योग के उच्चतम शिखर पर जाकर देखा जाय तो हमें यही अनुभूत होता है कि ईश्वर से अव्वल तथा प्रवीण व्यापारी इस संसार में कोई भी नहीं। ईश्वर एक उच्चतम सामान्य व्यापारी ही नहीं अपितु सर्वश्रेष्ठ श्रेणी के द्विधा व्यापारी ही हैं। परन्तु ईश्वर का व्यापार द्विधाव्यापार होकर भी इतनी परम शुद्ध और पवित्र है जिसकी कल्पना विद्वानों और ज्ञानियों के लिए अवर्चनीय ही है। आत्मैक्यता की परम चेतनावस्था ही हमें ईश्वरीय महामहान उद्योग से तादात्म्य स्थापित कराने में पूर्णतः सफलता प्रदान करता है। अत: हम व्यापार जगत से उन्मुक्त तो नहीं हो सकते परन्तु हम हमारे व्यापार की शुद्धता और पवित्रता पर ध्यान अवश्य घनीभूत कर सकते हैं। *अत: हे मित्रो! आओ हमसब मिलकर एक शुद्ध, पवित्र और चैतन्यस्वरूप प्रेम का व्यापार करें।* हमारे इस व्यापारिक ब्रह्माण्ड में सम्पूर्ण मायारहित तथा मायाबद्ध व्यापारियों तथा उद्मियों का हार्दिक अभिवादन तथा हार्दिक अभिनन्दन है। आओ हम सब मिलकर अपने तृष्णाओं को बेचें और उसकी कीमत अनमोल सुख और शांति से प्राप्त करें।- स्फोटाचार्य🌹💥ॐ हरिॐ तत्सत् हरिॐ तत्सत्🌹💥ॐ


    🌹💥स्फोट💥🌹

    ( मनुष्य की वास्तविक शक्ति)
    मनुष्य की वास्तविक शक्ति ज्ञान है- पर वास्तविक ज्ञान क्या है? इसको जान लेना भी नितान्त आवश्यक है। ऐसा किये बिना मनुष्य किसी भी जानकारी को ज्ञान समझकर पथ-भ्रान्त हो सकता है। यदि वह भौतिक विभूतियों के उपार्जन के उपायों की जानकारी को ही ज्ञान समझ ले अथवा किन्हीं गलत क्रियाओं की विधि या अपने किसी अंध-विश्वास को ही ज्ञान समझ बैठे तब तो उसका कल्याण ही नष्ट हो जाये और वह अज्ञान के अन्धकार में ही भटकता रह जाये। शास्त्रकारों और मनीषियों ने जिस वास्तविक ज्ञान का संचय करने का निर्देश किया है, वह स्कूल और कालेजों में मिलने वाली शिक्षा नहीं है। और न इसे संचय करके ज्ञान प्राप्ति का सन्तोष कर लेना चाहिये। स्कूली शिक्षा तो लौकिक जीवन को साधन सम्पन्न बनाने और वास्तविक ज्ञान की ओर अग्रसर होने का एक माध्यम मात्र है, वास्तविक ज्ञान नहीं है। बहुत से लोग शास्त्र और धार्मिक ग्रन्थों में दिये नियमों की जानकारी ही को ज्ञान मान बैठते हैं और बहुत से लोग महात्माओं अथवा आर्ष-ग्रंथों के वाक्यों को रट लेना भर ही ज्ञान समझ बैठते हैं। किन्तु यह सब बातें भी वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति के लिये साधन मात्र हैं। वास्तविक ज्ञान नहीं है। शास्त्रों का स्वाध्याय और महात्माओं का सत्संग वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने में सहायक तो हो सकता है, किन्तु इसका उपार्जन तो मनुष्य को स्वयं ही आत्म-चिन्तन एवं मनन द्वारा ही करना पड़ता है। पुस्तक पढ़ लेने अथवा किसी महात्मा का कथन सुन लेने भर से वास्तविक ज्ञान की उपलब्धि नहीं हो सकती। वास्तविक ज्ञात तो आत्मानुभूति के द्वारा ही सम्भव हो सकता है। आज के वैज्ञानिक काल में ज्ञान के विषय में और भी अधिक भ्रम फैला हुआ है। लोग वैज्ञानिक शोधों, आविष्कारों और अन्वेषणों को ही वास्तविक ज्ञान मानकर मदमत्त हो रहे हैं। प्रकाश, ताप, विद्युत, जल, वायु, गति और चुम्बकत्व के ज्ञान और उसके उपयोग, प्रयोग को ही सच्चा ज्ञान समझकर अज्ञान के घने अंधकार में धंसते चले जा रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि आज सारा वैज्ञानिक ज्ञान विशुद्ध भौतिक विभूतियों को प्राप्त करने के लिये साधन भर हैं। और आज के इन वैज्ञानिक साधनों ने मनुष्य को इस सीमा तक सत्य भ्रान्त कर दिया है कि वह आत्मा परमात्मा को भूलकर बुरी तरह नास्तिक बनता जा रहा है। जिसकी परिसमाप्ति, यदि शीघ्र ही अज्ञान और विज्ञान विषयक अन्ध विश्वास का सुधार न किया गया, भयानक ध्वंस में ही होगी। जिस ज्ञान का परिणाम विनाश हो उसे वास्तविक ज्ञान किस प्रकार माना जा सकता है। वास्तविक ज्ञान का लक्षण तो वह स्थिर बुद्धि और उसका निर्देशन है, जिसे पाकर मनुष्य अन्धकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर, असत्य से सत्य की ओर, अशांति से शांति की ओर और स्वार्थ से परमार्थ की ओर उन्मुख होता है। सच्चे ज्ञान में न तो असन्तोष होता है और न लिप्साजन्य आवश्यकताएँ उसकी प्राप्ति तो आत्मज्ञता, आत्म-प्रतिष्ठा और आत्म-विश्वास का ही हेतु होती है। जिस ज्ञान से इन दिव्य विभूतियों एवं प्रेरणाओं की प्राप्ति नहीं होती, उसे वास्तविक ज्ञान मान लेना बड़ी भूल होगी, फिर चाहे वह ज्ञान करतलगत ब्राह्मण के समान ही क्यों न हो। इस प्रकार का वास्तविक ज्ञान किसी प्रकार का भौतिक ज्ञान नहीं शुद्ध आध्यात्मिक ज्ञान ही हो सकता है। और सांसारिक कर्म करते हुए भी उसे प्राप्त करने का उपाय करते ही रहना चाहिये। फिर इसके लिये चाहे स्वाध्याय करना पड़े, सत्संग अथवा चिन्तन मनन करना पड़े, आराधना, उपासना अथवा पूजा-पाठ करना पड़े। वास्तविक ज्ञान के बिना न तो जीवन में सच्ची शान्ति मिलती है और न उसको परकल्याण प्राप्त होता है। वास्तविक ज्ञान ही जीवन का सार और आत्मा का प्रकाश है। एकमात्र सच्चा ज्ञान ही लोक-परलोक में अक्षय तत्व और सच्चा साथी है, बाकी सब कुछ नश्वर तथा मिथ्या है। तथापि ज्ञानवान् पुरुष के लिये यह मिथ्या जगत् और नश्वर पदार्थ भी आत्म-दर्पण में आत्मस्वरूप के रूप में प्रतिविम्बित होते हुए यथार्थ रूप में प्रतीत होने लगते हैं। ज्ञान का अमृत न केवल मनुष्य को ही बल्कि उसके जीवन जगत् को भी अमरत्व प्रदान कर देता है। ज्ञान की महिमा अपार एवं अकथनीय है। ज्ञान की प्राप्ति ही मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य है। अस्तु, इस सत्य को अच्छी प्रकार हृदयंगम करके सच्चे ज्ञान को प्राप्त करने का हर सम्भव उपाय करते ही रहना चाहिये कि तन, धन, अथवा जन की शक्ति वास्तविक शक्ति नहीं है और उनकी प्राप्ति का उपाय ही ज्ञान है। यह सब भौतिक जीवन में साधनों का समावेश करने के माध्यम मात्र हैं। वास्तविक ज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान ही है और वही मनुष्य की सच्ची शक्ति भी है, जिसके सहारे वह आत्मा तक और आत्मा से परमात्मा तक पहुँचकर उस सुख, उस शाँति और उस सन्तोष का अक्षय भण्डार हस्तगत कर सकता है। 🌹💥ॐ


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    हमें उचित -अनुचित, पाप -पुण्य, कर्म -अकर्म, धर्म-अधर्मादि के ऊपर उठकर आत्मिक चेतना की ओर स्वयं को अग्रसर करना, अपने मूल अथवा वास्तविक लक्ष्य का आरोही क्रम में गतिमान करना ही हम मानव का मूल ध्येय है। सभी शास्त्रों के मंथन से औसतन हमें यही ज्ञात होता है कि हमें आत्म लाभ करना ही हमारा धर्म और कर्म है जो धर्म तथा कर्म की परिभाषाओं से भी मुक्त ही है। इसके अतिरिक्त कोई भी संवाद हमारी मन: स्थिति को आहत ही देती है जिससे हमारा आत्मबल और आत्मविश्वास में न्यूनता के आसार ही प्रतिबिंबित तथा प्रत्यारोपित होती है। - स्फोटाचार्य Edit


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    (तमस से माधुर्यता की ओर एक कदम)
    सत्य का स्तित्व केवल सत्य के लिए ही सीमित है, संसार के लिए नहीं क्योंकि संसारी उसे स्वीकार नहीं कर सकता। सत्य की परमावस्था कदाचित् संसार अथवा संसारी से मुक्त है, परन्तु संसारी की दृष्टि जिस तथ्य के सत्य को स्वीकार करता है वही संसारी के संसार का परमसत्य होता है। इस संसार में संसारी से कीर्ति की अभीप्सा है तो संसारी के अनुरूप ही खुद को व्यक्त करना होता है। यह आदतन सत्य है कि सत्य के वस्त्र नहीं होते परन्तु , यह भी उतना ही आदतन सत्य है कि यह ३० कैरेट स्वर्ण के समान है,। परन्तु यह स्वर्ण अपनी सम्पूर्ण और शुद्ध गुणवत्ता के कारण स्वयं को आभूषण नहीं बनने देता, इसलिए यह पूर्ण शुद्ध सोना राज घरानों की शोभा नहीं बढ़ा सकता और इसी कारण इस स्वर्ण को संसार की कीर्ति प्राप्त नहीं होती। यदि इस स्वर्ण को राज घरानों का आभूषण बनना है, यदि इस सोना को अपनी खूबसूरती और बेसकीमती होने का कीर्तिमान स्थापित करना है तो इसे अपनी गुणवत्ता को अधोगामी करना होना, क्योंकि ३० कैरेट, २६ कैरेट अथवा २४ कैरेट का आभूषण नहीं बन सकता, क्योंकि यह बहुत कठोर होता है, यही कठोरता इसका तमस है, क्योंकि यह सत्य है। यह भी सत्य है कि तम से ही सृष्टि का आविर्भाव है और यह भी सत्य है कि तम को सृष्टि ने कभी स्थान नहीं दिया। कारीगर के कारीगरी के अनुरूप वह ढ़ल नहीं पाता है। आभूषण बनने के लिए सोना में खाद मिलाना पड़ता है, सोना को अपने गुणवत्ता की सीमा से नीचे उतरना पड़ता है, तभी वह सोना आभूषण के रूप में अपने कीर्ति को स्थापित कर सकता है। इसी प्रकार हीरा भी जमीन के अन्दर हीरा ही है और जमीन के बाहर भी हीरा ही रहता है, परन्तु यह हीरा संसार के लिए किसी काम का नहीं, एक पत्थर के समान ही है, वह कठोर ही है, क्योंकि शुद्धता और सत्यता की पराकाष्ठा है। परन्तु यह हीरा जब संसार की कीर्ति स्थापित करना करना चाहता है तो इसे जौहरी की तालाश होती है । जौहरी जब इस हीरे को तराशता है तो इसकी प्रत्यावर्तित किरणें हमारी आँखों को चकाचौंध कर देती है और तब यह सोना से भी बेशकीमती होकर संसार में यश-कीर्ति को प्राप्त कर लेता है। निस्संदेह ही हीरे के वास्तविक रूप की सत्यता का ह्रास हुआ है। ठीक इसीप्रकार कोई ब्रह्मज्ञानी भी ब्रह्म अथवा सत्य की पराकाष्ठाओं से परे भी क्यों न हो संसार का वह आभूषण नहीं बन सकता है, वह सोने के समान कठोर और हीरे के समान बेडौल तथा प्रकाशरहित होता है। कदाचित् वह पूर्ण ही है परन्तु संसार अथवा संसारी के लिए उपयोगी नहीं इसलिए संसार की कीर्ति नहीं, संसार में उसकी कोई कीमत नहीं। यदि ब्रह्मज्ञानी, तत्वज्ञानी अथवा आत्मज्ञानी को संसार में चमकना है तो इसे सत्यता की कठोरता को त्यागना होगा। इसे अपने चरमोत्कर्ष स्थिति से अधोगामी होना होगा तथा अपनी गुणवत्ता में कमी लाना ही होगा और निर्वस्त्र सत्य को वस्त्रों से सुसज्जित कर आकर्षक बनाना ही होगा। जिस प्रकार शस्त्रों से तराशने पर हीरा संसार के लिए उपयोगी हो जाता है उसी प्रकार ब्रह्मज्ञानादि को भी राजनीतिवादरूपी शिलाओं पर रखकर ब्राह्मणवादरूपी अस्त्रों - शस्त्रों से तराशने पर ही वह संसार अथवा संसारी के लिए सार्थक सिद्ध हो सकता है। परन्तु , तत्वज्ञानियों को संसारिक कीर्ति से कोई आसक्ति नहीं होती, वह स्वयं को बिन्दु मात्र भी अधोगामी करने को तैयार नहीं होते, वे स्वयं की गुणवत्ता में गिरावट होने नहीं देता। वह सत्य को निर्वस्त्र ही प्रस्तुत कर देता है। परन्तु, संसार अथवा संसारी इस शुद्धता और पवित्रता को स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि उसकी बौद्धिक क्षमताओं के पार ही होता है, क्योंकि वह उसके आन्तरिक स्थिति को आन्दोलित कर देती है। क्योंकि वह उसके वर्तमान विवेक को जीर्ण-शीर्ण करने को आतुर हो जाती है। संसारिक व्यवस्थाओं के अनुरूप तत्तवज्ञानादि स्वयं को ढाल नहीं पाता, क्योंकि उसकी स्थिति अलख होती है, अगोचर होती है, अजन्मा होती है, निर्विकार और निर्लेप होता है, इलिए यथार्थ ही है कि निर्वस्त्र ही होता है। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि यदि वह स्वयं की गुणवत्ता को एक सीढ़ी अधोगामी भी कर ले तो उसकी शुद्धता और पवित्रता में लेस मात्र भी कमी नहीं आती है। यदि सृष्टि चाहिए तो तो शिव को भी सहस्त्रार से अधोगामी होकर भृकुटी में स्थापित होना पड़ता है, इससे शिव की शाश्वतता में तनिक मात्र भी भेद नहीं होता। भेद केवल व्यक्त और अव्यक्त का होता है। वही शिव जो सहस्त्रार में अव्यक्त हैं वही शिव परमात्मा रूप में भृकुटी में व्यक्त हैं, वही शिव शरीरगत आत्मारूप में अव्यक्त है और वही शिव शरीररूप में व्यक्त है। पिण्डे स ब्रह्माण्डे, ब्रह्माण्डे स पिण्डे। शिव से महादेव का सफर इसी बात से हमें अवगत कराता है। महादेव इसलिए भी त्रिदेवों में एक हैं क्योंकि वे ब्रह्मा एवं विष्णु की लय ताल से सम्बद्ध हैं । तीनों शक्तियों में एक अद्भुत सामंजस्य स्थापित है इसलिए वे तीनों त्रिदेव हैं। इसलिए वे सम्पूर्ण सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ हैं। इसलिए कि वे तीनों त्रिगुण भिन्न-भिन्न आभासित होते हुए भी एक हैं और एक साथ हैं। इस संसार में भी ये तीनोंगुण (सत रज तम अथवा इलेक्ट्रॉन प्रोट्रॉन न्यूट्रॉन) भिन्न-भिन्न रहते हुए भी एक साथ क्रियान्वित हो रहे हैं , इसलिए वह तीनों गुणधारक एकक्षत्र शासन करते हैं। इसी प्रकार, जहाँ इन तीनों गुण प्रधान व्यक्ति (संत, पंडित और राजा) एक साथ होंगे वहाँ विश्वसत्ता उसी के हस्तगत होगी। संत वे जिनकी दृष्टि चतुर्विध समाधि (असम्प्रज्ञात, सहज, सौम्य एवं धर्ममेघ समाधि) के पार हो, पंडित वे जो वेदशास्त्रों के प्रख्यात विख्याता हो और राजा वे जो जनमानस की सेवा भावना से ओतप्रोत हों और जिनके पास आर्थिक सम्पदाओं का अकूत भंडार हो तथा जिसकी नीति में उत्प्रेरण नाम की कोई वस्तु न हो। जहाँ तीनों एक दूसरे का अभिन्न अंग हो। जहाँ ये तीनों अलग-अलग रहने पर भी एक साथ हो, वहीं विश्वसत्ता होती है। यदि ये तीनों केवल अपनी - अपनी गाड़ी हाँकने लगें तो सत्ताधारी अथवा सत्तारूढ़ होना तीनों में से किसी के सामर्थ्य में सिद्ध नहीं हो सकता है। अंततः वर्तमान युग के परिपेक्ष में यदि सामान्य भावों से व्यक्त करें तो वर्तमान समाज का दर्पण कहलाने वाले चलचित्र (फिल्म) में फिल्मकार समानुसार उसी संदर्भों को डालता है जो सामान्य जनमानस चाहती है । नहीं तो फिल्म चलेगी नहीं। पाश्चात्य के फिल्मकार समाज के सत्य को निर्वस्त्र दृश्य ही प्रस्तुत कर देते हैं, जैसा होता है वैसा ही दिखा देता है, इसलिए इसे भारतवर्ष में अश्लील चलचित्र की संज्ञा दी जाती है। परन्तु, हमारे भारतवर्ष की परम्परा में उस निर्वस्त्र दृश्य को प्रस्तुत करने के बजाय उस घटनाक्रम को बिना दिखाए ही वस्तुस्थिति का आभास करा देना है। कदाचित् भारतवर्ष की यही परम्परा हमारी संस्कृति को बल प्रदान करती है। भारतवर्ष की सनातन संस्कृति हमें अथक तथा अवर्चनीय ज्ञान-विज्ञान के साथ-साथ हमें लज्जा, शीलता, विनम्रता, मित्रता, सदाचार, शिष्टाचार एवं मानवता का बोध कराती है तथा सामाजिक व्यवस्था में सबसे ऊपर लाकर खड़ा कर देती है। इसलिए हमारा भारत महान है, इसलिए हमारा भारत ऋषियों की भूमि रही है और इसलिए भारत देवभूमि रही है और इसलिए भारत मानवता का एक ज्वलन्त उदाहरण है और इसलिए भारत ज्ञान-विज्ञान का आधार रहा है और इसलिए भारत निगमागम सार्वभौमिकता की एक विशालकाय धर्म की धरोहर है और इसलिए भारत वसुन्धरा के वर्ण को सुशोभित कर रही है और इसलिए भारत ने सबसे अधिक तीर्थंकर, ज्ञानियों को जन्म दिया और इसलिए भारत विश्व में अपनी छाप छोड़ देता है और इसलिए भारत पूरे विश्व पर भारी पड़ता है और इसलिए भारत विश्व के मानचित्र पर सबों की दृष्टि में है और इसलिए भारत विश्व का केन्द्र है, क्योंकि भारत विश्व की सम्पूर्ण अभीप्सा पूर्ण करने में समर्थ है और इसलिए भारत सबों को धन, प्रतिभा, कारीगर, वातावरण एवं सम्पूर्ण ज्ञानादि देने में समर्थ है और इसलिए भारत के शास्त्रादि पर सम्पूर्ण विश्व ने अन्वेषण किया और पाया। और इसलिए कि भारत ने प्रत्येक विकट परिस्थिति में विश्व को मार्गदर्शन दिया है और इसलिए भारत सम्पूर्ण विश्व का गुरु है। - स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ


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    जब तक "मनसा, वाचा , कर्मणा " तीनों एक न हो, सम न हो, शुद्ध न हो, पवित्र न हो तबतक सद्गति अथवा सन्मार्ग संभव नहीं।- स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    जहाँ कर्मगत अथवा नियतिगत "माँग " हमारे अहंवृत्ति को समूल नष्ट करने में समर्थ है। वहीं इसके विपरीत होने पर हम ऋण की अथाह महासागर में डूबते चले जाते हैं क्योंकि हमारे जीवन के ऐसे एक संस्कार को भोगने में भी अनेकों जन्म बीत जाते हैं। और न जाने कितने ऐसे संस्कार मानव जीवन में अठखेलियाँ करती रहती हैं। कर्म की गति बड़ा ही गहन होती है। बड़े-बड़े महात्मा भी कर्म की द्रुत गतिधारा में तिनके के समान असहाय प्रवाहित होते देखे गये हैं। "करमगति टार से नहीं टरे हो उधो जी ......" - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    हम दैहिक रूप से किसी और के व्यक्तित्व बारे में नाकारात्मक विचार कर अथवा सोचकर स्वयं के विकास को अवरूद्ध करते हैं। हमारा विकास स्वयं के विचारों पर ध्यान देने से और औरों के साकारात्मक विचारों को धारण करने से निश्चित ही होता है। -स्फोटाचार्य🌹💥ॐ

    हम स्वयं के संस्कार के अनुरूप ही ज्ञान को धारण करने में समर्थ होते हैं। - स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ

    हमारे संस्कार के सिवा इस संसार में हमारा कुछ भी बपौती नहीं, क्योंकि संस्कार ही एक ऐसी वस्तु हमारे पास है कि जितना इसे हम संसार में छोड़कर जाते हैं उससे कई गुणा साथ लेकर भी जाते हैं। - स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ

    हमने संसार के सभी पुस्तकों और ग्रन्थों को पढ़ लिया तो क्या पढ़ा, यदि हमने अपने हृदयरूपी ग्रंथ को पढ़कर हृदयार्विन्दे की कथा नहीं पढ़ी तो कुछ नहीं पढ़ा। - स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ


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    "माँग" किसी भी परिस्थिति में यह प्रदर्शित करता है कि हममें किसी न किसी रूप में अभाव एवं असंतोष व्याप्त है। इतना ही नहीं, बल्कि "माँग" यह भी निर्धारित करता है कि हम ईश्वर के प्रति श्रद्धावान एवं समर्पित नहीं हैं। "माँग" यह भी स्पष्ट कर देता है कि कर्म के फल में हमारी आशक्ति है जबकि जीव का अधिकार मात्र कर्म करने पर है। "माँग" यह भी निर्धारित कर देता है कि ईश्वर के ब्रह्माण्डव्यापी समदर्शी नियमों में कटुता है। "माँग" यह सुनिश्चित कर देता है कि हम "होने के बजाय" पाने में विश्वास रखते हैं। "माँग" यह संदेश प्रेषित करती है कि हम नियति को समझ नहीं पाते। "माँग" यह तय कर देती है कि हम मृगतृष्णाओं के वशीभूत हैं, क्योंकि आवश्यक आवश्यकताएँ दैहिक जीवन का आधार है जिसकी पूर्ति हमारे सामान्य कर्म से ही हो जाती हैं और इच्छाएँ अनन्त हैं जो समयानुसार बढ़ती चली जाती है। "माँग" यह अवश्यंभावी कर देती है कि जिस दिन हमारी माँगे ं पूरी नहीं हुई उस दिन हमारा सुकोमल हृदय विखंडित हो जाता है और विश्वास तथा आस्था की सेतु को ध्वस्त करने को आतुर हो जाती है। अत: "माँग" असंवेदनशील नहीं अपितु हमारी संवेदनशीलता को घनीभूत होने से वंचित कर देती है। "माँग" के स्तित्व पर केवल और केवल आत्मज्ञान की भिक्षा ही हमें तृप्त करती है और हमारी आत्मिक व्यवस्था को आध्यात्मिक के मार्ग में लाकर खड़ा कर देती है और अंततः हमें "तत्वमसि" से अलंकृत कर देती है। "बिन माँगे मोती मिले, ....." - स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ


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    निराकार का सामान्य अर्थ जो सभी को पता है, जिसका कोई आकार न हो। तात्विकता है - जो आकार इतना व्यापक हो कि उसकी व्यापकता सामान्य मानस ही नहीं बल्कि असम्प्रज्ञात तथा सहजादि के लिए भी एकत्व करना संभव नहीं । वह उसमें विलीन ही हो जाता है। उसका स्तित्व खो ही जाता है। वह स्तित्वविहीन ही हो जाता है। अथवा निराकर इतना सूक्ष्म से सूक्ष्मगत हो कि उसके स्तित्व होने का बोध ही खो देता है। जैसे हम गणित के "बिन्दु" की परिभाषा जानते हैं कि बिन्दु वह है जिसकी लम्बाई अथवा मुटाई नहीं हो अर्थात् वह हो ही नहीं, फिर भी वह है। अत: निराकार अथवा सूक्ष्म अथवा की स्पष्टीकरण, सम्पूर्ण सत्य केवल उसी के समक्ष प्रस्तुत होता है जो माया की आठवीं मंजिल के भी परे "धर्ममेघ" का भेदन कर लिया हो। निराकार कहा जिसने नहीं जाना। जाना जो वो ब्रह्म समाना।। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


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    सनातन संस्कृति के अधिमानस धरोहर को सुरक्षित एवं संरक्षित करने की सर्वश्रेष्ठ भावनाओं से ओतप्रोत वैदिक ऋषियों ने बड़े ही सुसज्जित तरीके से "वेद" को तीन खण्डों में प्रतिपादित किया गया है, जो मानवीय मानस पटल के बाह्यान्तरिक सामर्थ्यता को सहज रूप से ही दृष्टिगोचर करता है। वैदिक ऋषियों ने समकालीन एवं अनन्त दूरदर्शिता के लक्ष्य को परिलक्षित करते हुए इतनी सूक्ष्मता और सहजता से मानसपटल पर इसे उड़ेला है जैसे मानो एक जादूगर ने अपनी जादूगरी से समस्त जीव को सम्मोहित कर रखा हो। इस त्रिवैधिक सम्मोहन क्रिया में वैदिक ऋषियों ने सम्पूर्ण मानवीय मष्तिष्क को उसके जीवन का आधार प्रदान करने हेतु "वेद" को तीन भागों में विभक्त कर दिया है। पहला - ज्ञानखण्ड, दूसरा - उपासनाखण्ड एवं तीसरा - कर्मखण्ड। वैदिक ऋषियों ने "ज्ञानखण्ड" की श्रेणी में ऐसे अधिमानस को आध्यात्मिक आधार दिया है जिसकी मष्तिष्कीय क्षमता उत्कृष्ट तथा समदर्शी हो, जो मानव ही नहीं अपितु चराचर जीवों हेतु कल्याणकारी हो, जो ब्रह्म के सदृश ही निर्भेद, निर्लेप तथा निर्विकार हो। दूसरी "उपासनाखण्ड" में वैदिक ऋषियों ने ऐसे मानस को आधार दिया है जिसकी मष्तिष्कीय क्षमता मध्यमवर्गीय हो। जो अपनी उपासना और भक्ति भाव से आधिदैविक प्रणेताओं को तथा स्वयं के इच्छित इष्टदेव को समर्पित हो जहाँ भक्ति की रसधारा में प्रवाहित होकर इष्टरूपी सागर में विलीन हो जाता हो, जिसके लिए इष्ट के सिवा कोई दूसरा संकल्प न हो। तीसरा "कर्मखण्ड" की श्रेणी में वैदिक ऋषियों ने ऐसे मानव को आधार दिया है जिसकी मष्तिष्कीय क्षमता निम्न हो। जो केवल अपने स्मरणशक्ति का प्रयोक्ता हो। ऐसे मानव को वैदिक ऋषियों ने विदित विधि एवं विधान की भव्यता से अलंकृत किया है। वैदिक ऋषियों की अनुभवशैली इतनी तीक्ष्ण रही है कि कर्मकाण्ड पर आधारित रहने वाले को अपनी निम्नता का बोध न हो सके और स्वयं को श्रेष्ठ समझता रहे और यह जानकर उद्विग्न तथा उद्वेलित न हों, इसलिए उन्होंने मायारूपी दृश्यात्मक जगत में कर्मखण्ड के विधि-विधान की भव्यता को विशेष उजागर तथा सम्पूर्ण विस्तार प्रदान किया है ताकि जो निम्न मष्तिष्क के मानव हैं वे विधि वैभव की अकूत भव्यता एवं प्रभुता की सागर में पांडित्यता का विहार कर स्वयं के अहं को तुष्टि प्रदान करता रहे। वेद के त्रिविध प्रणालियों को निर्माण करने वाले वैदिक ऋषि इतने सूक्ष्मदर्शी थे कि वे प्रकृति के विकासवादादि सिद्धांतों को भलीभाँति अनुभूत किये थे। अत: वैदिक ऋषियों का यह निश्चय सुदृढ़ है कि कालांतर में निम्न मष्तिष्कीय मानव भी जन्मजन्मोंपरान्त मानसता के पटल पर पहुँच कर अधिमानसता के दरवाजे पर सिंहनाद करने में अवश्य सफल होंगे। अत: वैदिक ऋषियों की नीति इतनी उदार एवं सापेक्षतातीत रही है जो अनादि काल से चराचर जगत के जीवों के लिए किसी भी दृष्टिकोण से कल्याणकारी ही सिद्ध होती है। ऐसे ब्रह्मतुल्य वैदिक ऋषियों को हम अपनी चतुर्विध समाधि को भी समर्पित कर दें तो उनके ऋषिऋण से हम उऋण नहीं हो सकते। शाश्वत रूप से हम उन्हें समर्पित हों यह अभीप्सा हमारी सृष्टि के दरवाजे पर सिंहनाद करती है। - या देवी सर्वभूतेषु ऋषिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ॥ - स्फोटाचार्य


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    आरम्भ ही अन्त है। विस्तार से सिमटाव ही प्रज्ञा पूर्ण होने का कारक है। विस्तार में हम चाहे जितना भी प्रवाहित होते रहें, हमें लौटकर आना वहीं है जहाँ से प्रारंभ है। हम जितना अधिक विस्तार में डूबते चले जाते हैं उतना ही लक्ष्य से हम दूर होते जाते हैं। विस्तार की पूर्णाहुति लय पर ही शाश्वत है, इसलिए विस्तारगामी विस्तार और लय के मध्य घटित समयावधि के अनुरूप ही गन्तव्य तक पहुँच पाने में समर्थ होते हैं। अत: कदाचित् सहस्रों जन्मों की पूर्णाहुति के पश्चात ही हम उद्गम का भेदन करने में समर्थ हो पाते हैं। परन्तु यदि हम जहाँ हैं वहाँ से सिमटाव की ओर अग्रसर होते हैं तो यह एक अद्भुत घटना घटित होती है कि हम सहस्रों जन्म के दुर्गम रास्ते को इसी जन्म के मात्र चन्द वर्षों में गन्तव्य तक प्रस्थान कर जाते हैं और उद्गम का भेदन करने में भी समर्थ हो जाते हैं। परन्तु, जबतक अहं शेष होता है तबतक विस्तार से विमुख होना असंभव ही है। क्योंकि, तबतक हम स्वयं के बल का प्रदर्शन करते हैं परन्तु जैसे ही हम सिमटाव की ओर अग्रसर होते हैं तो हम प्रकृति, ब्रह्म अथवा ईष्ट को समर्पित हो जाते हैं और जब हम स्वयं का समर्पण कर देते हैं तब हम अपना बल त्याग कर शून्यता में प्रवेश कर जाते हैं। जहाँ से उद्गम का भेदन कर सत्यासत्य के पार ज्ञान के सम्पूर्ण आलोक को उपलब्ध होते हैं जहाँ से ज्ञान के सभी श्रोतों का प्रकाट्य होता है। अत: इसी अवस्था में हम प्रज्ञा पूर्ण होते हैं। सृष्टि के गति और सनातन का यही तथ्य शाश्वत है। जिसे तत्वज्ञान, ब्रह्मज्ञान अथवा आत्मज्ञान से अलंकृत होकर आत्मैक्यता के परमानंद को अनुभूत करते हैं। - स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ

    हम वर्ष में एक दिन नव का आनन्द लेकर सबदिन आनन्दित नहीं रह सकते, इसलिए हमें प्रतिदिन इसी प्रकार आनन्दित रहना पड़ता है, परन्तु प्रतिदिन आनन्द लेकर भी पूर्ण आनन्द नहीं ले सकते क्योंकि आनन्द तो प्रति क्षण है । अत: सम्पूर्ण आनन्द हेतु हमें प्रतिक्षण आनन्दित रहना पड़ता है। अभीप्सा करता हूँ कि हम प्रतिक्षण आनन्दित रहें। प्रतिक्षण एक नव है , प्रतिक्षण हमारे लिए एक नया विकल्प, नई अनुभूति, नये अवसर, नये प्रश्न एवं नई खोज तथा नये आविष्कार लेकर आते हैं।अत: प्रतिक्षण का आनन्द ही हमारा सनातनी विरासत है। "सनातनम् नित्य नूतनम्" ॐ हरि ॐ- स्फोटाचार्य


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    किसी का भी खण्डन-मुण्डन करने से कुछ होने को नहीं है। हम जैसा हैं वैसा ही बन जाएँ तो बहुत है। बड़ा लकीर खींचने के लिए हमें पहली लकीर को मिटाने की आवश्यकता ही नहीं है। और ऐसे भी संसार में जितने भी प्रकाश छप जाएँ उसकी रोशनी सनातन वैदिक प्रकाश की रेखाओं को पार नहीं कर सकता। इसी रेखा के एक अंशमात्र को हम जो प्रकाश नाम दे दें। बुद्ध का खण्डन करके शंकराचार्य जी ने भारत से बाहर भगा दिया और परिणाम यह है कि दुनियाँ के ८० फीसदी लोग बौद्ध हो गए। हम अपना सामग्री बेचने के लिए बगल वाले की सामग्री को खराब कहकर नहीं बेच सकते। यदि हम अपने सामग्री की इतनी अच्छाई बता दें इतनी विशेषता बता दें, इतने फायदे बता दें तो ग्राहक स्वयं हमारा सामग्री खरीद लेगा। - स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ 🌹💥ॐ


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    जीवन शैली को जानने के लिए सर्वप्रथम हमें जीवन को जानना आवश्यक है। जब हम जीवन को पूर्णरूपेण जान जाते हैं और जब वह जानकर जीते हैं वही जीवन शैली है। अन्यथा जीवनशैली की अपेक्षाकृत उद्देश्यों और लाभों से वंचित ही रहना पड़ता है। इसी प्रकार जब तक हम ब्रह्म को न जान जाएँ और ब्रह्म के आचरण को न जान जाएँ । और जब तक जाने हुए के अनुरूप हम जी न सकें तो वह ब्रह्मचर्य नहीं। कौमार्यता अथवा स्वर्णमय वीर्य का संरक्षण अथवा आचार-विचार ब्रह्मचर्य को परिलक्षित, परिभाषित अथवा प्रत्यारोपित नहीं कर सकता । - स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ


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    यह आवश्यक नहीं कि हमने जो पढ़ा है वही होना चाहिए। आए दिन हम ऐसे ही वस्तुओं से अवगत होते रहे हैं जिसके बारे में हमने कभी पढ़ा या सुना नहीं। यह सृष्टि के अनेक सिद्धान्तों में विकासवाद भी एक मूल सिद्धांत है। प्रत्येक जन्म में हमारा मस्तिष्क विकसित होते जाता है और जब हम पूर्ण विकसित हो जाते हैं तो यह मोक्ष का कारक होता है। यही हमें सहस्त्रार सिद्धि भी बताता है। भारतीय तत्वदर्शी ऋषियों के द्वारा "छान्दोग्य उपनिषद" में सहस्त्रार दर्शन की सिद्धि पांच शब्दों में प्रतिपादित की गयी है - "तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति" अर्थात् सहस्त्रार प्राप्त कर लेने वाला योगी संपूर्ण भौतिक विज्ञान प्राप्त कर लेने में समर्थ हो जाता है, यही वह शक्ति केंद्र है जहाँ से मस्तिष्क शरीर का नियंत्रण करता है और विश्व में जो भी मानवकृत विलक्षण है उसका सम्पादन करता है | इस हेतु मैं अभी ११ केन्द्र चला रहा हूँ। कृपया इस👇साईट को देखें और यदि ऐसा केन्द्र खोलना चाहते हैं तो कृपया हमें सम्पर्क करें - Scientific Eeducation Point (SEP) www.mysep.in


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    स्त्री पूर्ण तभी है जब उसके साथ पुरुष है । उसी प्रकार पुरुष पूर्ण तभी है जब उसके साथ नारी है। इसी का प्रतीक अर्धनारीश्वर है। और यह तब संभव है जब दोनों एक-दूसरे के मनोभावों को समझने का प्रयत्न करे तथा महत्व दे। अत: मैं यह अभीप्सा करता हूँ कि इस ज्ञान को जीकर आप सबों के दाम्पत्य जीवन में प्रेम और आनंद के फूल अवश्य खिलेंगे। - स्फोटाचार्य हरि ॐ नमो नारायणा

    संसार में सभी स्वयं के तथाकथित ज्ञान से आच्छादित है। सदियों से जिज्ञासुओं का सदा ही अभाव रहा है। लाखों में कोई एक जिज्ञासु है , लाखों जिज्ञासुओं में कोई एक निदिध्यासन करता है, लाखों निधिसाध्यों में कोई एक अनुभव को प्राप्त करता है और लाखों अनुभवियों में कोई एक स्थितप्रज्ञ होता है और जो स्थितप्रज्ञ है वास्तव में वही जीवन है।ॐ - स्फोटाचार्य

    प्रेम वह पुष्प नहीं जो दो चार दिन में ही अपने सुगंध को छोड़कर मूर्छित हो जाय , बल्कि प्रेम वह पुष्प है जो जनम - जनम तक अपने सुगंध को बिखेरते रहती है और सृष्टि के नष्ट होने पर भी वह नहीं मुरझाती है | - स्फोटाचार्य

    चाहे जितना भी श्रृंगार किया जाय , बाहरी और वासनात्मक सुन्दरता ही जाहिर की जा सकती है | पवित्र और आंतरिक सुन्दरता को प्रकट करने के लिए आवश्यक है कि हमें अपने परिवार से सुन्दर विचारों का आदान - प्रदान करें | - स्फोटाचार्य

    हम फेसबुक पर चाहे जितना भी अपने चेहरे का प्रदर्शन करें पर हमारी सुन्दरता प्रदर्शित नहीं हो सकती , जबतक कि हम अपने परिवार के साथ सुन्दर और मिलनसार विचार प्रदर्शित नहीं करते | क्योंकि पुष्प अपने आप में सुगन्धित होता है तभी दूसरों को सुगंध प्रदान कर आकर्षित करता है | इसी प्रकार जब हम अपने आप में और अपने परिवार से सुन्दर विचार को प्रदर्शित करते हैं तभी हम दूसरों को भी सुन्दर दीखते हैं , इससे पूर्व वासनात्मक सुन्दरता का प्रदर्शन हो सकता है शुद्ध और पवित्र सुन्दरता का नहीं | - स्फोटाचार्य

    परिवर्तन संसार का नियम है, जिसे हम मृत्यु समझते हैं वही तो जीवन है। शरीर बदल जाते हैं पर हृदय नहीं बदलता। वस्त्र बदले न बदले पर यदि हृदय बदल जाए तो हम द्विज कहलाते हैं।- स्फोटाचार्य

    मेरा कोई स्तित्व नहीं, इसलिए मैं ही स्तित्व हूँ। - स्फोटाचार्य

    संसार में सभी अपने आप में सुंदर है, पर यह चाम की सुंदरता, बाहरी सुन्दरता है। सुन्दर तो वास्तविक में वह है जिसका अन्तर मन सुन्दर है। - स्फोटाचार्य

    यदि मनुष्य केवल अच्छाई के विषय में ही चिन्तन करे तो बुराई स्वतः ही नष्ट हो जाती है। जो चिन्तन होता है उसी को हम आकर्षित करते हैं और वही घटित होता है। अत: हमें केवल अच्छाई का ही चिंतन करना कल्याणकारी सिद्ध हो सकता है। - स्फोटाचार्य 🌹💥ॐ🌞🌹

    कोई जीता है बस्ती में, कोई जीता है हस्ती में, कोई जीता परस्ती में तो कोई जीता है मस्ती में। जीते-जीते दिन गुजर जाते और शाम सभी के, पर रात को पकड़े जाते यमराज की गस्ती में।। - स्फोटाचार्य

    रात्रि तो होती ही नहीं है कभी। अज्ञानता ही रात्रि और अंधकार है। योगी इसे भलीभाँति जानते आ रहे हैं। आज के इस वैज्ञानिक युग में क्या किसी का संदेह शेष है कि सूर्य न ही डूबता है और न ही उगता है। सूर्य तो सर्वदा उदय ही रहता है। पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण छाया इधर उधर होती है। यदि आप छाया को रात्रि कहते हैं तो जब सूर्य की किरण आपकी छाया बनाती है तो तब आप कहेंगे देखो यह रात है और यह दिन। यदि नहीं तो पृथ्वी की छाया रात्रि नहीं है। छान्दोग्योपनिषद् कहता है जब साधक की आन्तरिक स्थिति ऐसी हो जाय कि उसे सर्वथा प्रात: अथवा दिवा का ही बोध हो तो उसे ब्रह्मज्ञान दिया जा सकता है। यह ब्रह्मज्ञान पाने की पात्रता है। इससे पूर्व उसे यह ब्रह्मज्ञान समझ में नहीं आ सकता। 🌹🌞💥ॐ💥🌞🌹 - स्फोटाचार्य


    🌹💥स्फोट💥🌹

    हिन्दू एक अप्रभंश शब्द है। हिंदुत्व या हिंदू धर्म को प्राचीनकाल में सनातन धर्म कहा जाता था। एक हजार वर्ष पूर्व हिंदू शब्द का प्रचलन नहीं था। ऋग्वेद में कई बार सप्त सिंधु का उल्लेख मिलता है। सिंधु शब्द का अर्थ नदी या जलराशि होता है इसी आधार पर एक नदी का नाम सिंधु नदी रखा गया, जो लद्दाख और पाक से बहती है। भाषाविदों का मानना है कि हिंद-आर्य भाषाओं की 'स' ध्वनि ईरानी भाषाओं की 'ह' ध्वनि में बदल जाती है। आज भी भारत के कई इलाकों में 'स' को 'ह' उच्चारित किया जाता है। इसलिए सप्त सिंधु अवेस्तन भाषा (पारसियों की भाषा) में जाकर हप्त हिंदू में परिवर्तित हो गया। इसी कारण ईरानियों ने सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिंदू नाम दिया। किंतु पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लोगों को आज भी सिंधू या सिंधी कहा जाता है। ईरानी अर्थात पारस्य देश के पारसियों की धर्म पुस्तक 'अवेस्ता' में 'हिन्दू' और 'आर्य' शब्द का उल्लेख मिलता है। दूसरी ओर अन्य इतिहासकारों का मानना है कि चीनी यात्री हुएनसांग के समय में हिंदू शब्द की उत्पत्ति ‍इंदु से हुई थी। इंदु शब्द चंद्रमा का पर्यायवाची है। भारतीय ज्योतिषीय गणना का आधार चंद्रमास ही है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इन्तु' या 'हिंदू' कहने लगे। - स्फोटाचार्य 🙏🏻💥🐚ॐ🐚💥🙏🏻

    ना ही कोई हिन्दू है ना ही हिन्दुस्तान। आर्यावर्त्त और भारतवर्ष और सनातन ज्ञान का सत्यधर्म है जिसे सनातन धर्म भी कहते हैं। हिन्दू एक अप्रभंश शब्द है। हिंदुत्व या हिंदू धर्म को प्राचीनकाल में सनातन धर्म कहा जाता था। एक हजार वर्ष पूर्व हिंदू शब्द का प्रचलन नहीं था। ऋग्वेद में कई बार सप्त सिंधु का उल्लेख मिलता है। सिंधु शब्द का अर्थ नदी या जलराशि होता है इसी आधार पर एक नदी का नाम सिंधु नदी रखा गया, जो लद्दाख और पाक से बहती है। भाषाविदों का मानना है कि हिंद-आर्य भाषाओं की 'स' ध्वनि ईरानी भाषाओं की 'ह' ध्वनि में बदल जाती है। आज भी भारत के कई इलाकों में 'स' को 'ह' उच्चारित किया जाता है। इसलिए सप्त सिंधु अवेस्तन भाषा (पारसियों की भाषा) में जाकर हप्त हिंदू में परिवर्तित हो गया। इसी कारण ईरानियों ने सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिंदू नाम दिया। किंतु पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लोगों को आज भी सिंधू या सिंधी कहा जाता है। ईरानी अर्थात पारस्य देश के पारसियों की धर्म पुस्तक 'अवेस्ता' में 'हिन्दू' और 'आर्य' शब्द का उल्लेख मिलता है। दूसरी ओर अन्य इतिहासकारों का मानना है कि चीनी यात्री हुएनसांग के समय में हिंदू शब्द की उत्पत्ति ‍इंदु से हुई थी। इंदु शब्द चंद्रमा का पर्यायवाची है। भारतीय ज्योतिषीय गणना का आधार चंद्रमास ही है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इन्तु' या 'हिंदू' कहने लगे। जागो भारतवासी जागो - स्फोटाचार्य 🙏🏻💥🐚ॐ🐚💥🙏🏻


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    ॐ, प्रत्येक वर्ष हमारे जीवन का एक वर्ष कम हो जाता है। अत: मैं बधाई तो नहीं दे सकता । परन्तु इतनी अभीप्सा जरूर है कि जीवन का बोध हो। ॐ हरि ॐ


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    किसी स्तुति में है - " ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका, प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका।"तीनों देवों को अलग-अलग जानने वाले ही विवेकहीन होते हैं, क्योंकि यह त्रिवाद है जबकि सनातन की नींव अद्वैतवाद है। तीनों का साम्यावस्था ही प्रणवाक्षर है। ऐसे तो प्रणवाक्षर भी शब्दात्मक नहीं है पर ध्वन्यात्मक अवश्य है। परन्तु , हे प्रभु ! आप तो प्रणवाक्षर के भी पार निशब्द हैं, ध्वनियों के भी पार निर्ध्वन्य हैं। हे प्रभु! चराचर जगत में एक ही आत्मा है, उसे ही परमात्मा कहते हैं। अज्ञानीजन इन्हें दो समझते हैं। किसी ने कहा है- "जीवात्मा प्रभु का अंश है, जस अंश नभ को देखिये। घट-मठ प्रपंच हि जब मिटै नहिं अंश कहना चाहिये।" सम्पूर्ण चराचर स्तित्व ही शिव अर्थात् आप हैं। यह सम्पूर्ण सृष्टि आप के कर्म के कारण आपके ही शरीर में उद्घाटित हुआ है ।" जैसे मानव तन बसे जीवा हैं अनेक, वैसे मानव जीव है प्रभु के तन में एक।" इसलिए आपने "एकोअहं द्विजोनास्ति" कहा है। हे प्रभु! यही आत्मज्ञान, यह मोक्षज्ञान, यह तत्वज्ञान, यह शिवज्ञान, यह रामज्ञान, यह ईश्वर-अल्लाह ज्ञान - कोई लोक नहीं जहाँ प्राप्त किया जा सके, कोई संत या अवतार नहीं जो किसी को दे सके। मेरे गुरु ने कहा- "नहिं कोई देत नहिं लोक है दूजा, आत्मज्ञान सम तप नहिं पूजा। " अर्थात् हे प्रभु! सभी अवतारों और सभी संतों के शरीर में आपने ही व्यक्त होकर "तत्वमसि" का याद दिलाने का प्रयत्न किया, पर मूरख मन यहँ "ठहर" नही पाता, वह शास्त्रादि में जन्म-जन्मान्तर भटकते रहा। हे प्रभु! जो यहाँ "ठहरा" वही "बिरला" कहलाया। ॐ जय गुरु - स्फोटाचार्य


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    आजकल माताएँ एवं बहनें अपना सम्मान खुद को प्रदर्शित करने में ही समझने लगीं हैं। जो व्यवसायी हैं उन्हें धन लाभ तो हो सकता है। परन्तु जो किसी का देखकर ऐसा करती हैं तो आगे चलकर वे भी व्यवसाय में लिप्त हो जाती हैं, ऐसा अक्सर महसूस किया हूँ। हलाँकि शुरुआत में उनकी ऐसी कोई भावना नहीं होती , बस लुफ्त उठाने में ही मजा आता है लेकिन आगे चलकर वह धीरे-धीरे एक व्यवसाय का रूप धारण कर लेती है। जिन्हें सिर्फ पैसों की भूख होती है उन्हें अंत तक एहसास नहीं होता पर जो माताएँ पैसों से परे होकर ऊपर उठती हैं तो उनके लिए पाश्चाताप के सिवा कुछ भी शेष नहीं रहता। अब आप जैसी माता होंगी वैसे ही अपने बच्चों को देखना चाहेंगी। मैंने अनेकों घटनाओं को अपने नजर से गुजरते देखा है जहाँ वैसी माताओं - बहनों के लिए न जिन्दगी होती है और न ही मौत। यदि कुछ शेष रह जाता है तो वह नर्क से भी बदतर एक खौफनाक जीवन। अत: माताओं - बहनों से मेरा निवेदन है कि वे सतर्क हों और अपनी भारतीय संस्कृति में रहें। इस हेतु तीन वाक्य - १. जो दूसरे की भूल से सीखता है, वह बुद्धिमान होता है। २. जो अपने भूल से सीखता है, वह औसत होता है। और ३. जो अपने भूल से भी नहीं सीखता वह मूर्ख होता है। - शायद मेरी तरह कि - बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ, आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ। ॐ - स्फोटाचार्य


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    खुद को दिखाने से कहीँ बेहतर है खुद को खुद में ढूँढना। यदि खुद को ढूंढ लिया तो समझ जाओगे कि तुमने खुदा को ढूँढ लिया। - स्फोटाचार्य

    जिसने माता-पिता को नहीं पूजा उसकी दुर्गति इसी जीवन में तय है। जो अपने भाईयों के साथ प्रेम से न रहता हो यथाशीघ्र ही उसे अशान्ति और तनाव के पुरस्कार द्वारा सम्मानित होता है। जो अपने समाज में मिलकर नहीं रहता हो वह उपेक्षाओं का शिकार बन अकेले रह जाता है। जो शुभ कार्योँ में सच्चे हृदय से सहयोगी न बने वह अशुभ का शिकार होता है और जिसने आत्मा को गुरु नहीं बनाया वह पर आत्मा का गुलाम होता है। ॐ आत्मा गुरवे नम: - स्फोटाचार्य

    ॐ, मानव धर्म की एक ही आवश्यकता है कि जीवन के सभी कार्यों को करते हुए खुद को"अपनी आत्मा" को प्राप्त करने का प्रयत्न करे। - स्फोटाचार्य

    जो जीवन हमें मिला है, जिससे हम सभी सुखों का उपभोग करते हैं, उसे ही नहीं जानते इसलिए हम पूर्ण सुख और शान्ति को नहीं पा सकते हैं । कई जन्म बीत जाते हैं फिर भी पूर्ण सुख और शान्ति को प्राप्त नहीं कर पाते। परन्तु, यदि उस जीवन को जान लिया जाय तो निश्चय ही सम्पूर्ण सुख और शान्ति को इसी जन्म में प्राप्त कर लेते हैं और फिर राजाऔं के घर में ही जन्म लेते हैं । ऐसे राजा को सिर्फ उपभोग करना होता है । यदि अच्छे कर्मों के द्वारा भोग न किया जाय तो पुन: पूर्ववत् हो जाते हैं । बिरले कोई ऐसे व्यक्ति हैं जो इसी जन्म में अपने विलक्षण कर्मों से स्वयं ही राजा नहीं होते अपितु कितनों को राजा बना देते हैं। - स्फोटाचार्य

    आगामी समय संसार में जब सभी संसारी गुरु से त्रस्त होंगे तब अंतिम विकल्प आत्मा गुरु का ही होगा, जो सम्पूर्ण रहस्य है । सम्पूर्ण सृष्टि में अवश्यमभावी यही सिद्धान्त गतिमान होगा और यही समय सृष्टि के जीव की चेतना को परिमार्जित करेगा। यह कोई भविष्यवाणी नहीं बल्कि आदतन सत्य है। ओम़़़़़्- स्फोटाचार्य ॐ जय गुरु

    निराकार का सामान्य अर्थ जो सभी को पता है। तात्विकता है - जो आकार इतना व्यापक हो कि उसकी व्यापकता सामान्य मानस ही नहीं बल्कि असम्प्रज्ञात तथा सहजादि के लिए भी एकत्व करना संभव नहीं । वह उसमें विलीन ही हो जाता है। उसका स्तित्व खो ही जाता है। वह स्तित्वविहीन ही हो जाता है। अथवा निराकर इतना सूक्ष्म से सूक्ष्मगत हो कि उसके स्तित्व होने का बोध ही खो देता है। जैसे हम गणित के "बिन्दु" की परिभाषा जानते हैं कि बिन्दु वह है जिसकी लम्बाई अथवा मुटाई नहीं हो अर्थात् वह हो ही नहीं, फिर भी वह है। अत: निराकार अथवा सूक्ष्म अथवा की स्पष्टीकरण, सम्पूर्ण सत्य केवल उसी के समक्ष प्रस्तुत होता है जो माया की आठवीं मंजिल के भी परे "धर्ममेघ" का भेदन कर लिया हो। निराकार कहा जिसने नहीं जाना। जाना जो वो ब्रह्म समाना।। - स्फोटाचार्य🌹💥ॐ


    🌹💥स्फोट💥🌹

    सन्देश, समीक्षा, महत्त्व, परिणाम एवं निर्धारना

    हे तथाकथित ब्रह्मस्वरूप जीवात्मा, आत्मैक्य ! हे आर्य इश्लामादि हे आत्मा, रूह, सोल, आदि ! सुनो ! सुनो !
           लगभग सोलह खरब वर्ष से सभी कल्पों में, सभी युगों में, यहाँ तक कि सृष्टि के निर्माण के समय से ही त्रिदेवो में वैमनष्यता है, अशांति है! ब्रह्मा के पुत्र दक्ष ने पिता की अवमानना की, श्रापित हुआ! ब्रह्मा भी श्रापित हुए ! ब्रह्मा के पुत्र सहिंता के निर्माता रजा दक्ष ने शंकर का विरोध कर अपनी पुत्री को आत्महत्या करने पर मजबूर किया और शंकर को रुद्रता पर उतारू होने को विवश किया ! विष्णु लाचार क्यों ? आखिर सनातन से ही यह त्रिदेवीय परंपरा चली आ रही है और सनातन से ही महर्षि मानवों को उपदेश एवं ज्ञान देते चले आये है ! सबो ने उनकी आराधना की ! पृथ्वी पर शांति स्थापित करने का प्रयास किया, परन्तु उसके विपरीत ही होता चला गया ! वह तो कलियुग नहीं था तो भी उतना दुःख और अशांति क्यों हुई, वैमनष्यता क्यों हुई? यही रहस्य है इस ब्रह्माण्ड का, जिसके कारण अभी तक शांति स्थापित नहीं हुआ है ! अभी तक किसी संतो या भक्तो ने त्रिदेव आदि के दुखो को दूर करने का नहीं सोचा ! न ही ईश्वरस्वरुप के परम सत्य को जान सका ! महर्षि भृगु जैसे महायोगी को भी विष्णु को लात मारकर ईश्वर होने की प्रमाणिकता खोजनी पड़ी थी अर्थात उन्होंने भी ईश्वर का ज्ञान (आत्मज्ञान) प्राप्त नहीं किया ! केवल अपने और जीव के कल्याण के लिए ही पूजा, यज्ञ , हवन, आदि होता रहा, परन्तु स्थिति जस-की-तस बनी हुई है! श्री राम आये मार-काट कर धर्म की स्थापना कर चले गए फिर ज्यो का त्यों क्यों हो गया, कृष्ण आये मार-काट कर “यदा-यदा हि धर्मस्य .....” कहकर धर्म की स्थापना कर चले गए, पुनः वैसा ही हो गया ! श्री कृष्ण ने यदा-यदा क्यों कहा? सर्वदा क्यों नहीं कहा ? यदि इसे आप लीला भी कहे तो यह स्पष्ट है कि जब रचना या लीला या आदर्श ही वैमनष्यताओ से भरी एवं मार-धार से भरपूर है तो उससे सृजन, पथप्रदर्शन अथवा जीवन शांतिमय कैसे हो सकता है ! गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी लिखा है कि “ईश्वर एवं माया के संवाद-विवाद में सृष्टि का प्रकटीकरण हुआ है !” मैं इसे सत्य ही देखता हूँ – “हे माँ शक्तिरूप प्रकृति प्रबल परा में समाई तू, है यह लीला ब्रह्मवत्सल की, प्रकृति बनकर आई तू !”
         हे ब्रह्मस्वरुप मानव शांतिमय जीवन एवं सृजन के लिए तो शांतिमय एवं प्रेममय लीला ही सर्वोपरि हो सकता है ! इसलिए हमसब मिलकर “सत्यधर्म” द्वारा आयोजित इस महायज्ञ में शामिल होकर ईश्वर से प्रार्थना करे या प्रेम की लड़ाई लड़े कि इस सृष्टि का प्रकटीकरण केवल और केवल संवाद में ही हो ताकि वैमनाश्यताओ का जन्म ही न हो सके ! शंकर और मतसती का मिलन हो सके और तभी मानव एवं ब्रह्माण्ड का कल्याण संभव है ! अब ईश्वर ने “सत्यधर्म” के द्वारा “सर्वदाहि धर्मस्य" कह कर “दिव्ययुग” की स्थापना का संकेत सन्देश दिया है, क्योंकि ईश्वर ने “अनंता” के द्वारा ब्रह्माण्ड के अध्यात्म की रहस्यों की गुत्थी को सुलझाकर जीवात्मा हेतु ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर दिया है और “महाब्रह्माण्डीय चेतना परब्रह्म महायज्ञ (आत्मज्ञान यज्ञ)” (भावनात्मक एवं हवानात्मक ) न भूतो महायज्ञ का आयोजन किया है ! इस महायज्ञ में आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक कसौटी से अभिभूत “आर्गुमेंटल दिव्यदृष्टि” द्वारा वह एक “सर्वशक्तिमान” का यथार्थ आत्मदर्शन एवं आत्मज्ञान आलोकित किया जाएगा जिससे जीवात्मा (मानव) अन्तः एवं बाह्य दोनों में इस परमसत्ता के दिव्यस्वरूपो का आत्मदर्शन, आत्मानुभूति एवं महानशांति की अनुभूति प्राप्त कर सकेंगे , जो इस ब्रह्माण्ड का सर्वप्रथम घटना होना है ! अतः आप सब के सर्वांगीण सहयोग की पूर्ण आवश्यकता है ! इस महायज्ञ के पूर्णता हेतु सभी गाँवों एवं शहरों में “महायज्ञ कमिटी” का गठन किया जा रहा है ! आत्मैक्यता को प्राप्त करने, त्रिदेवो का दुःख दूर करने, सम्पूर्ण मानव जाति को अलौकिक बनाने तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में शांति स्थापना करने हेतु यथा शीघ्र संपर्क कर अपने आप को “दिव्ययुग का दिव्यनेता” के रूप में प्रतिष्ठित करने का मार्ग प्रशस्त करें एवं महाशांति, महासुख एवं महानंद को प्राप्त करें !
         इस महायज्ञ का मूल लक्ष्य --- आध्यात्मिक क्रांति, भारत को विश्व गुरु सिद्ध करना , विज्ञान-अध्यात्म की समता को पूर्णसिद्ध करना , सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में शांति स्थापना हेतु ईश्वर से निवेदन नहीं बल्कि ईश्वर से प्रेम की लड़ाई लड़ना है ताकि सृष्टि का प्रकटीकरण ईश्वर-माया के संवाद-विवाद में नहीं अपितु सिर्फ और सिर्फ संवाद में हो ! स्वामी विवेकानंद, महागुरु श्रीअरविंद एवं भगवान रजनीश की सदिच्छा की पूर्ति करना, अन्य संतो के अधूरे कार्यों को पूरा करना, ईश्वरीय पहेलियों को सुलझाकर जनमानस को आर्गुमेंटल दिव्यदृष्टि द्वारा ईश्वर-खुदा का दर्शन कराना ! तत्पश्चात सत्यधर्म के अचिंत्यज्ञान से आत्मज्ञान को प्राप्त कर सतयुग से दिव्ययुग की स्थापना करना और चतुर्युग के कालचक्र से सदा-सर्वदा के लिए निवृति पाना ! परिणामस्वरूप प्रेममय, शांतिमय , ज्ञानमय , विज्ञानमय, आनंदमय, चैतन्यमय, साम्यमय , सहजमय एवं अद्भुत व् दिव्य अचिंत्यमयता का सुख और केवल सच्चा सुख प्राप्त कराना है! - स्फोटाचार्य

    यह आत्मज्ञान महायज्ञ प्रत्येक ५००० वर्ष में अर्थात एक कल्प में एक बार आयोजित होती है ! परन्तु , लगभग सोलह ख़राब वर्ष बाद परमात्मा की इच्छा एक महाब्रह्माण्डीय परिवर्तन का है ! इसलिए यह महायज्ञ इस कल्प में तीन बार आयोजित होना है ! प्रत्येक बार पृथ्वी के अलग-अलग भू-खंड में आयोजित कर सृष्टि में महान परिवर्तन के मार्ग को प्रशस्त करना ही इस महायज्ञ का मूल उद्येश्य है !
    इस महान उद्येश्य की पूर्ति हेतु एक सत्यनिष्ठ एवं कर्तव्यपरायण आध्यात्मिक पुरोधा का खोज जारी है ! इस हेतु योग्य व्यक्ति यथाशीघ्र सम्पर्क करे :- स्फोटाचार्य आशीष आनन्द



    जैसे मानव तन बसे जीवा अनेक !
    वैसे मानव जीव है प्रभु के तन में एक !!
    - स्फोटाचार्य

    संपूर्ण ब्रह्माण्ड एक चैतन्य शरीर
    - स्फोटाचार्य

    जीवात्मा प्रभु के अंश है जस अंश नभ को देखिए !
    घट मठ प्रपंचहि जब मिटे नहीं अंश कहना चाहिए !!
    -महर्षि मेही परमहंसजी महाराज

    मनुष्य को आत्मा की आराधना करना चाहिए !
    - पंडित श्रीरामशर्मा आचार्य

    दया धर्मं ही उत्तम है , शांत पराक्रम जान !
    आत्माज्ञान श्रेष्ठ ज्ञानो में , धर्म न सत्य सामान !!
    -आत्मज्ञानी अनंतात्मानंद सरस्वती

    जापो पिंड ओंकार सदा , धईके प्रभु का ध्यान !
    गुरु कहे ना गुरु कोई , आत्मा गुरु सामान !!
    --अनंतात्मानंद सरस्वती


     





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